!! “कल्प भेंटवार्ता : व्यक्तित्व परिचय : श्री शशि धर कुमार !!
- कल्प भेंटवार्ता
- 13/09/2026
- लेख
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!! “कल्प भेंटवार्ता : व्यक्तित्व परिचय : श्री शशि धर कुमार !!
!! “मेरा परिचय” !!
नाम :- शशि धर कुमार
माता/पिता का नाम:- शांति श्री मंडल/श्री दशरथ लाल मंडल
जन्म स्थान एवं जन्म तिथि :- कटिहार/ ११ दिसंबर
पत्नी का नाम :- कुमारी ज्योति
बच्चों के नाम :- महाश्वेता
शिक्षा :- एडवांस्ड पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा इन कंप्यूटर साइंस
व्यवसाय :- आईटी कंसलटेंट
वर्तमान निवास :- गौतम बुद्ध नगर
आपकी मेल आई डी :- shashidharkumar@outlook.com
आपकी कृतियाँ :- एकल काव्य संकलन “रजनीगन्धा”
आपकी विशिष्ट कृतियाँ :-
काव्य संग्रह – रजनीगन्धा
दोहा संग्रह –
आपकी प्रकाशित कृतियाँ :- एकल काव्य संकलन “रजनीगन्धा”, ३० से ऊपर साझा काव्य संग्रह
पुरूस्कार एवं विशिष्ट स्थान :- हिंदी गौरव सम्मान २०२६ और २०२५, सृजन शिखर सम्मान २०२६, चेतना मंच कथाकार सम्मान, चेतना मंच साहित्यकार सम्मान, भीष्म साहनी सम्मान, स्वामी विवेकानंद लिटरेरी अवार्ड, प्रान्ति इंडिया साहित्य सम्मान २०२५, हिंदी सेवा रत्न सम्मान, राष्ट्रीय हिंदी भाषा सम्मान, मुंशी प्रेमचंद स्मृति सम्मान, श्री मंगलेश डबराल सम्मान, श्री उदय प्रकाश सम्मान, राष्ट्रीय हिंदी सेवा सम्मान, राष्ट्र सेवा पुरस्कार २०२४, मानवाधिकार पुरस्कार २०२३, सामाजिक प्रभाव पुरस्कार २०२४ और विभिन्न संगठनों द्वारा ३० से अधिक पुरस्कार और सम्मान से सम्मानित।
!! “मेरी पसंद” !!
उत्सव :- होली
भोजन :- खिचड़ी
रंग :- सफ़ेद
परिधान :- पश्चिमी और भारतीय दोनों
स्थान एवं तीर्थ स्थान :- हरिद्वार
लेखक/लेखिका :- फणीश्वर नाथ रेणु
कवि/कवयित्री :-
उपन्यास/कहानी/पुस्तक :- जूठन
कविता/गीत/काव्य खंड :-
खेल :- क्रिकेट, हॉकी
फिल्में/धारावाहिक (यदि देखते हैं तो) :- तारक का मेहता का उलटा चश्मा
आपकी लिखी हुई आपकी सबसे प्रिय कृति :- मेरी माटी मेरा देश
!! कल्प भेंटवार्ता के प्रश्न : श्री शशि धर कुमार के उत्तर !!
खंड–१ : व्यक्तिगत जीवन
प्रश्न १. शशिधर जी, आपका जन्म बिहार के कटिहार में हुआ और आपके माता-पिता श्री दशरथ लाल मंडल एवं शांति श्री मंडल रहे हैं। आपके बाल्यकाल और पारिवारिक संस्कारों ने आपके व्यक्तित्व तथा जीवन-दृष्टि को किस प्रकार आकार दिया?
शशिधर जी :- मेरा बचपन कटिहार की उस मिट्टी में बीता है, जहाँ जीवन बहुत साधारण होते हुए भी अपने भीतर बहुत गहरी संवेदनाएँ समेटे हुए था। मेरे माता-पिता, श्री दशरथ लाल मंडल और श्रीमती शांति श्री मंडल और मेरे दादा जी श्री लालजी मंडल, मेरे जीवन के प्रथम शिक्षक रहे। उन्होंने मुझे कोई बड़ी-बड़ी बातें कहकर नहीं, बल्कि अपने जीवन और व्यवहार से बहुत कुछ सिखाया।
परिवार से मैंने मेहनत, ईमानदारी, सादगी, बड़ों का सम्मान और जरूरतमंद के प्रति संवेदनशील रहने का संस्कार पाया। शायद यही कारण है कि मेरे लिए साहित्य केवल शब्दों का सौंदर्य नहीं रहा; वह मनुष्य और समाज को समझने का माध्यम भी बना, इस मामले में मैं अपने दादा जी को पूरा श्रेय देना चाहूंगा जिन्होंने मुझे जीवन मूल्यों को धरातल पर मनुष्य के साथ व्यवहार कैसे करना है उसके बारे में दिखाया और बताया भी।
आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि मेरे भीतर का लेखक उसी समय जन्म ले चुका था। उस समय मैं उसे पहचान नहीं पाता था, लेकिन आसपास के लोग, रिश्ते, गाँव-शहर का जीवन, सुख-दुःख और छोटी-छोटी घटनाएँ मेरे भीतर कहीं जमा होती रही थीं। बाद में यही अनुभव शब्दों में उतरने लगे।
मेरे लिए परिवार संस्कारों की पहली पाठशाला रहा और मेरा गाँव भर्री जो कटिहार के हिस्से में छोटा सा गाँव है उस पाठशाला की पहली किताब।
प्रश्न २. आपने कंप्यूटर साइंस में एडवांस्ड पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा प्राप्त किया और आज आईटी कंसलटेंट के रूप में कार्यरत हैं। तकनीक और साहित्य—दो अलग-अलग संसारों के बीच आपका यह सफर कैसे शुरू हुआ और दोनों ने आपके व्यक्तित्व को किस प्रकार समृद्ध किया?
शशिधर जी :- पहली दृष्टि में तकनीक और साहित्य दो बिल्कुल अलग संसार दिखाई देते हैं। एक तरफ कंप्यूटर का तर्क, कोड और मशीन है, तो दूसरी तरफ साहित्य की कल्पना, संवेदना और मनुष्य है। लेकिन मेरे अनुभव में दोनों के केंद्र में एक चीज समान है—जिज्ञासा।
कंप्यूटर साइंस ने मुझे व्यवस्थित ढंग से सोचना, समस्याओं को अलग-अलग कोणों से देखना और समाधान तक पहुँचने का धैर्य दिया। वहीं साहित्य ने मुझे मनुष्य को केवल एक ‘डेटा’ या ‘समस्या’ की तरह नहीं, बल्कि भावनाओं, संघर्षों और सपनों से भरे व्यक्तित्व के रूप में देखना सिखाया।
आईटी कंसल्टेंट के रूप में काम करते हुए मैंने दुनिया को तकनीक के बदलते स्वरूप के माध्यम से देखा और साहित्य ने मुझे उसी बदलती दुनिया के भीतर मनुष्य को देखने की दृष्टि दी।
इसलिए मैं तकनीक और साहित्य को विरोधी नहीं मानता। तकनीक ने मेरे सोचने के तरीके को आधुनिक बनाया और साहित्य ने मेरे सोचने को मानवीय बनाए रखा।
प्रश्न ३. शशिधर जी, बचपन की नादानियों की अनेकों स्मृतियां होती हैं जिनमें से कुछ बहुत रोचक होती हैं हम आपके बचपन की ऐसी ही एक नादानी से आपकी स्मृति के माध्यम से जुड़ना चाहते हैं।
शशिधर जी :- बचपन की एक नादानी आज भी याद आती है। यह कोई 35 वर्ष पुरानी बात होगी। तब मेरी उम्र लगभग सात-आठ साल की रही होगी। हमारे यहाँ एक मुखिया जी हुआ करते थे, जिनके पास उस समय मोपेड थी। वे अक्सर अपनी मोपेड खड़ी करके खेत देखने चले जाते थे।
उस समय की मोपेड आज की गाड़ियों जैसी नहीं होती थी। उसमें चाबी लगाने की जरूरत नहीं पड़ती थी और पैडल मारकर उसे चालू किया जा सकता था। हम बच्चों के लिए वह किसी रोमांच से कम नहीं थी। एक दिन जाने क्या शरारत सूझी कि हमने उनकी मोपेड का सारा पेट्रोल चलाकर खत्म कर दिया।
मेरे लिए वह शायद एक खेल था, लेकिन जब मुखिया जी खेत से लौटे तो उनके लिए बड़ी परेशानी खड़ी हो गई। उस उम्र में मुझे यह समझ नहीं थी कि मेरी छोटी-सी शरारत किसी बुजुर्ग व्यक्ति के लिए कितनी बड़ी परेशानी बन सकती है। घर में खूब डाँट पड़ी और आगे से ऐसा न करने की कसम भी खानी पड़ी।
लेकिन आज उस घटना को याद करता हूँ तो अपनी शरारत से ज्यादा मुखिया जी का व्यवहार याद आता है। उनकी उम्र काफी थी, फिर भी उन्होंने मुझे या मेरे परिवार को लेकर कोई कठोरता नहीं दिखाई। बल्कि उन्होंने किसी को भेजकर साइकिल से पेट्रोल मंगवाया और अपनी परेशानी दूर की।
आज सोचता हूँ तो उस घटना में मेरी नादानी से ज्यादा उनकी दरियादिली दिखाई देती है। उस उम्र में मैं केवल पेट्रोल खत्म करने की शरारत समझ पाया था, लेकिन समय के साथ समझ आया कि बड़ों की सहनशीलता और उदारता भी बच्चों को बहुत कुछ सिखाती है।
शायद बचपन की कुछ गलतियाँ जीवन में इसलिए याद रह जाती हैं क्योंकि बाद में हम उन्हीं को नए अर्थों में समझने लगते हैं।
प्रश्न ४. पत्नी कुमारी ज्योति और पुत्री महाश्वेता के साथ आपका पारिवारिक जीवन आपकी साहित्यिक यात्रा को किस प्रकार प्रभावित करता है? क्या परिवार आपकी रचनात्मक ऊर्जा और लेखन के लिए प्रेरणा का स्रोत भी है?
शशिधर जी :- मेरे लिए परिवार साहित्यिक यात्रा का केवल दर्शक नहीं, बल्कि उसका एक मौन सहभागी है। मेरी पत्नी ज्योति ने मेरे लेखन को लेकर समय के साथ जिस तरह समझ और सहयोग विकसित किया है, वह मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
शुरुआत में लेखन को लेकर कुछ समस्याएँ होती थीं। घर-परिवार की अपनी जिम्मेदारियाँ होती हैं और लिखने के लिए जिस एकांत की आवश्यकता होती है, वह हमेशा आसानी से नहीं मिल पाता। लेकिन अब ज्योति इस बात को समझती हैं कि जब मुझे कुछ लिखना होता है और एकांत चाहिए होता है, तो वे उसके लिए भरपूर प्रयास करती हैं। यह सहयोग मेरे लिए बहुत मायने रखता है, क्योंकि लेखक के लिए कभी-कभी आधे घंटे का शांत समय भी बहुत बड़ी संपत्ति होता है।
महाश्वेता ने मुझे एक अलग तरह से प्रभावित किया है। एक बार उसके विद्यालय में कविता लिखने का असाइनमेंट मिला। उसके दोस्तों ने उससे कहा—“तुम्हारे लिए तो यह बहुत आसान होगा, तुम्हारे पापा कविता लिखते हैं।” लेकिन मुझे उस घटना में एक खूबसूरत बात दिखाई दी। बच्चों को यदि प्रोत्साहित किया जाए तो वे अपनी क्षमता से कहीं आगे जाकर कुछ नया कर सकते हैं।
महाश्वेता के साथ संवाद का एक और महत्वपूर्ण पक्ष है। महिलाओं को लेकर मेरे एक पुरुष होने के नाते जो दृष्टिकोण बनते हैं, वह कई बार मेरी बातों को बहुत स्पष्टता से चुनौती देती है। वह मुझे महिलाओं के नजरिये से चीजों को देखने के लिए मजबूर करती है। और कई बार किसी रचना के लिए मुझे अपने विचारों को फिर से परखना पड़ता है।
एक रोचक प्रसंग भी है। मैंने एक बार महिलाओं को केंद्र में रखकर एक कविता लिखी थी। उसमें कुछ ऐसे शब्द थे जिन्हें मेरी पत्नी और महाश्वेता दोनों ने आपत्तिजनक माना। मेरा उद्देश्य पुरुष-प्रधान समाज पर व्यंग्य और चोट करना था, लेकिन उन्होंने मुझे यह महसूस कराया कि लेखक की मंशा और पाठक की अनुभूति हमेशा एक जैसी नहीं होती।
आखिरकार मुझे वह कविता आगे कहीं भी प्रसारित न करने का वादा करना पड़ा।
उस घटना ने मुझे एक लेखक के रूप में एक बहुत महत्वपूर्ण बात सिखाई—जब आप स्त्री, समाज, जाति या किसी संवेदनशील विषय पर लिखते हैं, तो केवल अपनी मंशा पर्याप्त नहीं होती; आपको यह भी देखना पड़ता है कि आपकी भाषा सामने वाले तक किस रूप में पहुँच रही है।
इस अर्थ में मेरा परिवार मेरे लेखन का केवल सहारा नहीं है, वह मेरा पहला पाठक और कई बार मेरा पहला आलोचक भी है।
प्रश्न ५. आपको होली का पर्व, सफेद रंग और खिचड़ी विशेष रूप से पसंद हैं तथा हरिद्वार आपका प्रिय तीर्थ है। आपकी इन पसंदों के पीछे कोई विशेष स्मृति, भावनात्मक जुड़ाव या जीवन-दर्शन छिपा है?
शशिधर जी :- शायद मेरी पसंदों में भी मेरे जीवन और मेरी मिट्टी की कहानी छिपी हुई है।
होली मुझे विशेष रूप से इसलिए पसंद है कि गाँव में पले-बढ़े होने के कारण मैंने सामाजिक जीवन में जातिगत भेदभाव को बहुत करीब से देखा है। हमारे समाज और हमारे कई त्योहारों में भी कभी-कभी यह विभाजन दिखाई देता है। लेकिन होली मुझे हमेशा कुछ अलग अनुभव कराती रही। रंगों का यह त्योहार कम-से-कम मेरी स्मृति में ऐसा रहा है जहाँ लोगों के बीच की दूरियाँ कुछ समय के लिए कम होती थीं। मुझे लगता है कि त्योहारों का असली अर्थ भी तभी है, जब वे मनुष्य को मनुष्य के करीब लाएँ।
हमारे यहाँ होली पर टोली बनाकर नाचने-गाने की परंपरा है। बचपन में एक बार मैं भी चुपके से उस टोली में शामिल हो गया था। उस समय लगा था कि यह तो बहुत बड़ा उत्सव है और मुझे भी इसका हिस्सा बनना चाहिए। लेकिन उसके बाद मुझे ऐसी कोई इजाजत नहीं मिली। आज उस घटना को याद करता हूँ तो हँसी आती है कि जिस स्वतंत्रता को मैंने उस दिन हासिल किया था, वह बहुत जल्दी वापस ले ली गई।
सफेद रंग मुझे इसलिए पसंद है कि वह मुझे शांत और स्वाभाविक लगता है। उसमें किसी तरह का दिखावा नहीं है। वह जितना सरल दिखाई देता है, उतना ही गहरा भी है। शायद मुझे लगता है कि सफेद रंग व्यक्ति को अधिक सहज और स्वाभाविक रूप से ‘ऑथेंटिक’ बनाता है।
खिचड़ी से मेरा जुड़ाव थोड़ा अलग है। पूरे भारत में खिचड़ी के अलग-अलग रूप में मिलते हैं और मुझे भी कई तरह की खिचड़ी बनानी आती है। यह सरल है, स्वादिष्ट है और स्वास्थ्य की दृष्टि से भी सहज भोजन है। हमारे सीमांचल में शनिवार को खिचड़ी बनाने की परंपरा लगभग हर घर में रही है और आज भी यह परंपरा बहुत जगहों पर जारी है। इसलिए खिचड़ी मेरे लिए स्वाद से अधिक स्मृति और अपनी जमीन से जुड़ाव का भोजन है।
जहाँ तक हरिद्वार की बात है, मैं उसे केवल ‘तीर्थ’ कहकर सीमित नहीं करना चाहूँगा। बचपन में वहाँ जाने की कुछ धुँधली स्मृतियाँ हैं। बाद में जब दिल्ली में रहने लगा तो पढ़ाई के दौरान कई बार हरिद्वार जाना हुआ। दिल्ली की भागदौड़ से बाहर निकलने के लिए यह मेरे लिए सबसे नजदीकी ऐसी जगह रही, जहाँ गंगा के किनारे बैठकर कुछ समय अपने साथ बिताया जा सकता था।
मेरे लिए हरिद्वार का आकर्षण बहुत व्यावहारिक और बहुत मानवीय है—दिल्ली की भागती हुई जिंदगी से थोड़ी देर भागकर गंगा के किनारे बैठ जाना, बिना किसी जल्दबाजी के।
शायद इसीलिए मेरी पसंदों को जोड़कर देखूँ तो उनमें एक बात बार-बार दिखाई देती है—मुझे जीवन में रंग पसंद हैं, लेकिन उन रंगों के बीच सादगी, बराबरी और थोड़ा-सा सुकून भी चाहिए।
प्रश्न ६. शशिधर जी, आप पौराणिक रूप से महत्वपूर्ण पवित्र त्रिमोहिनी संगम, और गोगबिल झील के लिए जग प्रसिद्ध प्राचीन कटि का हार और वर्तमान कटिहार से हैं, हम आपके अँचल से आपके शब्दों परिचित होना चाहते हैं।
शशिधर जी :- कटिहार को मैं केवल अपना शहर नहीं कह सकता। मेरे लिए कटिहार एक पूरा भावलोक है। उसमें मेरा बचपन है, मेरी पहली स्मृतियाँ हैं, मेरी भाषा है, मेरे लोग हैं और मेरे भीतर का बहुत कुछ है।
मेरा गाँव मेरे लिए आज भी सबसे प्रिय जगहों में से एक है। वहीं मेरा जन्म हुआ और पाँचवीं कक्षा तक की पढ़ाई भी वहीं हुई। उस समय की दुनिया आज से बिल्कुल अलग थी—साफ हवा, नीला आसमान, कीचड़, बिजली का न होना और रात का वह सुकून, जिसे आज की रोशनी में शायद हम भूलते जा रहे हैं।
खेतों में काम करती महिलाएँ, शाम को किसी उत्सव के अवसर पर सुनाई पड़ते लोकगीत, खेत, मखाना, आम, अमरूद और लीची की चोरी जैसे छोटे-छोटे बालसुलभ अपराध—इन सबकी स्मृतियाँ आज भी अचानक सामने आ जाती हैं। कभी बुजुर्गों की डाँट याद आती है, कभी कटिहार की कॉलोनी की गलियाँ, कभी दुर्गापूजा और काली पूजा का उत्सव।
और कटिहार केवल गाँव और प्रकृति ही नहीं है। उसमें समोसा है, चाट है, पत्रिकाओं का इंतजार है, मंथली सब्सक्रिप्शन पर आने वाली पत्रिकाओं को पढ़ने का उत्साह है, कॉलेज है और कॉलेज की कैंटीन की चाय भी है।
शायद यही वजह है कि कटिहार मेरे लिए किसी एक दृश्य का नाम नहीं है। वह गाँव से शहर तक फैली हुई अनेक स्मृतियों का संग्रह है।
कटिहार से बाहर जाने के बाद अगर किसी एक चीज की सबसे ज्यादा याद आती रही है, तो वह है कटिहार की बारिश। बारिश का वह अपना रंग, अपनी गंध और अपनी आवाज थी। मिट्टी की वह खुशबू आज भी स्मृति में बहुत कुछ जगा देती है।
मेरी कहानियों की पृष्ठभूमि में कटिहार कई बार आया है। मैंने कटिहार पर दो कविताएँ भी लिखी हैं और अंगिका में कटिहार के बारे में एक लेख भी लिखा है।
मुझे लगता है कि लेखक चाहे जितनी दूर चला जाए, उसकी पहली मिट्टी उसके भीतर बनी रहती है। मेरे लिए वह मिट्टी कटिहार है।
कटिहार मेरे लिए वह जगह नहीं है जहाँ मैं पैदा हुआ था; कटिहार वह जगह है जो आज भी मेरे भीतर पैदा होती रहती है।
प्रश्न ७. आपके प्रिय लेखक फणीश्वर नाथ रेणु हैं और ‘जूठन’ जैसी पुस्तक आपको पसंद है। रेणु जी के साहित्य और ‘जूठन’ की संवेदना में आपको ऐसा क्या दिखाई देता है, जो आपके अपने साहित्यिक संस्कारों से जुड़ता है?
शशिधर जी :- फणीश्वर नाथ रेणु मेरे प्रिय लेखक इसलिए हैं क्योंकि उन्होंने गाँव, लोकजीवन और आम आदमी को साहित्य में केवल पात्र नहीं बनाया, बल्कि उन्हें उनकी पूरी गरिमा और जटिलता के साथ प्रस्तुत किया। उनके यहाँ मिट्टी बोलती है, लोकभाषा बोलती है और समाज की वास्तविक तस्वीर सामने आती है।
‘जूठन’ जैसी कृति सामाजिक विषमता और जातिगत भेदभाव की उस पीड़ा को सामने लाती है जिसे सभ्य समाज अक्सर देखना नहीं चाहता। ऐसी रचनाएँ हमें असहज करती हैं, और मुझे लगता है कि साहित्य का एक महत्वपूर्ण कार्य यही भी है—वह हमें उन प्रश्नों के सामने खड़ा करे जिनसे हम बचना चाहते हैं।
मेरे साहित्यिक संस्कारों में भी आम मनुष्य, उसकी गरिमा, संघर्ष और संवेदना महत्वपूर्ण हैं। मैं मानता हूँ कि साहित्य का मूल्य केवल इस बात से नहीं तय होना चाहिए कि वह कितना सुंदर लिखा गया है, बल्कि इससे भी कि वह हमें कितना बेहतर मनुष्य बनाता है।
प्रश्न ८. आपको क्रिकेट और हॉकी दोनों खेल पसंद हैं तथा मनोरंजन के लिए ‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा’ देखते हैं। क्या खेल और हास्य-व्यंग्य जैसे जीवन के सहज पक्ष आपके लेखन को भी किसी रूप में प्रभावित करते हैं?
शशिधर जी :- बिल्कुल। साहित्य जीवन से अलग कोई कृत्रिम संसार नहीं है। जीवन में जितनी गंभीरता है, उतनी ही हँसी भी है; जितना संघर्ष है, उतना ही खेल भी।
क्रिकेट और हॉकी मुझे इसलिए पसंद हैं कि दोनों खेलों में व्यक्तिगत प्रतिभा के साथ टीम भावना भी बहुत महत्वपूर्ण है। जीवन भी कुछ ऐसा ही है—हम अकेले बहुत कुछ कर सकते हैं, लेकिन बड़ी यात्रा में साथ जरूरी होता है।
‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा’ जैसे कार्यक्रमों में हास्य के माध्यम से रोजमर्रा के सामाजिक व्यवहार को देखने का अवसर मिलता है। हास्य और व्यंग्य समाज का आईना हो सकते हैं, बशर्ते उनमें संवेदना बनी रहे।
लेखन में भी मैं मानता हूँ कि हर बात को गंभीर भाषा में कहना जरूरी नहीं। कभी एक मुस्कान वह बात कह देती है, जिसे लंबा भाषण नहीं कह पाता।
प्रश्न ९. आपका एकल काव्य-संग्रह ‘रजनीगन्धा’ प्रकाशित हो चुका है और आपकी रचनाएँ 30 से अधिक साझा काव्य-संग्रहों में शामिल हैं। आपकी साहित्यिक यात्रा की शुरुआत कैसे हुई और ‘रजनीगन्धा’ आपके रचनात्मक जीवन में किस तरह का पड़ाव है?
शशिधर जी :- मेरी साहित्यिक यात्रा का आरंभ बहुत पहले हुआ था, जब मैं कटिहार में था। उस समय लिखा करता था, लेकिन वह शुरुआती लेखन समय के साथ कहीं पीछे छूट गया। मेरी पहली कविता किस विषय पर थी, यह भी अब ठीक-ठीक याद नहीं है, क्योंकि जिस डायरी में वह सब लिखा था, वह खो गई।
शायद लेखक की यात्रा भी कुछ ऐसी ही होती है—कुछ शब्द बच जाते हैं, कुछ कागज खो जाते हैं और कुछ अनुभव जीवन भर भीतर बने रहते हैं।
मेरे लेखन को दिशा देने में एक मित्र की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही। उसे गाने सुनने और गाने का बहुत शौक था। आज वह यूट्यूब पर पत्रकारिता से जुड़ा काम करता है। उसके गानों के प्रति लगाव और उसे सुनने के अनुभव ने मेरे भीतर भी शब्दों और अभिव्यक्ति के प्रति एक अलग आकर्षण पैदा किया। बाद में जब मुझे अंग्रेजी साहित्य पढ़ने का अवसर मिला, तो साहित्य के संसार से मेरा रिश्ता और गहरा होता गया। वहीं से यह यात्रा धीरे-धीरे आगे बढ़ी।
पहली बार अपनी रचना के प्रकाशन का अनुभव भी मेरे लिए बहुत खास था। मुझे आज भी वह बात याद है जब कटिहार में किसी व्यक्ति ने मेरी कविताएँ पढ़कर कहा था कि आपकी कविताओं में अभी बहुत अशुद्धियाँ हैं, लेकिन समय के साथ सुधार होगा—आप प्रयास करते रहिए।
उस समय शायद यह आलोचना थी, लेकिन आज लगता है कि वह मेरे लिए प्रोत्साहन था। किसी ने मेरी रचना पढ़ी, मेरी कमियाँ बताईं और साथ ही यह भी कहा कि आगे सुधार होगा। साहित्य में इससे बड़ी शुरुआती प्रेरणाओं में से एक क्या हो सकती है?
फिर आया ‘रजनीगन्धा’।
रजनीगन्धा मेरे लिए केवल एक फूल का नाम नहीं है। मुझे सफेद रंग पसंद है और रजनीगन्धा का सफेद रंग मुझे हमेशा आकर्षित करता रहा है। लेकिन मेरे संग्रह में कविताओं की विविधता को देखते हुए मेरे गुरुजी ने ‘रजनीगन्धा’ नाम सुझाया और मुझे यह नाम बहुत अपना लगा।
मेरे लिए यह संग्रह मेरी साहित्यिक यात्रा की मंजिल नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। इसकी पहली कविता माँ को समर्पित है और वह मेरे दिल के बहुत करीब है।
लेकिन ‘रजनीगन्धा’ की पहली प्रति हाथ में लेने का अनुभव केवल खुशी का नहीं था। उस क्षण मुझे कटिहार का वह व्यक्ति याद आया जिसने कभी कहा था—“एक दिन तुम्हारी अपनी किताब छपेगी।”
वह व्यक्ति आज इस दुनिया में नहीं है।
इसलिए जब मैंने अपनी किताब पहली बार हाथ में ली, तो ऐसा लगा जैसे वर्षों पुरानी कोई आवाज फिर मेरे सामने आकर खड़ी हो गई हो। खुशी के साथ एक खालीपन भी था। काश, वह व्यक्ति आज होता और मैं उसके हाथ में अपनी किताब रख पाता।
इसलिए मेरे लिए ‘रजनीगन्धा’ केवल कविताओं का संग्रह नहीं है। उसमें मेरी साहित्यिक यात्रा के साथ-साथ कुछ लोग, कुछ स्मृतियाँ और कुछ अधूरे संवाद भी हैं।
शायद किताबें केवल वे नहीं होतीं जो हम लिखते हैं; कुछ किताबें उन लोगों की स्मृति में भी लिखी जाती हैं, जिन्होंने हमें लिखने का विश्वास दिया।
मेरे लिए ‘रजनीगन्धा’ ऐसी ही एक किताब है।
प्रश्न १०. आपकी प्रिय रचना ‘मेरी माटी मेरा देश’ है। इस रचना के पीछे कौन-सी अनुभूति, विचार या स्मृति काम कर रही थी? आपके लिए ‘माटी’ शब्द केवल जन्मभूमि का प्रतीक है या इसके भीतर कोई व्यापक राष्ट्रीय और सांस्कृतिक अर्थ भी निहित है?
शशिधर जी :- मेरे लिए ‘माटी’ बहुत व्यापक शब्द है। यह केवल वह जमीन नहीं है जहाँ हमारा जन्म हुआ; इसमें हमारी स्मृतियाँ, हमारी भाषा, हमारे संस्कार, हमारे पूर्वजों का संघर्ष और हमारी सामूहिक पहचान शामिल है।
‘मेरी माटी मेरा देश’ लिखते समय मेरे भीतर अपने देश और अपनी मिट्टी के प्रति एक गहरी भावनात्मक अनुभूति थी। मैंने महसूस किया कि देशभक्ति केवल नारों में नहीं होनी चाहिए। देश के प्रति प्रेम तभी सार्थक है जब उसमें अपने समाज, प्रकृति, श्रम करने वाले लोगों और अपनी सांस्कृतिक विविधता के प्रति सम्मान भी शामिल हो।
मेरे लिए माटी का अर्थ खेत में काम करता किसान भी है, सीमा पर खड़ा सैनिक भी है, अपना घर बनाने वाला मजदूर भी है और अपने सपनों के साथ आगे बढ़ती नई पीढ़ी भी।
माटी हमें जन्म देती है, पहचान देती है और अंततः हमें अपने भीतर समा लेती है। इसलिए ‘मेरी माटी मेरा देश’ मेरे लिए केवल देशभक्ति की रचना नहीं, बल्कि अपनी जड़ों को पहचानने की रचना है।
प्रश्न ११. आपको हिंदी गौरव सम्मान, सृजन शिखर सम्मान, चेतना मंच साहित्यकार सम्मान, भीष्म साहनी सम्मान, स्वामी विवेकानंद लिटरेरी अवार्ड सहित 30 से अधिक पुरस्कार एवं सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। इतने सम्मानों के बाद एक साहित्यकार के रूप में आपकी जिम्मेदारी और आत्ममूल्यांकन की भावना किस प्रकार बदलती है?
शशिधर जी :- सम्मान निश्चित रूप से उत्साह देते हैं। वे यह विश्वास भी देते हैं कि आपकी रचनाएँ पाठकों तक पहुँच रही हैं और साहित्यिक समाज उन्हें स्वीकार कर रहा है। लेकिन मेरे लिए हर सम्मान खुशी के साथ-साथ जिम्मेदारी भी लेकर आता है।
सम्मान मिलने के बाद सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि ‘मुझे कितना मिला’, बल्कि यह होना चाहिए कि ‘अब मुझे कितना बेहतर लिखना है।’
मैं पुरस्कारों को यात्रा का अंतिम प्रमाणपत्र नहीं मानता। साहित्य में कोई अंतिम पड़ाव नहीं होता। हर नई रचना लेखक की पिछली रचना से एक प्रश्न पूछती है कि क्या तुमने कुछ नया समझा, कुछ नया महसूस किया?
सम्मान मुझे विनम्र बनाते हैं, क्योंकि वे याद दिलाते हैं कि पाठकों और साहित्य-जगत ने जो विश्वास दिया है, उसे बनाए रखना भी मेरी जिम्मेदारी है।
मेरे लिए सबसे बड़ा सम्मान आज भी वह है जब कोई पाठक मेरी किसी पंक्ति में अपनी जिंदगी का कोई अंश पहचान ले।
प्रश्न १२. आप आईटी के क्षेत्र से जुड़े होने के साथ-साथ साहित्य-सृजन में भी सक्रिय हैं। वर्तमान डिजिटल युग में तकनीक हिंदी साहित्य के लिए चुनौती अधिक है या नए अवसरों का एक विशाल संसार? आप इसे किस दृष्टि से देखते हैं?
शशिधर जी :- मैं इसे चुनौती से अधिक अवसर के रूप में देखता हूँ, हालांकि चुनौतियाँ भी कम नहीं हैं।
डिजिटल तकनीक ने साहित्य को पाठक तक पहुँचाने की दूरी बहुत कम कर दी है। आज एक लेखक अपने शहर या अपने देश तक सीमित नहीं है। उसकी कविता कुछ ही क्षणों में दुनिया के किसी भी कोने तक पहुँच सकती है।
ई-पुस्तकें, डिजिटल पत्रिकाएँ, सोशल मीडिया, ऑडियोबुक और विभिन्न ऑनलाइन मंचों ने हिंदी के लिए संभावनाओं का एक नया संसार बनाया है।
लेकिन तकनीक के साथ एक खतरा भी है—गति ने धैर्य को कम किया है। आज हम बहुत कुछ जल्दी पढ़ना चाहते हैं, जल्दी प्रतिक्रिया देना चाहते हैं और जल्दी लोकप्रिय होना चाहते हैं। साहित्य को इसके विपरीत ठहराव, मनन और गहराई चाहिए।
इसलिए मेरा मानना है कि तकनीक को साहित्य का विकल्प नहीं, साहित्य तक पहुँचने का माध्यम बनाना चाहिए।
प्रश्न १३. शशिधर कुमार जी, वर्तमान समय में सोशल मीडिया एवं कृत्रिम बुद्धिमत्ता (ए आई) का जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में व्यापक प्रभाव हुआ है, आप साहित्य के क्षेत्र में सोशल मीडिया एवं कृत्रिम बुद्धिमत्ता के प्रभाव को किस रूप में देखते हैं?
शशिधर जी :- सोशल मीडिया ने साहित्य को लोकतांत्रिक बनाया है। पहले किसी लेखक की रचना पाठक तक पहुँचने के लिए प्रकाशन, पत्रिका या मंच पर निर्भर रहती थी। आज लेखक सीधे पाठक से संवाद कर सकता है। यह बहुत बड़ी संभावना है।
लेकिन सोशल मीडिया की अपनी चुनौती भी है—लोकप्रियता और साहित्यिक गुणवत्ता को एक समझ लेने का खतरा। अधिक ‘लाइक’ मिलना हमेशा बेहतर साहित्य का प्रमाण नहीं होता।
जहाँ तक कृत्रिम बुद्धिमत्ता की बात है, मैं इसे एक शक्तिशाली उपकरण के रूप में देखता हूँ। एआई शोध, भाषा-संपादन, विचार-संगठन, अनुवाद और कई तकनीकी कार्यों में लेखक की सहायता कर सकती है। लेकिन साहित्य का मूल स्रोत मनुष्य का अनुभव, संवेदना और जीवन है।
मेरा मानना है कि एआई शब्दों को व्यवस्थित करने में सहायता कर सकती है, लेकिन जीवन को जीने का अनुभव मनुष्य को ही करना होगा।
साहित्य केवल सही वाक्य लिखना नहीं है; साहित्य उस अनुभूति को शब्द देना है जिसे मनुष्य ने जिया है। इसलिए भविष्य में भी लेखक की सबसे बड़ी शक्ति उसकी मानवीय संवेदना ही रहेगी।
प्रश्न १४. आज साहित्य के सामने सामाजिक असमानता, मानवीय संवेदनाओं में कमी, सांस्कृतिक संक्रमण और तेजी से बदलते जीवन-मूल्यों जैसी अनेक चुनौतियाँ हैं। आपके विचार से समकालीन साहित्यकार को समाज के प्रति अपनी भूमिका किस प्रकार निभानी चाहिए?
शशिधर जी :- मेरे विचार से साहित्यकार को समाज का न्यायाधीश बनने से पहले उसका सजग साक्षी बनना चाहिए।
समाज में जो घट रहा है, उसे देखना, महसूस करना और ईमानदारी से शब्द देना साहित्यकार की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। साहित्य को किसी एक विचारधारा का प्रचार-पत्र बनने के बजाय मनुष्य की गरिमा और संवेदना का पक्षधर होना चाहिए।
आज जब सामाजिक असमानता, अकेलापन, हिंसा, सांस्कृतिक बदलाव और संवेदनहीनता हमारे आसपास दिखाई देती है, तब साहित्य का काम केवल मनोरंजन करना नहीं हो सकता।
हमें ऐसी रचनाएँ चाहिए जो प्रश्न पूछें, संवाद पैदा करें और मनुष्य को दूसरे मनुष्य के दुःख को समझने की क्षमता दें।
मैं मानता हूँ कि एक अच्छी रचना समाज को तुरंत नहीं बदलती, लेकिन वह किसी एक मनुष्य के भीतर सोच बदल सकती है; और समाज का बड़ा परिवर्तन अक्सर वहीं से शुरू होता है।
प्रश्न १५. बिहार की समृद्ध लोक-संस्कृति और हिंदी साहित्य की विशाल परंपरा से जुड़े एक साहित्यकार के रूप में आप आने वाली पीढ़ी के लिए कैसी साहित्यिक विरासत छोड़ना चाहते हैं? आपकी आगामी साहित्यिक योजनाएँ और रचनात्मक संकल्प क्या हैं?
शशिधर जी :- मैं ऐसी साहित्यिक विरासत छोड़ना चाहता हूँ जिसमें मेरी मिट्टी की गंध हो, लेकिन दृष्टि केवल अतीत में न अटकी हो। जिसमें लोकजीवन हो, लेकिन आधुनिक समय के प्रश्नों से भी संवाद हो। जिसमें प्रेम हो, संघर्ष हो, मनुष्य की पीड़ा हो और बेहतर समाज का सपना भी हो।
बिहार की लोक-संस्कृति और हिंदी साहित्य की परंपरा बहुत समृद्ध है। इस परंपरा से जुड़ना मेरे लिए गौरव के साथ-साथ जिम्मेदारी भी है। मैं चाहता हूँ कि मेरी रचनाओं में मेरी पीढ़ी के समय की आवाज दर्ज हो—ताकि आने वाली पीढ़ी जब हमारे समय को पढ़े तो उसे केवल घटनाएँ नहीं, उस समय के मनुष्य की धड़कन भी सुनाई दे।
आगे भी कविता, ग़ज़ल, कहानी और सामाजिक सरोकारों से जुड़े लेखन पर काम करने की मेरी इच्छा है। मेरा प्रयास रहेगा कि लेखन में केवल संख्या न बढ़े, बल्कि संवेदना और गुणवत्ता बढ़े।
और मेरा सबसे बड़ा रचनात्मक संकल्प शायद यही है—
मैं ऐसा लिखना चाहता हूँ कि मेरे शब्द मेरे बाद भी किसी पाठक के भीतर थोड़ी देर तक जीवित रहें।
अगर मेरी कोई कविता किसी उदास व्यक्ति को उम्मीद दे सके, कोई कहानी किसी को सोचने के लिए विवश कर सके या कोई पंक्ति किसी को दूसरे मनुष्य के प्रति थोड़ा अधिक संवेदनशील बना सके, तो मैं अपनी साहित्यिक यात्रा को सार्थक मानूँगा।
मेरे लिए साहित्य अंततः शब्दों की यात्रा नहीं, मनुष्य तक पहुँचने की यात्रा है।
✍🏻 वार्ता : श्री शशिधर कुमार
कल्प भेंटवार्ता में व्यक्तित्व परिचय के अंतर्गत आपका परिचय प्रबुद्ध साहित्यकार से कराने का विशेष प्रयास करते हुए आज हम बात कर रहे हैं कटिहार, बिहार के वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार श्री शशिधर कुमार जी से। इन्हें विस्तार से सुनने व देखने के लिए हमारे यूट्यूब चैनल पर जाएं 👇
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इनसे बातें करना व मिलना आपको कैसा लगा? आप हमें कमेन्ट में बता सकते हैं। आपकी विशिष्ट प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी।
मिलते हैं अगले सप्ताह एक और प्रबुद्ध साहित्यकार के साथ। तब तक के लिए हमें आज्ञा दीजिये।
राधे राधे 🙏 🪷 🙏
✍🏻 लिखते रहिये 📖 पढ़ते रहिये और 🚶 बढ़ते रहिये ✴️
✍🏻 प्रश्नकर्ता : कल्प भेंटवार्ता प्रबंधन
🦚 आयोजक : कल्पकथा प्रमुख श्री राधागोपीनाथ जी
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