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!! “कल्प भेंटवार्ता : व्यक्तित्व परिचय : श्रीमती प्रियंका माथुर” !!

!! “कल्प भेंटवार्ता : व्यक्तित्व परिचय : श्रीमती प्रियंका माथुर” !! 

 

 दिनाँक :- ९/७/२०२६

 

 सम्पर्क सूत्र :- 9899481000

 

!! “मेरा परिचय” !!  

 

नाम :- प्रियंका माथुर 

 

माता/पिता का नाम :- स्व. श्री वीरेन्द्र प्रसाद माथुर 

                               स्व. श्रीमती सविता माथुर 

 

जन्म स्थान एवं जन्म तिथि :- जयपुर राजस्थान १/१२/७४

 

पति/पत्नी का नाम :- श्री अरूणेश माथुर 

 

बच्चों के नाम :- पुत्री आरूषि माथुर 

                      पुत्र अरूनभ माथुर 

 

शिक्षा :- एम.ए.हिन्दी

 

व्यावसाय :- कुशल गृहिणी और इच्छित रुप से लेखिका

 

वर्तमान निवास :- नई दिल्ली 

 

आपकी मेल आई डी :-

priyankamathur1974@gmail.com

 

आपकी कृतियाँ :- दो कृतियाॅं चंचल मन, जहाॅं रौशनी रह जाती है 

 

आपकी विशिष्ट कृतियाँ :- जहाॅं रौशनी रह जाती है 

 

आपकी प्रकाशित कृतियाँ :- चंचल मन, जहाॅं रौशनी रह जाती है एवं आधा दर्जन से अधिक सांझा संग्रह में मेरी कविताएं छप चुकी है।

 

पुरूस्कार एवं विशिष्ट स्थान :- 

 

१. क्षितिज लीट फेस्ट २०२३ की ओर से क्षितिज एक्सीलेंस अवार्ड

२. क्षितिज लीट फेस्ट २०२४ की ओर से राष्ट्रीय साहित्यिक सम्मान

३. इंडो-म्यांमार फ्रेंडशिप एसोसिएशन: नारी शक्ति एक नई पहल फाउंडेशन की ओर से वुमन प्रेस्टीज अवार्ड २०२४

४. के एफ एल शोस्टॉपर मिसेज इंडिया २०२३ की ओर से अवार्ड   

    ऑफ एप्रिसिएशन

५. क्षितिज लीट फेस्ट २०२५ की ओर से दिनकर साहित्यिक         

      सम्मान 

६ गुफ्तगू साहित्य सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्था द्वारा सीमा अपराजिता अवार्ड २०२६ से सम्मानित 

७ भव्या फाउंडेशन जयपुर द्वारा विशिष्ट अतिथि सम्मान २०२६

 

 

!! “मेरी पसंद” !! 

 

मिलनसार हूॅं तो मुझे लोगों से मिलना जुलना पसंद है। कलमकार हूॅं तो किताबें पढ़ना और अपने अनुभव को रचनात्मक रूप देना मुझे पसंद है। गृहणी हूॅं तो ज़ाहिर सी बात है घर परिवार मेरे लिए सर्वोपरि है और मुझे शौपिंग करना बहुत पसंद है। 

 

उत्सव :- सभी उत्सव पसंद है होली के रंग भी और दिवाली के दीप भी , संक्रांति पर पतंग की उड़ान भी और नवरात्रि की दुर्गा पूजा भी।

 

भोजन :- स्वच्छ और निर्मल भोजन जो प्रेम से परोसा जाये।

 

रंग :- सभी रंग पसंद है ।

 

परिधान :- आरामदायक और सभ्य परिधान ही मेरी पहचान।

 

स्थान एवं तीर्थ स्थान :- घर जो एक मंदिर है और माता पिता के चरण जहां सारे तीर्थ हैं।

 

लेखक/लेखिका :- विशेष रूप किसी एक का चयन नहीं कर सकतीं हूॅं। अनुभवी एवं सरल रचनाकार मेरी पसंद में आते हैं।

 

कवि/कवयित्री :- जिन्हें बार बार पढ़ने का मन करे, खासकर उभरते हुए रचनाकार।

 

उपन्यास/कहानी/पुस्तक :- विशेष रूप से कोई नहीं 

 

कविता/गीत/काव्य खंड :- एक बता पाना मुश्किल है 

 

खेल :- बचपन खेलते थे भाई बहनों के साथ छुपन-छुपाई , गट्टे, चंगापो, लोडो़ , सांप-सीढ़ी खो-खो और लंगड़ी टांग

 

 

फिल्में/धारावाहिक (यदि देखते हैं तो) :- जब वी मेट

 

आपकी लिखी हुई आपकी सबसे प्रिय कृति :- 

 

कल हो ना हो* 

 

तो क्यों ना गुफ्तगू की जाये खुद से

और टटोला जाये उन ख़्वाहिशों को 

जिसे बन्द कर रखा है एक ऐसे सन्दूक में 

जिसका नाम है कल..!! 

 

परन्तु बंधु ये जान लो कि 

कोई अगर मगर नहीं करना

जो कल मिल जाये तो जकड़ कर रखना

बड़ा हठी होता है ये कल 

बदलने में लेता नहीं है पल..!! 

 

ख़्वाहिशें भरी हुई है खज़ाने सी

सोचा था बड़ी हो जाऊँ तो

पूरी कर लूँगी हर तमन्ना 

भला कौन है जो मुझे रोके टोकेगा

सुन वक्त, क्या तू थोड़ा रूकेगा..!! 

 

बोला क्यूँ रूकूँ मैं तुम्हारे लिए 

तुम्हें आज नहीं कल चाहिए..

खोल दो वो ख़्वाहिश वाला सन्दूक 

थाम कर आज के लम्हों की बन्दूक

कल हो ना हो इससे क्या फर्क पड़ता है 

वक्त उसी का होता है जो आज में जीता है..!!🍁 

 

प्रियंका माथुर

 

 

 

!! कल्प भेंटवार्ता के प्रश्न : श्रीमती प्रियंका माथुर जी के उत्तर !! 

 

 

प्रश्न १. – जयपुर की सांस्कृतिक धरती से आरम्भ हुई आपकी जीवन-यात्रा साहित्य की ओर किस प्रकार अग्रसर हुई? वह कौन-सा प्रथम क्षण था जिसने आपको लेखनी का पथ चुनने के लिए प्रेरित किया?

 

प्रियंका जी :- साहित्य में रुचि होने के कारण बचपन से ही थोड़ा बहुत लिखतीं रहती थी, परंतु फाड़ कर फेंक दिया करती थी, डरती थी कि कहीं कोई मेरी कलम की कल्पना को हकीकत न समझ बैठे। एक दिन घर में दिवाली की सफाई करते हुए मेरे लिखे कुछ काग़ज़ भाई बहनों के हाथ लग गये और उन्होंने मेरी कविताएं पसंद की और प्रोत्साहित किया लिखने के लिए, तबसे थोड़ा सहेजा अपनी रचनाओं को, फिर एक पल आया जब पहली बार फेसबुक के एक मंच पर अपनी कविता को विजेता की श्रेणी में देखा तो प्रेरणा मिलती रही और आज हम यहां हैं।

 

 

 

प्रश्न २. – आपने स्वयं को “इच्छित रूप से लेखिका” कहा है। आपके लिए लेखन केवल अभिव्यक्ति है या आत्मसंवाद का माध्यम?

 

प्रियंका जी :- लेखन मेरे लिए भावों की अभिव्यक्ति होने के साथ साथ स्वयं को जानने का माध्यम है। कभी कभी ऐसा होता है जब हम कविता की रचना कर रहे होते हैं तो भाव को व्यक्त करने से पहले मनन करते हैं कि हमारे शब्द उन भावों के साथ उचित न्याय कर रहे हैं या नहीं। इस तरीके से मैं अपने आपको स्वयं के और करीब महसूस करती हूॅं तो कह सकते हैं कि लेखन मेरे आत्मसवांद का माध्यम भी है।

 

 

 

प्रश्न ३. – एक कुशल गृहिणी, संवेदनशील लेखिका और पारिवारिक दायित्वों के मध्य आपने संतुलन किस प्रकार स्थापित किया?

 

प्रियंका जी :- मेरे लिए सर्वोपरि परिवार है वहीं से मुझे ताकत और प्रेरणा दोनों मिलती है। आपने वो कहावत तो सुनी होगी इस हाथ दे उस हाथ ले। संतुलन बनाए रखना किसी एक के लिए संभव नहीं है जब सब मिलकर चलते हैं एक दूसरे की इच्छाओं का मान रखते हैं तो हर कार्य सफल हो जाता है। धैर्य और संयम कुंजी है।

 

 

 

प्रश्न ४. – आपकी कृतियाँ ‘चंचल मन’ और ‘जहाँ रौशनी रह जाती है’ अपने शीर्षकों से ही गहन संवेदनाओं का आभास कराती हैं। इनके सृजन की प्रेरणा क्या रही?

 

प्रियंका जी :- चंचल मन जैसे कि नाम से ही ज़ाहिर है तो उसका सृजन भी चंचलता से ही हुआ यह संग्रह मेरी प्रथम डायरी के कुछ पन्ने है जिन्हें मैंने बचपन की कोमलता और अल्हड़पन से संवारा है। मेरे पापा का चंचल नाम प्रसिद्ध हुआ है इसलिए मैंने इस संग्रह को उन्हें ही समर्पित किया है।

 

जहॉं रौशनी रह जाती है मेरी संवेदनाओं का वह हिस्सा है जो दिल के बहुत करीब है। ज़िन्दगी में एक समय ऐसा आता है जब हम अचानक से बड़े हो जाते हैं अर्थात वो एक हाथ जिसका स्पर्श हमेशा हमारे सिर पर होता है वो अंतर्ध्यान हो जाता है और रह जाता है सिर्फ आभास । उसी आभास को मैंने अपनी कलम से आप सब तक पहुंचाने की कोशिश की है। मेरी मां का नाम सविता था,जिसका शाब्दिक अर्थ रौशनी होता है।अपनी मां को समर्पित यह कृति मेरे लिए अनमोल है।

 

 

 

प्रश्न ५. – राजस्थान की सांस्कृतिक राजधानी जयपुर में आपका जन्म हुआ। इस गुलाबी नगरी की सांस्कृतिक विरासत, लोकजीवन और सौंदर्य ने आपके व्यक्तित्व तथा आपकी लेखनी को किस प्रकार प्रभावित किया? क्या आज भी जयपुर की स्मृतियाँ आपकी रचनाओं में कहीं न कहीं स्पंदित होती हैं?

 

प्रियंका जी :- पूर्ण रूप से प्रभावित किया है। मेरी हर रचना में आप जयपुर का जिक्र पा जायेंगे। बचपन का समय ,नाना की हवेली, कॉलेज की सहेली , नुक्कड़ वाला स्कूल, साईकिल की घंटी और कच्चे आम की चोरी यह सब मुझे आज भी मुझे उन्हीं गलियों की सैर कराती हैं जहां की खूशबू रगो में बसी हुई है। राजस्थान की परम्परा और स्वादिष्ट भोजन बहुत रोचक होते हैं।

 

 

 

प्रश्न ६. – आपकी रचनाओं में जीवन, समय और आत्ममंथन की गहरी अनुभूति दिखाई देती है। क्या आपकी लेखनी जीवन के अनुभवों से अधिक प्रभावित है या कल्पना से?

 

प्रियंका जी :- अनुभवों से। कल्पना मात्र एक ज़रीया है जिसके सहारे हम अपनी बात को सरलता से कह पाते हैं। बिना कल्पना के तो लेखक अपाहिज हो जायेगा। कल्पना का अनुभव कह सकते हैं।

 

 

 

प्रश्न ७. – आपकी कविता ‘कल हो ना हो’ वर्तमान क्षण को जीने का अत्यंत सुंदर संदेश देती है। इस रचना के पीछे कौन-सा जीवनानुभव या चिंतन रहा?

 

प्रियंका जी :- २०१९ कोविड का समय कटु अनुभव का रहा है। उन दिनों सुबह और शाम की ही खबर नहीं होती थी। मन बहुत विचलित रहता था। उस समय देखा जाए तो मंथन हुआ हृदय का और जान पाई कि जो है वो आज ही में है अभी में है। बेकार की बातों और गिले शिकवों को छोड़कर जो पल हैं उन्हें ही पूरी तरह से जीयो क्योंकि क्या पता कल हो ना हो।

 

 

 

प्रश्न ८. – आपकी दृष्टि में साहित्य का वास्तविक उद्देश्य क्या है—मनोरंजन, आत्मशुद्धि, सामाजिक परिवर्तन अथवा मानवीय संवेदनाओं का संरक्षण?

 

प्रियंका जी :- मेरी दृष्टि से देखा जाए तो साहित्य का वास्तविक उद्देश्य पाठक की मनोस्थिति पर निर्भर करता है उसकी रूचि पर निर्भर करता है। जिन पाठकों को मनोरंजन चाहिए वे साहित्य में मनोरंजन तलाश लेते हैं और जिन्हें समाज में परिवर्तन चाहिए वे साहित्य को उसी दृष्टि से पढ़ेंगे।

 

 

 

प्रश्न ९. – आप किसी एक लेखक या कवि तक स्वयं को सीमित नहीं मानतीं। विविध साहित्यकारों का अध्ययन आपकी लेखनी को किस प्रकार नई दृष्टि और विस्तार प्रदान करता है?

 

प्रियंका जी :- देखिये जी हम इंसान हैं और हमारा मन एक भंवरा है जो कभी भी एक फूल पर नहीं ठहर सकता है। जैसा मैंने अभी थोड़ी देर पहले कहा कि विविधता में ही रंग हैं और रंग है तो विस्तार है। प्रकृति की भांति ही मेरा लेखन भी विस्तृत होता है। कभी कठोर और कभी निर्मल।

 

 

 

प्रश्न १०. – आपने कहा है कि “घर एक मंदिर है और माता-पिता के चरण ही समस्त तीर्थ हैं।” इस जीवन-दृष्टि ने आपके व्यक्तित्व और साहित्य को किस प्रकार समृद्ध किया?

 

प्रियंका जी :- ज़िन्दगी में हमें बहुत से सबक सिखाती है। बस उसके एहसास हमें देर से होते है। चारों माता पिता के परलोक गमन के बाद ही यह समझ कि वे ही सबकुछ थे। एक किस्सा है इस प्रश्न के उत्तर में अगर समय हुआ तो जरूर सुनाऊंगी।

 

 

 

प्रश्न ११. – आपको अनेक प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं सामाजिक सम्मानों से अलंकृत किया गया है। इन सम्मानों को आप अपनी साहित्यिक यात्रा में किस भाव से स्वीकार करती हैं?

 

प्रियंका जी :- ईश्वर की कृपा, बड़ों का आशीर्वाद और मेरे पाठकों का मित्रों का स्नेह और प्रोत्साहन,परिवार का मुझ पर विश्वास।

 

 

 

प्रश्न १२. – आपकी दृष्टि में एक सशक्त महिला लेखिका का समाज और साहित्य के प्रति सबसे बड़ा उत्तरदायित्व क्या है?

 

प्रियंका जी :- यहां महिला लेखिका कहकर मैं साहित्य को दो वर्गों में बंटा हुआ महसूस कर रही हूॅं। साहित्य की रचना चाहे महिला करें या पुरुष करें उनका एक मात्र उद्देश्य साहित्य की सेवा होना चाहिए। फिर वो कहानी हो, कविता हो गीत हो या उपन्यास हो।

 

 

 

प्रश्न १३. – यदि आपको अपनी सम्पूर्ण साहित्यिक यात्रा को केवल एक शब्द में अभिव्यक्त करना हो, तो वह शब्द क्या होगा और क्यों?

 

प्रियंका जी :- संतुष्टी क्योंकि जब मैं कोई रचना रच रही होती हूॅं तो उलझी हुई होती हूॅं कल्पना और हकीकत के बीच में, जैसे- जैसे रचना आकार ले लेती है तो संतुष्टी मिलती है कि हां मैंने कर लिया,कर दिया अपनी भावनाओं को काग़ज़ के हवाले,अब पाठक चाहें तो हवाई जहाज बनायें या फिर छोटी-सी किश्ती और संजो ले अपने अनुभव को मेरी कविता के माध्यम से।

 

 

 

प्रश्न १४. – आज के डिजिटल युग में हिंदी साहित्य के समक्ष आपको कौन-सी प्रमुख चुनौतियाँ और कौन-सी नवीन संभावनाएँ दिखाई देती हैं?

 

प्रियंका जी :- चुनौतियां तो जीवन का हिस्सा है एक बार समाना करलें तो वश में हो जाती है। देर तक टाइप करना और गलत बटन दब जाने पर सारा कुछ मिट जाना, ऐसा कई बार हुआ परन्तु बच्चों की मदद से उसमें भी कामयाबी हासिल कर ली।

नवीन संभावना यही है कि डिजिटल मीडिया के माध्यम से हमारी पहुंच विस्तृत हो गई है एक मुठ्ठी में दुनिया लिए बैठे हैं। 

 

 

 

प्रश्न १५. – अंत में, नवोदित साहित्यकारों एवं हमारे समस्त श्रोताओं के लिए आपका प्रेरणादायी संदेश क्या होगा?

 

प्रियंका जी :- समस्त श्रोताओं से बस यही कहुंगी कि वर्तमान में जीना सीखें और इच्छा नाम की चिड़िया को पंख दे । क्योंकि हर घड़ी बदल रही है रूप ज़िन्दगी।

 

✍🏻 वार्ता : श्रीमती प्रियंका माथुर 

 

 

 

कल्प भेंटवार्ता में व्यक्तित्व परिचय के अंतर्गत आपका परिचय प्रबुद्ध साहित्यकार से कराने का विशेष प्रयास करते हुए आज हम बात कर रहे हैं राजेन्द्र नगर, दिल्ली की कवयित्री श्रीमती प्रियंका माथुर जी से। इन्हें विस्तार से सुनने व देखने के लिए हमारे यूट्यूब चैनल पर जाएं 👇

 

 

https://www.youtube.com/live/5TapLY2n5O0?si=-yQn3Fq4wF1PVk4D

 

 

 

इनसे बातें करना व मिलना आपको कैसा लगा? आप हमें कमेन्ट में बता सकते हैं। आपकी विशिष्ट

!! “कल्प भेंटवार्ता : व्यक्तित्व परिचय : श्रीमती प्रियंका माथुर” !! 

 दिनाँक :- ९/७/२०२६

 

 सम्पर्क सूत्र :- 9899481000

 

!! “मेरा परिचय” !!  

 

नाम :- प्रियंका माथुर 

 

माता/पिता का नाम :- स्व. श्री वीरेन्द्र प्रसाद माथुर 

                               स्व. श्रीमती सविता माथुर 

 

जन्म स्थान एवं जन्म तिथि :- जयपुर राजस्थान १/१२/७४

 

पति/पत्नी का नाम :- श्री अरूणेश माथुर 

 

बच्चों के नाम :- पुत्री आरूषि माथुर 

                      पुत्र अरूनभ माथुर 

 

शिक्षा :- एम.ए.हिन्दी

 

व्यावसाय :- कुशल गृहिणी और इच्छित रुप से लेखिका

 

वर्तमान निवास :- नई दिल्ली 

 

आपकी मेल आई डी :-

priyankamathur1974@gmail.com

 

आपकी कृतियाँ :- दो कृतियाॅं चंचल मन, जहाॅं रौशनी रह जाती है 

 

आपकी विशिष्ट कृतियाँ :- जहाॅं रौशनी रह जाती है 

 

आपकी प्रकाशित कृतियाँ :- चंचल मन, जहाॅं रौशनी रह जाती है एवं आधा दर्जन से अधिक सांझा संग्रह में मेरी कविताएं छप चुकी है।

 

पुरूस्कार एवं विशिष्ट स्थान :- 

 

१. क्षितिज लीट फेस्ट २०२३ की ओर से क्षितिज एक्सीलेंस अवार्ड

२. क्षितिज लीट फेस्ट २०२४ की ओर से राष्ट्रीय साहित्यिक सम्मान

३. इंडो-म्यांमार फ्रेंडशिप एसोसिएशन: नारी शक्ति एक नई पहल                          फाउंडेशन की ओर से वुमन प्रेस्टीज अवार्ड २०२४

४. के एफ एल शोस्टॉपर मिसेज इंडिया २०२३ की ओर से अवार्ड   

    ऑफ एप्रिसिएशन

५. क्षितिज लीट फेस्ट २०२५ की ओर से दिनकर साहित्यिक         

      सम्मान 

६ गुफ्तगू साहित्य सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्था द्वारा सीमा अपराजिता अवार्ड २०२६ से सम्मानित 

७ भव्या फाउंडेशन जयपुर द्वारा विशिष्ट अतिथि सम्मान २०२६

!! “मेरी पसंद” !! 

 

मिलनसार हूॅं तो मुझे लोगों से मिलना जुलना पसंद है। कलमकार हूॅं तो किताबें पढ़ना और अपने अनुभव को रचनात्मक रूप देना मुझे पसंद है। गृहणी हूॅं तो ज़ाहिर सी बात है घर परिवार मेरे लिए सर्वोपरि है और मुझे शौपिंग करना बहुत पसंद है। 

 

उत्सव :- सभी उत्सव पसंद है होली के रंग भी और दिवाली के दीप भी , संक्रांति पर पतंग की उड़ान भी और नवरात्रि की दुर्गा पूजा भी।

 

भोजन :- स्वच्छ और निर्मल भोजन जो प्रेम से परोसा जाये।

 

रंग :- सभी रंग पसंद है ।

 

परिधान :- आरामदायक और सभ्य परिधान ही मेरी पहचान।

 

स्थान एवं तीर्थ स्थान :- घर जो एक मंदिर है और माता पिता के चरण जहां सारे तीर्थ हैं।

 

लेखक/लेखिका :- विशेष रूप किसी एक का चयन नहीं कर सकतीं हूॅं। अनुभवी एवं सरल रचनाकार मेरी पसंद में आते हैं।

 

कवि/कवयित्री :- जिन्हें बार बार पढ़ने का मन करे, खासकर उभरते हुए रचनाकार।

 

उपन्यास/कहानी/पुस्तक :- विशेष रूप से कोई नहीं 

 

कविता/गीत/काव्य खंड :- एक बता पाना मुश्किल है 

 

खेल :- बचपन खेलते थे भाई बहनों के साथ छुपन-छुपाई , गट्टे, चंगापो, लोडो़ , सांप-सीढ़ी खो-खो और लंगड़ी टांग

फिल्में/धारावाहिक (यदि देखते हैं तो) :- जब वी मेट

 

आपकी लिखी हुई आपकी सबसे प्रिय कृति :- 

 

कल हो ना हो* 

 

तो क्यों ना गुफ्तगू की जाये खुद से

और टटोला जाये उन ख़्वाहिशों को 

जिसे बन्द कर रखा है एक ऐसे सन्दूक में 

जिसका नाम है कल..!! 

 

परन्तु बंधु ये जान लो कि 

कोई अगर मगर नहीं करना

जो कल मिल जाये तो जकड़ कर रखना

बड़ा हठी होता है ये कल 

बदलने में लेता नहीं है पल..!! 

 

ख़्वाहिशें भरी हुई है खज़ाने सी

सोचा था बड़ी हो जाऊँ तो

पूरी कर लूँगी हर तमन्ना 

भला कौन है जो मुझे रोके टोकेगा

सुन वक्त, क्या तू थोड़ा रूकेगा..!! 

 

बोला क्यूँ रूकूँ मैं तुम्हारे लिए 

तुम्हें आज नहीं कल चाहिए..

खोल दो वो ख़्वाहिश वाला सन्दूक 

थाम कर आज के लम्हों की बन्दूक

कल हो ना हो इससे क्या फर्क पड़ता है 

वक्त उसी का होता है जो आज में जीता है..!!🍁 

 

प्रियंका माथुर

!! कल्प भेंटवार्ता के प्रश्न : श्रीमती प्रियंका माथुर जी के उत्तर !! 

प्रश्न १. – जयपुर की सांस्कृतिक धरती से आरम्भ हुई आपकी जीवन-यात्रा साहित्य की ओर किस प्रकार अग्रसर हुई? वह कौन-सा प्रथम क्षण था जिसने आपको लेखनी का पथ चुनने के लिए प्रेरित किया?

 

प्रियंका जी :- साहित्य में रुचि होने के कारण बचपन से ही थोड़ा बहुत लिखतीं रहती थी, परंतु फाड़ कर फेंक दिया करती थी, डरती थी कि कहीं कोई मेरी कलम की कल्पना को हकीकत न समझ बैठे। एक दिन घर में दिवाली की सफाई करते हुए मेरे लिखे कुछ काग़ज़ भाई बहनों के हाथ लग गये और उन्होंने मेरी कविताएं पसंद की और प्रोत्साहित किया लिखने के लिए, तबसे थोड़ा सहेजा अपनी रचनाओं को, फिर एक पल आया जब पहली बार फेसबुक के एक मंच पर अपनी कविता को विजेता की श्रेणी में देखा तो प्रेरणा मिलती रही और आज हम यहां हैं।

प्रश्न २. – आपने स्वयं को “इच्छित रूप से लेखिका” कहा है। आपके लिए लेखन केवल अभिव्यक्ति है या आत्मसंवाद का माध्यम?

 

प्रियंका जी :- लेखन मेरे लिए भावों की अभिव्यक्ति होने के साथ साथ स्वयं को जानने का माध्यम है। कभी कभी ऐसा होता है जब हम कविता की रचना कर रहे होते हैं तो भाव को व्यक्त करने से पहले मनन करते हैं कि हमारे शब्द उन भावों के साथ उचित न्याय कर रहे हैं या नहीं। इस तरीके से मैं अपने आपको स्वयं के और करीब महसूस करती हूॅं तो कह सकते हैं कि लेखन मेरे आत्मसवांद का माध्यम भी है।

प्रश्न ३. – एक कुशल गृहिणी, संवेदनशील लेखिका और पारिवारिक दायित्वों के मध्य आपने संतुलन किस प्रकार स्थापित किया?

 

प्रियंका जी :- मेरे लिए सर्वोपरि परिवार है वहीं से मुझे ताकत और प्रेरणा दोनों मिलती है। आपने वो कहावत तो सुनी होगी इस हाथ दे उस हाथ ले। संतुलन बनाए रखना किसी एक के लिए संभव नहीं है जब सब मिलकर चलते हैं एक दूसरे की इच्छाओं का मान रखते हैं तो हर कार्य सफल हो जाता है। धैर्य और संयम कुंजी है।

प्रश्न ४. – आपकी कृतियाँ ‘चंचल मन’ और ‘जहाँ रौशनी रह जाती है’ अपने शीर्षकों से ही गहन संवेदनाओं का आभास कराती हैं। इनके सृजन की प्रेरणा क्या रही?

 

प्रियंका जी :- चंचल मन जैसे कि नाम से ही ज़ाहिर है तो उसका सृजन भी चंचलता से ही हुआ यह संग्रह मेरी प्रथम डायरी के कुछ पन्ने है जिन्हें मैंने बचपन की  कोमलता और अल्हड़पन से संवारा है। मेरे पापा का चंचल नाम प्रसिद्ध हुआ है इसलिए मैंने इस संग्रह को उन्हें ही समर्पित किया है।

 

जहॉं रौशनी रह जाती है मेरी संवेदनाओं का वह हिस्सा है जो दिल के बहुत करीब है। ज़िन्दगी में एक समय ऐसा आता है जब हम अचानक से बड़े हो जाते हैं अर्थात वो एक हाथ जिसका स्पर्श हमेशा हमारे सिर पर होता है वो अंतर्ध्यान हो जाता है और रह जाता है सिर्फ आभास । उसी आभास को मैंने अपनी कलम से आप सब तक पहुंचाने की कोशिश की है। मेरी मां का नाम सविता था,जिसका शाब्दिक अर्थ रौशनी होता है।अपनी मां को समर्पित यह कृति मेरे लिए अनमोल है।

प्रश्न ५. – राजस्थान की सांस्कृतिक राजधानी जयपुर में आपका जन्म हुआ। इस गुलाबी नगरी की सांस्कृतिक विरासत, लोकजीवन और सौंदर्य ने आपके व्यक्तित्व तथा आपकी लेखनी को किस प्रकार प्रभावित किया? क्या आज भी जयपुर की स्मृतियाँ आपकी रचनाओं में कहीं न कहीं स्पंदित होती हैं?

 

प्रियंका जी :-  पूर्ण रूप से प्रभावित किया है। मेरी हर रचना में आप जयपुर का जिक्र पा जायेंगे। बचपन का समय ,नाना की हवेली, कॉलेज की सहेली , नुक्कड़ वाला स्कूल, साईकिल की घंटी और कच्चे आम की चोरी यह सब मुझे आज भी मुझे उन्हीं गलियों की सैर कराती हैं जहां की खूशबू रगो में बसी हुई है। राजस्थान की परम्परा और स्वादिष्ट भोजन बहुत रोचक होते हैं।

प्रश्न ६. – आपकी रचनाओं में जीवन, समय और आत्ममंथन की गहरी अनुभूति दिखाई देती है। क्या आपकी लेखनी जीवन के अनुभवों से अधिक प्रभावित है या कल्पना से?

 

प्रियंका जी :- अनुभवों से। कल्पना मात्र एक ज़रीया है जिसके सहारे हम अपनी बात को सरलता से कह पाते हैं। बिना कल्पना के तो लेखक अपाहिज हो जायेगा। कल्पना का अनुभव कह सकते हैं।

प्रश्न ७. – आपकी कविता ‘कल हो ना हो’ वर्तमान क्षण को जीने का अत्यंत सुंदर संदेश देती है। इस रचना के पीछे कौन-सा जीवनानुभव या चिंतन रहा?

 

प्रियंका जी :-  २०१९ कोविड का समय कटु अनुभव का रहा है। उन दिनों सुबह और शाम की ही खबर नहीं होती थी। मन बहुत विचलित रहता था। उस समय देखा जाए तो मंथन हुआ हृदय का और जान पाई कि जो है वो आज ही में है अभी में है। बेकार की बातों और गिले शिकवों को छोड़कर जो पल हैं उन्हें ही पूरी तरह से जीयो क्योंकि क्या पता कल हो ना हो।

प्रश्न ८. – आपकी दृष्टि में साहित्य का वास्तविक उद्देश्य क्या है—मनोरंजन, आत्मशुद्धि, सामाजिक परिवर्तन अथवा मानवीय संवेदनाओं का संरक्षण?

 

प्रियंका जी :-  मेरी दृष्टि से देखा जाए तो साहित्य का वास्तविक उद्देश्य पाठक की मनोस्थिति पर निर्भर करता है उसकी रूचि पर निर्भर करता है। जिन पाठकों को मनोरंजन चाहिए वे साहित्य में मनोरंजन तलाश लेते हैं और जिन्हें समाज में परिवर्तन चाहिए वे साहित्य को उसी दृष्टि से पढ़ेंगे।

प्रश्न ९. – आप किसी एक लेखक या कवि तक स्वयं को सीमित नहीं मानतीं। विविध साहित्यकारों का अध्ययन आपकी लेखनी को किस प्रकार नई दृष्टि और विस्तार प्रदान करता है?

 

प्रियंका जी :- देखिये जी हम इंसान हैं और हमारा मन एक भंवरा है जो कभी भी एक फूल पर नहीं ठहर सकता है। जैसा मैंने अभी थोड़ी देर पहले कहा कि विविधता में ही रंग हैं और रंग है तो विस्तार है। प्रकृति की भांति ही मेरा लेखन भी विस्तृत होता है। कभी कठोर और कभी निर्मल।

प्रश्न १०. – आपने कहा है कि “घर एक मंदिर है और माता-पिता के चरण ही समस्त तीर्थ हैं।” इस जीवन-दृष्टि ने आपके व्यक्तित्व और साहित्य को किस प्रकार समृद्ध किया?

 

प्रियंका जी :-  ज़िन्दगी में हमें बहुत से सबक सिखाती है। बस उसके एहसास हमें देर से होते है। चारों माता पिता के परलोक गमन के बाद ही यह समझ कि वे ही सबकुछ थे। एक किस्सा है इस प्रश्न के उत्तर में अगर समय हुआ तो जरूर सुनाऊंगी।

प्रश्न ११. – आपको अनेक प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं सामाजिक सम्मानों से अलंकृत किया गया है। इन सम्मानों को आप अपनी साहित्यिक यात्रा में किस भाव से स्वीकार करती हैं?

 

प्रियंका जी :- ईश्वर की कृपा, बड़ों का आशीर्वाद और मेरे पाठकों का मित्रों का स्नेह और प्रोत्साहन,परिवार का मुझ पर विश्वास।

प्रश्न १२. – आपकी दृष्टि में एक सशक्त महिला लेखिका का समाज और साहित्य के प्रति सबसे बड़ा उत्तरदायित्व क्या है?

 

प्रियंका जी :- यहां महिला लेखिका कहकर मैं साहित्य को दो वर्गों में बंटा हुआ महसूस कर रही हूॅं। साहित्य की रचना चाहे महिला करें या पुरुष करें उनका एक मात्र उद्देश्य साहित्य की सेवा होना चाहिए। फिर वो कहानी हो, कविता हो गीत हो या उपन्यास हो।

प्रश्न १३. – यदि आपको अपनी सम्पूर्ण साहित्यिक यात्रा को केवल एक शब्द में अभिव्यक्त करना हो, तो वह शब्द क्या होगा और क्यों?

 

प्रियंका जी :- संतुष्टी क्योंकि जब मैं कोई रचना रच रही होती हूॅं तो उलझी हुई होती हूॅं कल्पना और हकीकत के बीच में, जैसे- जैसे रचना आकार ले लेती है तो संतुष्टी मिलती है कि हां मैंने कर लिया,कर  दिया अपनी भावनाओं को काग़ज़ के हवाले,अब पाठक चाहें तो हवाई जहाज बनायें या फिर छोटी-सी किश्ती और संजो ले अपने अनुभव को मेरी कविता के माध्यम से।

प्रश्न १४. – आज के डिजिटल युग में हिंदी साहित्य के समक्ष आपको कौन-सी प्रमुख चुनौतियाँ और कौन-सी नवीन संभावनाएँ दिखाई देती हैं?

 

प्रियंका जी :-  चुनौतियां तो जीवन का हिस्सा है एक बार समाना करलें तो वश में हो जाती है। देर तक टाइप करना और गलत बटन दब जाने पर सारा कुछ मिट जाना, ऐसा कई बार हुआ परन्तु बच्चों की मदद से उसमें भी कामयाबी हासिल कर ली।

नवीन संभावना यही है कि डिजिटल मीडिया के माध्यम से हमारी पहुंच विस्तृत हो गई है एक मुठ्ठी में दुनिया लिए बैठे हैं। 

प्रश्न १५. – अंत में, नवोदित साहित्यकारों एवं हमारे समस्त श्रोताओं के लिए आपका प्रेरणादायी संदेश क्या होगा?

 

प्रियंका जी :- समस्त श्रोताओं से बस यही कहुंगी कि वर्तमान में जीना सीखें और इच्छा नाम की चिड़िया को पंख दे । क्योंकि हर घड़ी बदल रही है रूप ज़िन्दगी।

 

✍🏻 वार्ता : श्रीमती प्रियंका माथुर 

कल्प भेंटवार्ता में व्यक्तित्व परिचय के अंतर्गत आपका परिचय प्रबुद्ध साहित्यकार से कराने का विशेष प्रयास करते हुए आज हम बात कर रहे हैं राजेन्द्र नगर, दिल्ली की कवयित्री श्रीमती प्रियंका माथुर जी से। इन्हें विस्तार से सुनने व देखने के लिए हमारे यूट्यूब चैनल पर जाएं 👇

https://www.youtube.com/live/5TapLY2n5O0?si=-yQn3Fq4wF1PVk4D

इनसे बातें करना व मिलना आपको कैसा लगा? आप हमें कमेन्ट में बता सकते हैं। आपकी विशिष्ट प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी। 

 

मिलते हैं अगले सप्ताह एक और प्रबुद्ध साहित्यकार के साथ। तब तक के लिए हमें आज्ञा दीजिये। 

राधे राधे 🙏 🪷 🙏 

 

✍🏻 लिखते रहिये 📖 पढ़ते रहिये और 🚶 बढ़ते रहिये ✴️ 

 

✍🏻 प्रश्नकर्ता : कल्प भेंटवार्ता प्रबंधन 

 

🦚 आयोजक : कल्पकथा प्रमुख श्री राधागोपीनाथ

 

मिलते हैं अगले सप्ताह एक और प्रबुद्ध साहित्यकार के साथ। तब तक के लिए हमें आज्ञा दीजिये। 

राधे राधे 🙏 🪷 🙏 

 

✍🏻 लिखते रहिये 📖 पढ़ते रहिये और 🚶 बढ़ते रहिये ✴️ 

 

✍🏻 प्रश्नकर्ता : कल्प भेंटवार्ता प्रबंधन 

 

🦚 आयोजक : कल्पकथा प्रमुख श्री राधागोपीनाथ जी 

 

 

कल्प भेंटवार्ता

One Reply to “!! “कल्प भेंटवार्ता : व्यक्तित्व परिचय : श्रीमती प्रियंका माथुर” !!”

  • पवनेश

    राधे राधे आदरणीया श्रीमती प्रियंका माथुर जी के साथ भेंटवार्ता कार्यक्रम बहुत आनंददायक रहा। 🙏🌹🙏

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