भ्रातृ स्नेह
शीतल छाँव है वट वृक्ष की, स्नेह की रसधार है।
भाई बने जीवन का सहारा, प्रेम का आधार है॥
राम-लखन सम निर्बाध सरित, त्याग तप अनुपम चलन।
मर्यादित करें सब आचरण, तनिक पावन हो सदन॥१॥
राम-श्याम सा बढ़े अनुराग निर्मल हृदय मेल हो।
दुख सुख की परिभाषा सुखदा, मुख मधुर मद खेल हो॥
स्व भाई का विश्वास पाकर, पथ सरल बनता रहे।
सींच कर सुख जीवन-लता को, नेह नद बहता रहे॥२॥
आल्हा-ऊदल गाथा गाती, वीरता का गान है।
भ्रातृ-स्नेहिल शक्ति से पूरित, जीतता अभियान है॥
प्रेमपाश बँध निज बीर पर, प्राण तक अर्पित किए।
मातृभूमि सम्मान हित जो, रण ध्वजा स्थापित किए॥३॥
छत्रपति शिवराज का व्योंकोजि, पर अतुल सम्मान था।
भिन्न पथ फिर भी हिय में बसा, स्नेह का अवदान था॥
भाई संग बँध सरस सदा, मधुर रस तरंग रहा।
नेह धारा निर्मल नदी बन, प्रेम उर में ही बहा॥४॥
महाराणा प्रताप हित समझ, शक्ति सिंह सँभल गए।
संकटों की घोर बेला पा, भ्रात बंधन बल मुए॥
रक्त का संबंध निखर कर जब, कर्तव्य सुपथ पर बढ़ा।
तब विजेश का सूर्य नभ में, तेज लेकर ही चढ़ा॥५॥
हरिहर और बुक्का रॉय ने, विजय नगर गढ़ सुगढ़ा।
भ्रातृ साहस बल पर साधा, उजला इतिहास मढ़ा॥
एकता के मंत्र से वैभव, सजा नव आकार था।
भाई-भाई लिये भरोसे, राष्ट्र का उत्थान था॥६॥
भरत सम भ्रात इस धरती पे, त्याग का आधार हैं।
तृण समान त्याग निज सरबस, प्रेम के अधिकार हैं॥
भ्रातृ-स्नेह बसता जहां पर, सदन तीर्थ बन गया।
स्वार्थ का हर एक विकट घन, नेह से फिर छँट गया॥७॥
नटखट सा सुहाना बालपन, मुख सजी मुस्कान हैं।
यूँ रूठना फिर मान जाना, नेह की पहचान हैं॥
निज भाई के संग बीतते, पर्व मनभावन बड़े।
ज्यों धरा पर खिली चंद्रिका, स्नेह सुखदावन खड़े ॥८॥
जब कभी जीवन-पथों पर घोर अँधियारा मिले।
भाई का आशीष मानो सूर्य बनकर ही खिले॥
हाथ सिर पर रख कहे मत हारना संघर्ष में।
यह वचन संबल बने हर एक कठिन उत्कर्ष में॥९॥
हे प्रभो हर जन्म में ऐसा सुहृद भाई मिले।
स्नेह जिसका दुख हरन कर सुख सुमन बनकर खिले॥
विश्वासों की ज्योति से आलोकित परिवार हो।
भाई-भाई में सदा पावन अमर व्यवहार हो॥१०॥
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