“टूटा हुआ दिल”
“टूटे दिल की आवाज़”
रात के बारह बज चुके थे।
अक्षिता अपने कमरे की खिड़की के पास बैठी थी। बाहर बारिश लगातार बरस रही थी। काँच पर फिसलती बूँदें कभी आपस में मिल जातीं, कभी अकेली ही नीचे उतर जातीं-ठीक वैसे ही जैसे कुछ रिश्ते साथ चलने के बाद अचानक अपनी-अपनी दिशाओं में बह जाते हैं।
अक्षिता ने हथेली से काँच पर जमी धुंध को थोड़ा साफ किया।
तभी पीछे रखे टेबल लैंप की रोशनी एक बार काँपी।
अक्षिता ने पलटकर देखा।
कुछ नहीं था।
वह फिर खिड़की की ओर मुड़ी।
साया:
“तुम अब भी बारिश में खिड़की के पास बैठती हो?”
अक्षिता का हाथ वहीं रुक गया।
कुछ क्षण तक उसके होंठों से आवाज नहीं निकली।
अक्षिता:
“क… कौन है?”
कमरे के कोने में पड़ी पुरानी आरामकुर्सी पर जैसे अँधेरा थोड़ा गहरा हुआ। फिर वह अँधेरा धीरे-धीरे एक मानवीय आकृति में बदलने लगा।
चेहरा स्पष्ट नहीं था।
बस आवाज थी।
और उस आवाज में एक ऐसी पहचान थी, जिसे कानों से नहीं… दिल से पहचाना जाता था।
साया:
“डरो मत, अक्षिता।”
अक्षिता धीरे-धीरे कुर्सी से उठी।
अक्षिता:
“तुम्हें मेरा नाम कैसे पता?”
साया ने कुछ नहीं कहा।
खिड़की के बाहर बिजली चमकी और क्षणभर के लिए उसकी आकृति स्पष्ट हुई।
अक्षिता की साँस अटक गई।
अक्षिता:
“सिद्धार्थ…?”
साया हल्का-सा मुस्कुराया।
साया:
“नहीं।”
अक्षिता:
“तो फिर तुम कौन हो?”
साया:
“जो सिद्धार्थ छोड़ गया था… वही।”
अक्षिता की आँखें भर आईं।
अक्षिता:
“यादें?”
साया:
“यादें… अधूरे वादे… उन बातों की गूँज जिन्हें तुमने कभी किसी से नहीं कहा… और वह प्रेम जिसे तुमने विदा तो कर दिया, मगर अपने भीतर से जाने नहीं दिया।”
अक्षिता ने अपनी उँगलियाँ कसकर भींच लीं।
अक्षिता:
“लेकिन सिद्धार्थ तो जिंदा है।”
साया:
“मुझे मालूम है।”
अक्षिता:
“वह अपनी जिंदगी जी रहा है।”
साया:
“मुझे यह भी मालूम है।”
अक्षिता:
“फिर तुम यहाँ क्यों हो?”
साया कुछ पल मौन रहा।
फिर बहुत धीमे स्वर में बोला—
साया:
“क्योंकि वह चला गया था… तुम नहीं।”
अक्षिता की पलकों पर ठहरी एक बूँद गाल तक उतर आई।
साया:
“तुम्हारे कमरे में उसकी कोई चीज नहीं बची, अक्षिता। लेकिन तुम्हारे दिल में उसकी बहुत-सी चीजें अभी भी रखी हैं।”
अक्षिता:
“मैंने उसे भूलने की कोशिश की है।”
साया:
“भूलना चाहा है… भूल नहीं पाई।”
अक्षिता ने कोई उत्तर नहीं दिया।
बाहर बारिश तेज हो गई।
साया ने खिड़की की ओर देखा।
साया:
“तुम्हें याद है… वह कहा करता था कि बारिश में तुम्हारा उदास होना उसे अच्छा नहीं लगता?”
अक्षिता ने आँखें बंद कर लीं।
उस एक वाक्य ने जैसे तीन साल पुराना दरवाजा खोल दिया।
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“वे तीन साल, जो अब भी साँस लेते थे”
अक्षिता:
“अगर तुम सचमुच मेरी यादें हो… तो मुझे मेरी पूरी कहानी दिखाओ।”
साया उसके सामने आकर खड़ा हो गया।
साया:
“पूरी कहानी?”
अक्षिता:
“हाँ। केवल वह हिस्सा नहीं, जहाँ वह चला गया था। उससे पहले का भी।”
साया ने अपना हाथ आगे बढ़ाया।
अक्षिता ने कुछ क्षण उसकी ओर देखा, फिर अपनी हथेली उसके हाथ पर रख दी।
स्पर्श नहीं था।
फिर भी उसे लगा जैसे किसी पुराने परिचित स्पर्श की गर्माहट उसकी उँगलियों से होती हुई सीने तक उतर गई हो।
कमरे की दीवारें धीरे-धीरे धुंधली होने लगीं।
और फिर—
पहला दृश्य सामने था।
पहली मुलाकात
कॉलेज की लाइब्रेरी।
दोपहर की शांत रोशनी खिड़की से भीतर आ रही थी। अक्षिता ऊँची शेल्फ से किताब निकालने के लिए पंजों के बल उठी, मगर किताब उसकी उँगलियों की पहुँच से कुछ ऊपर थी।
तभी पीछे से एक हाथ आया और किताब निकालकर उसके सामने कर दी।
सिद्धार्थ:
“यह चाहिए?”
अक्षिता ने पलटकर देखा।
अक्षिता:
“हाँ… धन्यवाद।”
सिद्धार्थ ने किताब उसकी ओर बढ़ाई, मगर किताब छोड़ने से पहले मुस्कुराया।
सिद्धार्थ:
“इतनी बड़ी किताब पढ़ने की आदत है?”
अक्षिता:
“क्यों? आपको छोटी किताबें पसंद हैं?”
सिद्धार्थ:
“नहीं। मुझे तो बस उन लोगों से बात करना पसंद है जो किताबें पढ़ते हैं।”
अक्षिता ने किताब सीने से लगा ली।
अक्षिता:
“और अगर वह व्यक्ति बात न करना चाहे?”
सिद्धार्थ ने एक कदम पीछे हटते हुए कहा—
सिद्धार्थ:
“तो इंतजार करना आता है।”
दृश्य धीरे-धीरे धुंधला हुआ।
अक्षिता वर्तमान में मुस्कुरा उठी।
अक्षिता:
“वह इतना आत्मविश्वासी कब से था?”
साया:
“जिस दिन तुमने पहली बार उसे मुस्कुराकर देखा था, शायद उसी दिन।”
बारिश वाली शाम
दृश्य बदला।
कॉलेज का वही रास्ता।
बारिश अचानक शुरू हो गई थी।
अक्षिता पेड़ के नीचे खड़ी होकर अपने दुपट्टे को बारिश से बचाने की कोशिश कर रही थी।
सिद्धार्थ दौड़ता हुआ आया।
उसके बालों से पानी टपक रहा था।
उसने अपनी छतरी अक्षिता के ऊपर कर दी।
अक्षिता:
“तुम खुद भीग रहे हो।”
सिद्धार्थ:
“तो?”
अक्षिता:
“छतरी मेरी तरफ क्यों?”
सिद्धार्थ:
“क्योंकि तुम्हें सर्दी जल्दी लगती है।”
अक्षिता ने उसे देखा।
अक्षिता:
“तुम्हें कैसे पता?”
सिद्धार्थ कुछ क्षण चुप रहा।
फिर मुस्कुराया।
सिद्धार्थ:
“तुम्हारी इतनी सारी बातें याद रखना शायद मेरी सबसे खराब आदत बनती जा रही है।”
अक्षिता ने नजरें झुका लीं।
छतरी के किनारे से टपकती बूँदें दोनों के बीच एक पारदर्शी पर्दा बना रही थीं।
उनके कंधे छू रहे थे।
दोनों चुप थे।
लेकिन उस चुप्पी में पहली बार प्रेम ने धीरे से अपना नाम लिखा था।
अक्षिता ने वर्तमान में बहुत धीमे पूछा—
अक्षिता:
“क्या उसे भी उस दिन कुछ महसूस हुआ था?”
साया:
“कुछ लोग प्रेम का इज़हार शब्दों से करते हैं। कुछ लोग अपनी छतरी आधी करके।”
अक्षिता की आँखें नम होकर भी मुस्कुरा उठीं।
पहली रात की लंबी बातचीत
दृश्य फिर बदला।
रात के साढ़े ग्यारह बजे।
अक्षिता अपने कमरे में बिस्तर पर लेटी थी।
फोन कान से लगा था।
अक्षिता:
“तुम सोते नहीं हो?”
सिद्धार्थ:
“तुम फोन रखती नहीं हो।”
अक्षिता:
“पहले तुम फोन रखो।”
सिद्धार्थ:
“नहीं, पहले तुम।”
कुछ पल दोनों चुप रहे।
फिर दोनों एक साथ हँस पड़े।
अक्षिता:
“तुम्हें पता है, यह बातचीत कहाँ खत्म होगी?”
सिद्धार्थ:
“सुबह।”
अक्षिता:
“और अगर मैं सुबह तक फोन पर रही?”
सिद्धार्थ:
“तो मैं सुबह तक तुम्हारी आवाज सुनता रहूँगा।”
दृश्य में अक्षिता ने तकिए पर चेहरा छिपा लिया था।
उसके होंठों पर मुस्कान थी।
वर्तमान की अक्षिता ने आँखें पोंछ लीं।
अक्षिता:
“मैं कितनी खुश थी…”
साया:
“हाँ। और वह खुशी भी तुम्हारी ही थी।”
वह शाम जब प्रेम ने पहली बार हाथ थामा
अब दृश्य किसी शांत झील के किनारे का था।
सूरज ढल रहा था।
हवा में ठंडक थी।
अक्षिता चुप बैठी पानी में डूबते सूरज को देख रही थी।
सिद्धार्थ ने कुछ कहे बिना अपना हाथ उसके पास रख दिया।
अक्षिता ने पहले उसकी ओर देखा।
फिर अपने हाथ की उँगलियाँ धीरे-धीरे उसकी उँगलियों के बीच रख दीं।
दोनों ने एक-दूसरे की ओर नहीं देखा।
बस हाथ थामे रहे।
बहुत देर तक।
सिद्धार्थ:
“अक्षिता…”
अक्षिता:
“हूँ?”
सिद्धार्थ:
“अगर कभी मैं तुम्हें दुख दूँ…”
अक्षिता ने उसकी बात काट दी।
अक्षिता:
“तो?”
सिद्धार्थ:
“तो मुझे छोड़ देना।”
अक्षिता ने उसकी उँगलियों पर अपनी पकड़ थोड़ी और कस दी।
अक्षिता:
“और अगर तुमने मुझे छोड़ा?”
सिद्धार्थ ने उसकी ओर देखा।
सिद्धार्थ:
“तो?”
अक्षिता:
“तो मैं तुम्हें याद रखूँगी… लेकिन तुम्हारे लौटने का इंतजार नहीं करूँगी।”
सिद्धार्थ मुस्कुराया।
सिद्धार्थ:
“तुम ऐसी बातें क्यों करती हो?”
अक्षिता:
“क्योंकि प्यार में वादों से ज्यादा सच जरूरी होता है।”
दृश्य ठहर गया।
वर्तमान में अक्षिता ने साये की ओर देखा।
अक्षिता:
“उस दिन मैंने जो कहा था… वही आज मुझे निभाना है।”
आखिरी दृश्य
अब चलचित्र का रंग बदल गया।
वही कमरा।
वही दो लोग।
लेकिन इस बार दोनों के बीच दूरी थी।
सिद्धार्थ दरवाजे के पास खड़ा था।
अक्षिता उसके सामने।
अक्षिता:
“क्या सच में कोई रास्ता नहीं बचा?”
सिद्धार्थ ने नजरें झुका लीं।
सिद्धार्थ:
“शायद नहीं।”
अक्षिता:
“और हमारे तीन साल?”
सिद्धार्थ की आँखों में नमी थी।
सिद्धार्थ:
“वे झूठ नहीं थे।”
अक्षिता:
“फिर उन्हें खत्म कैसे कर दूँ?”
सिद्धार्थ ने उत्तर नहीं दिया।
कुछ पल बाद उसने बस इतना कहा—
सिद्धार्थ:
“तुम खुश रहना।”
दरवाजा खुला।
वह बाहर चला गया।
दरवाजा बंद हुआ।
और उसी क्षण चलचित्र भी समाप्त हो गया।
कमरे में फिर वर्तमान लौट आया।
अक्षिता की आँखों से आँसू लगातार बह रहे थे।
साया उसके पास खड़ा था।
अक्षिता:
“मैंने हमेशा सोचा कि मेरी कहानी उसके जाने पर खत्म हो गई।”
साया:
“नहीं।”
अक्षिता:
“फिर?”
साया:
“वह कहानी वहीं खत्म हुई थी। तुम्हारी जिंदगी नहीं।”
अक्षिता ने धीरे से सिर उठाया।
साया:
“तुमने उन तीन वर्षों को उसकी याद समझकर अपने पास रखा। अब उन्हें अपनी जिंदगी का हिस्सा समझकर रखो।”
अक्षिता:
“और तुम्हें?”
साया मुस्कुराया।
साया:
“मुझे जाने दो।”
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“एक खूबसूरत विदाई”
सुबह की पहली किरण कमरे में उतर रही थी।
साया अब पहले से बहुत हल्का दिखाई दे रहा था।
अक्षिता खिड़की के पास गई।
उसने खिड़की पूरी खोल दी।
ठंडी हवा भीतर आई और परदे को धीरे से हिलाने लगी।
अक्षिता:
“तुम्हें पता है… मुझे लगता था कि अगर तुम्हें जाने दिया तो सिद्धार्थ की आखिरी निशानी भी चली जाएगी।”
साया:
“लेकिन?”
अक्षिता मुस्कुराई।
अक्षिता:
“अब समझ गई हूँ कि यादों को कैद करके रखना… उन्हें जीवित रखना नहीं होता।”
साया चुप रहा।
अक्षिता:
“सिद्धार्थ मेरी जिंदगी का हिस्सा था। मेरी पूरी जिंदगी नहीं।”
साया की आकृति और पारदर्शी हो गई।
अक्षिता:
“जो गया, वह उसकी मर्जी। मैं उसे रोक नहीं सकती। वापस बुला नहीं सकती। और अब उसे अपनी हर सुबह में ढूँढ़ना भी नहीं चाहती।”
वह कुछ क्षण रुकी।
फिर उसके चेहरे पर एक शांत मुस्कान आई।
अक्षिता:
“भले ही मेरा दिल टूटा है… लेकिन मैं इन यादों को रोककर जा चुके इंसान को बार-बार अपने आसपास महसूस नहीं करूंगी।”
साया धीरे-धीरे प्रकाश में बदलने लगा।
अक्षिता:
“जो गया, वह उसकी मर्जी… लेकिन मेरा टूटा हुआ दिल मेरे पास रहेगा।”
साया मुस्कुराया।
साया:
“और वही दिल एक दिन फिर धड़केगा।”
अक्षिता:
“किसी और के लिए?”
साया ने सिर हिलाया।
साया:
“सबसे पहले… तुम्हारे लिए।”
अक्षिता की आँखें भर आईं।
लेकिन इस बार वे आँसू दुःख के नहीं थे।
उसने हल्के से हाथ हिलाया।
अक्षिता:
“जाओ। अब सचमुच जाओ।”
साया हवा में घुलता गया।
उसके साथ बारिश की गंध, पुराने वादों की आवाजें और तीन साल की अनगिनत धड़कनें भी जैसे कमरे से बाहर चली गईं।
अक्षिता कुछ देर खिड़की के पास खड़ी रही।
फिर उसने अपने सीने पर हाथ रखा।
दिल अब भी टूटा हुआ था।
मगर धड़क रहा था।
अपने लिए।
और शायद यही प्रेम की सबसे कठिन, सबसे खूबसूरत सच्चाई थी
कभी-कभी किसी को खोने के बाद हमें उसके प्रेम से नहीं, उसकी यादों के भूत से आज़ाद होना पड़ता है।
क्योंकि इंसान चला जाता है…
पर प्रेम की परछाईं तब तक रहती है, जब तक हम उसे विदा करना नहीं सीखते।
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