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बरसात का दिन

 

(यह कहानी पूर्णतः काल्पनिक एवं साहित्यिक रचना है। इसका किसी वास्तविक व्यक्ति, घटना, स्थान, परिवार अथवा जीवन-परिस्थिति से कोई संबंध नहीं है। यदि किसी प्रकार की समानता प्रतीत होती है, तो वह मात्र संयोग है।)

“बारिश, प्रेम और वह अजनबी”

गोवा पीछे छूट चुका था।

समुद्र की नीली लहरें, नारियल के पेड़ों की कतारें, समुद्र-तट पर बिखरी सुनहरी रेत और हनीमून के सात दिनों की अनगिनत स्मृतियाँ अब उनकी आँखों के भीतर चलती किसी खूबसूरत फिल्म की तरह जीवित थीं।

बैंगलोर लौटती प्रथम श्रेणी की रेल अपनी मंथर लय में आगे बढ़ रही थी।

बाहर सावन अपने पूरे यौवन पर था।

आकाश में बादलों की मोटी परत थी। कहीं दूर बिजली चमकती और अगले ही क्षण बादलों की गड़गड़ाहट रेल की खिड़कियों से टकराती हुई भीतर तक उतर आती। पटरियों के दोनों ओर फैले खेत बारिश से धुलकर गहरे हरे हो गए थे। घास की नोकों पर ठहरी बूँदें ट्रेन के गुजरने से उठती हवा में काँपतीं और फिर मिट्टी में विलीन हो जातीं।

चार सीटों वाला प्रथम श्रेणी का कम्पार्टमेंट शांत था।

चार सीटों में केवल दो यात्रियों की उपस्थिति थी प्रत्यूष और रागिनी।

नवविवाहित दंपती।

रागिनी खिड़की से लगी सीट पर बैठी थी। उसने अपनी ठुड्डी हथेली पर टिका रखी थी और बाहर भागते दृश्यों को ऐसे देख रही थी, मानो हर दृश्य को स्मृति में कैद कर लेना चाहती हो।

एक पेड़ खिड़की के सामने आता…

क्षणभर ठहरता…

और फिर तेजी से पीछे छूट जाता।

रागिनी मुस्कुरा दी।

“प्रत्यूष…”

सामने बैठे प्रत्यूष ने मोबाइल से नजर उठाई।

“हूँ?”

“तुम्हें पता है, पेड़ पीछे क्यों भाग रहे हैं?”

प्रत्यूष ने बाहर देखा।

“क्योंकि ट्रेन आगे जा रही है।”

रागिनी ने होंठ फुला लिए।

“बहुत वैज्ञानिक उत्तर दिया।”

“आखिर सॉफ्टवेयर इंजीनियर हूँ।”

“तो प्रेम का भी कोई सॉफ्टवेयर बना रखा है?”

प्रत्यूष ने मोबाइल जेब में रख दिया।

“हाँ।”

“क्या नाम है उसका?”

“रागिनी।”

वह हँस पड़ी।

हँसी के साथ उसकी चूड़ियाँ खनक उठीं।

बाहर बारिश अचानक कुछ तेज हो गई। बूँदें खिड़की के शीशे पर दौड़ने लगीं। दो बूँदें ऊपर से नीचे तक साथ-साथ आईं, फिर एक मोड़ पर उनमें से एक दूसरी से आगे निकल गई।

रागिनी ने उँगली से शीशे पर उनकी दिशा बनाते हुए कहा—

“देखो… कौन जीता?”

प्रत्यूष थोड़ा आगे झुका।

“जो आगे निकल गया।”

रागिनी ने उसकी ओर देखा।

“हर बार आगे निकल जाना जीत नहीं होता।”

“तो?”

“कभी-कभी किसी के साथ-साथ चलना भी जीत होती है।”

प्रत्यूष कुछ क्षण उसे देखता रहा।

फिर धीरे से उसके पास वाली सीट पर आकर बैठ गया।

“तो चलें साथ?”

रागिनी ने उसकी ओर देखा और मुस्कुराते हुए अपना सिर उसके कंधे पर रख दिया।

“पहले से चल तो रहे हैं।”

ट्रेन की लय

छुक… छुक… छुक…

उनके बीच जैसे कोई धीमा संगीत बजा रही थी।

प्रत्यूष ने खिड़की के बाहर देखा।

दूर एक छोटा-सा गाँव आया। मिट्टी की छतों पर बारिश चमक रही थी। एक बच्चा बरामदे में खड़ा होकर गुजरती ट्रेन को हाथ हिला रहा था। रागिनी ने भी मुस्कुराकर हाथ उठाया।

गाँव पीछे छूट गया।

बच्चा भी।

कुछ पल बाद केवल हरे खेत रह गए।

“प्रत्यूष।”

“हाँ?”

“गोवा जल्दी खत्म हो गया।”

“सात दिन कम लगे?”

“बहुत कम।”

“तो फिर?”

रागिनी ने उसकी बाँह में अपना हाथ डाल दिया।

“फिर अगली बार कहीं और चलेंगे।”

“कहाँ?”

“जहाँ बारिश हो।”

“यहाँ भी तो बारिश है।”

“हाँ, मगर…”

वह थोड़ा और करीब आ गई।

“यहाँ तुम हो।”

प्रत्यूष मुस्कुराया।

“और वहाँ?”

“वहाँ भी तुम ही रहोगे।”

दोनों हँस पड़े।

तभी—

क्लिक…

कम्पार्टमेंट का दरवाज़ा खुला।

दोनों की हँसी अचानक थम गई।

एक व्यक्ति भीतर आया।

चेहरे पर मास्क।

सिर पर टोपी।

कंधे पर जैकेट।

हाथ में एक मध्यम आकार का लगेज।

वह दरवाज़े पर खड़ा रहा।

उसकी आँखें पहले प्रत्यूष पर गईं।

फिर रागिनी पर।

फिर कम्पार्टमेंट की चारों सीटों पर।

फिर खिड़की से बाहर।

उसने कोई अभिवादन नहीं किया।

सिर्फ लगेज ऊपर रखा और नीचे वाली सीट पर लेट गया।

रागिनी ने धीमे से प्रत्यूष की ओर देखा।

प्रत्यूष की आँखें अब उस व्यक्ति पर थीं।

उस आदमी ने मोबाइल निकाला।

स्क्रीन देखी।

तुरंत बंद की।

फिर गर्दन उठाकर दरवाज़े की ओर देखा।

कुछ क्षण बाद उसने फिर खिड़की के बाहर झाँका।

ट्रेन के पहिए पटरियों पर एक समान लय में दौड़ रहे थे।

प्रत्यूष ने धीरे से कहा—

“रागिनी…”

“हूँ?”

“उस आदमी को देख रही हो?”

“हाँ।”

“कुछ अजीब नहीं लग रहा?”

रागिनी ने फिर उसकी ओर देखा।

“क्या?”

“पता नहीं… उसकी बेचैनी।”

रागिनी ने ध्यान से उस व्यक्ति को देखा।

वह आँखें बंद किए लेटा था।

“शायद थका हुआ होगा।”

“हो सकता है।”

प्रत्यूष ने बात वहीं रोक दी।

लेकिन उसकी निगाह उससे नहीं हटी।

कुछ देर बाद वह व्यक्ति अचानक उठा।

घड़ी देखी।

फिर दरवाज़े की ओर बढ़ा।

उसने अपना लगेज वहीं छोड़ दिया।

रागिनी ने भौंहें सिकोड़ लीं।

“सामान छोड़कर?”

प्रत्यूष ने केवल इतना कहा—

“हाँ।”

दरवाज़ा खुला।

वह व्यक्ति बाहर चला गया।

दरवाज़ा बंद।

कम्पार्टमेंट फिर शांत।

बाहर बारिश।

पेड़।

खेत।

पत्तियाँ।

और पटरियों की लगातार आवाज़।

एक मिनट।

दो मिनट।

पाँच मिनट।

वह वापस नहीं आया।

रागिनी ने खिड़की से बाहर देखा।

बारिश की बूँदें शीशे पर लगातार फिसल रही थीं।

तभी—

टिक…

रागिनी ने सिर उठाया।

कुछ क्षण शांत रही।

फिर—

टिक… टिक…

उसकी आँखें धीरे-धीरे ऊपर रखे लगेज की ओर उठीं।

“प्रत्यूष…”

उसकी आवाज़ में अचानक भय था।

“क्या हुआ?”

“सुनो।”

प्रत्यूष ने साँस रोककर सुना।

टिक… टिक… टिक…

उसका चेहरा बदल गया।

“सामान से आ रही है?”

रागिनी ने सिर हिलाया।

प्रत्यूष तुरंत खड़ा हुआ।

“उसे हाथ मत लगाना।”

“मैंने नहीं लगाया।”

“तुम यहीं रहो।”

“नहीं, मैं तुम्हारे साथ—”

“रागिनी।”

उसकी आवाज़ पहली बार इतनी गंभीर थी कि रागिनी रुक गई।

प्रत्यूष बाहर गया और तत्काल सुरक्षा कर्मियों को सूचना दी।

कुछ ही देर में सुरक्षा दल सक्रिय हो गया।

कम्पार्टमेंट खाली कराया गया।

यात्रियों को सुरक्षित दूरी पर ले जाया गया।

विशेषज्ञ विस्फोटक निरोधक दल पहुँचा।

हर कदम निर्धारित सुरक्षा प्रक्रिया के अनुसार उठाया गया।

कुछ देर बाद विशेषज्ञ अधिकारी ने बाहर आकर गंभीर स्वर में कहा

“संदिग्ध टाइम-बम जैसा उपकरण मिला है।”

रागिनी का चेहरा सफेद पड़ गया।

प्रत्यूष ने उसका हाथ थाम लिया।

विशेषज्ञ दल ने उपकरण को सुरक्षित ढंग से निष्क्रिय कर दिया।

कुछ क्षण बाद अधिकारी ने राहत की साँस लेते हुए कहा

“अब खतरा टल गया है।”

रागिनी ने प्रत्यूष की ओर देखा।

उसकी आँखों में आँसू थे।

“अगर मैंने वह आवाज़ नहीं सुनी होती…”

प्रत्यूष ने उसका हाथ अपने दोनों हाथों में ले लिया।

“लेकिन तुमने सुनी।”

“और अगर तुम्हें उस आदमी पर शक नहीं होता?”

“तो शायद हम सावधान नहीं होते।”

रागिनी कुछ क्षण उसे देखती रही।

फिर अचानक उसके सीने से लग गई।

बाहर बारिश अब भी बरस रही थी।

पेड़ पीछे छूट रहे थे।

ट्रेन आगे बढ़ रही थी।

लेकिन प्रत्यूष के भीतर कुछ पीछे लौट रहा था।

बहुत पीछे।

लगभग बीस वर्ष।
*********************************

“वह दूसरी बरसात”

रात उतर चुकी थी।

कम्पार्टमेंट की रोशनी मंद कर दी गई थी।

रागिनी खिड़की से बाहर देख रही थी।

बाहर अँधेरा था।

कभी किसी दूर बसे गाँव की पीली रोशनी दिखाई देती और अगले ही क्षण वह अंधकार में विलीन हो जाती।

बारिश की बूँदें अब भी शीशे पर थीं।

प्रत्यूष चुप बैठा था।

रागिनी ने उसका हाथ छुआ।

“क्या सोच रहे हो?”

प्रत्यूष ने खिड़की की ओर देखते हुए कहा

“आज का दिन मुझे बीस साल पीछे ले गया।”

रागिनी उसकी ओर मुड़ी।

“कहाँ?”

“एक और बरसात में।”

कुछ क्षण मौन।

फिर प्रत्यूष बोला

“तब मैं आठ साल का था।”

उसकी आवाज़ में अचानक बच्चे जैसी कोमलता उतर आई।

“माता-पिता के साथ एक रिश्तेदार की शादी में पानीपत जा रहा था। ट्रेन बहुत देर से चल रही थी।”

रागिनी ध्यान से सुनती रही।

“मुझे याद है… पिताजी बार-बार अपनी घड़ी देखते थे।”

प्रत्यूष मुस्कुराया।

“माँ कहती थीं ‘इतनी देर हो रही है, बारात निकल जाएगी।’”

रागिनी ने पूछा

“और तुम?”

“मैं?”

उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान आई।

“मैं तो बारिश में खुश था।”

वह खिड़की से बाहर देखने लगा।

“बाहर पेड़ भाग रहे थे। पत्तियों से पानी टपक रहा था। खेतों में जगह-जगह पानी भर गया था। मैं हर बूँद को देखने की कोशिश करता था।”

रागिनी ने मुस्कुराकर पूछा

“बचपन से ही बारिश के दीवाने थे?”

“हाँ।”

“अब?”

प्रत्यूष ने उसकी आँखों में देखा।

“अब बारिश से ज्यादा तुम्हें देखता हूँ।”

रागिनी की आँखें झुक गईं।

वह थोड़ा और उसके पास आ गई।

प्रत्यूष ने आगे कहा

“लेकिन उस दिन ट्रेन बार-बार देर होती रही। सोनीपत पहुँचे तो पिताजी ने आखिरकार तय किया कि ट्रेन से आगे जाना ठीक नहीं। उन्होंने टैक्सी ली और हम सोनीपत से पानीपत चले गए।”

बाहर अचानक बिजली चमकी।

रागिनी का हाथ अनायास प्रत्यूष की उँगलियों में कस गया।

“फिर?”

प्रत्यूष की आवाज़ धीमी हो गई।

“कुछ समय बाद खबर मिली… उसी ट्रेन में विस्फोट हुआ था।”

रागिनी स्तब्ध रह गई।

“हे भगवान…”

“मैं आठ साल का था। बहुत कुछ समझ नहीं पाया था। लेकिन लोगों के चेहरों पर जो भय देखा… वह समझ में आया था।”

वह कुछ क्षण चुप रहा।

“उस दिन मुझे पहली बार लगा था कि एक छोटा-सा निर्णय कभी-कभी जिंदगी और मौत के बीच खड़ा हो सकता है।”

रागिनी ने उसके कंधे पर सिर रख दिया।

“और आज…”

“आज वही बारिश थी।”

“वही ट्रेन जैसा संयोग।”

“और वही खतरा।”

दोनों खिड़की से बाहर देखने लगे।

बाहर काले आकाश के नीचे पेड़ों की कतारें पीछे भाग रही थीं।

रागिनी ने धीरे से कहा

“शायद तुम्हारी स्मृति ने आज तुम्हें चेताया।”

प्रत्यूष ने उसकी ओर देखा।

“और तुम्हारी सुनने की क्षमता ने हमें बचाया।”

रागिनी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—

“तो आज की कहानी में नायक अकेला नहीं है।”

“कौन है?”

“हम दोनों।”

प्रत्यूष मुस्कुरा दिया।

उसने उसका हाथ अपने हाथों में ले लिया।

“साथ?”

“हमेशा।”

बाहर बारिश की बूँद एक लंबी लकीर बनाती हुई खिड़की पर नीचे उतर गई।

उसके पीछे दूसरी बूँद चली आई।

दोनों कुछ क्षण साथ-साथ दौड़ीं।

फिर एक-दूसरे में मिल गईं।
******************************

“बारिश में सम्मान”

कुछ दिनों बाद स्थानीय प्रशासन और रेलवे सुरक्षा विभाग द्वारा प्रत्यूष और रागिनी को सम्मानित करने के लिए समारोह आयोजित किया गया।

सुबह से बारिश हो रही थी।

समारोह स्थल के बाहर लगे पेड़ों की पत्तियों पर बूँदें ठहरी थीं। हवा चलती तो पत्तियाँ काँपतीं और बूँदें नीचे घास पर गिरतीं।

रागिनी ने खिड़की से बाहर देखते हुए कहा

“फिर बारिश।”

प्रत्यूष ने मुस्कुराकर उसकी ओर देखा।

“लगता है बारिश हमारा पीछा नहीं छोड़ती।”

“या फिर हमारी कहानी छोड़ना नहीं चाहती।”

दोनों मुस्कुराए।

समारोह शुरू हुआ।

मंच से अधिकारी ने उनकी सतर्कता की प्रशंसा की और कहा—

“समय पर दी गई सूचना ने एक संभावित बड़ी दुर्घटना को टालने में सहायता की।”

तालियाँ गूँज उठीं।

प्रत्यूष और रागिनी मंच पर पहुँचे।

सम्मान-पत्र और स्मृति-चिह्न ग्रहण करते समय रागिनी ने प्रत्यूष की ओर देखा।

उसकी आँखों में गर्व था।

प्रत्यूष ने धीमे से कहा

“इतना मत देखो।”

“क्यों?”

“लोग देख रहे हैं।”

“देखने दो।”

“क्यों?”

रागिनी मुस्कुराई।

“आज मुझे तुम पर गर्व हो रहा है।”

प्रत्यूष कुछ कह नहीं पाया।

उसने बस हल्के से उसका हाथ दबा दिया।

मंच से उतरने के बाद दोनों बाहर आए।

बारिश फिर तेज हो चुकी थी।

प्रत्यूष ने छतरी खोली।

छतरी के नीचे जगह कम थी।

रागिनी उसके बिल्कुल पास आ गई।

उसका कंधा प्रत्यूष के कंधे से छू गया।

कुछ क्षण दोनों चुप रहे।

सामने सड़क पर बारिश पानी की महीन चादर बुन रही थी।

पेड़ों से बूँदें टपक रही थीं।

घास झुक-झुककर बारिश स्वीकार कर रही थी।

रागिनी ने धीरे से कहा

“प्रत्यूष।”

“हूँ?”

“आज की तारीख याद रखना।”

“क्यों?”

“क्योंकि आज बारिश फिर हुई है।”

प्रत्यूष मुस्कुराया।

“बारिश तो हर साल होती है।”

“मगर हर बारिश याद नहीं बनती।”

प्रत्यूष ने उसकी ओर देखा।

“तो यह क्या है?”

रागिनी ने उसका हाथ थाम लिया।

“हमारी कहानी का एक पन्ना।”

“नाम?”

वह कुछ क्षण सोचती रही।

फिर बारिश की ओर देखते हुए बोली—

“बरसात का दिन।”

प्रत्यूष ने उसकी आँखों में देखा।

“अच्छा नाम है।”

रागिनी ने सिर उसके कंधे पर रख दिया।

“जानते हो… पहले मुझे बारिश में सिर्फ प्रेम दिखाई देता था।”

“अब?”

“अब प्रेम के साथ जीवन भी दिखाई देता है।”

प्रत्यूष ने उसकी उँगलियाँ थाम लीं।

“और मुझे?”

रागिनी मुस्कुराई।

“तुम्हें?”

“हाँ।”

“तुम्हें हर बारिश में मेरे साथ चलना दिखाई देगा।”

प्रत्यूष ने छतरी थोड़ी उसकी ओर झुका दी।

खुद उसका एक कंधा बारिश में भीग गया।

रागिनी ने तुरंत कहा

“तुम भीग रहे हो।”

“कोई बात नहीं।”

“छतरी अपनी तरफ करो।”

“तुम्हें भीगने नहीं दूँगा।”

रागिनी ने उसकी ओर देखा।

उसकी आँखों में प्रेम था।

उसने धीरे से कहा—

“इसीलिए तो तुम्हारे साथ हूँ।”

दोनों आगे बढ़ गए।

पीछे बारिश थी।

पत्तियों से टपकती बूँदें थीं।

घास पर चमकती जलधाराएँ थीं।

सड़क पर दौड़ता पानी था।

और छतरी के नीचे दो लोग थे

जो अब जानते थे कि जिंदगी केवल खूबसूरत दिनों का नाम नहीं।

कभी-कभी एक बरसात…

एक संदिग्ध क्षण…

एक छोटी-सी सतर्कता…

और किसी का थामा हुआ हाथ…

पूरी जिंदगी का अर्थ बदल देता है।

उस दिन के बाद जब भी बारिश होती, प्रत्यूष और रागिनी एक-दूसरे की ओर देखते।

कभी कोई शब्द नहीं कहते।

बस मुस्कुरा देते।

क्योंकि दोनों जानते थे

कुछ बरसातें कपड़े भिगोती हैं,
और कुछ बरसातें स्मृतियों को।

उनकी जिंदगी में वह दिन हमेशा के लिए दर्ज हो चुका था—

बरसात का दिन।

पवनेश

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