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!! “कल्प भेंटवार्ता : व्यक्तित्व परिचय : डॉ. जितेन्द्र प्रसाद माथुर” !!

🏵️ !! “कल्प भेंटवार्ता : व्यक्तित्व परिचय : डॉ. जितेन्द्र प्रसाद माथुर” !! 🏵️ 

🌺 !! व्यक्तित्व परिचय !! 🌺

 

 

 !! “मेरा परिचय” !! 

 

 

नाम :- डॉ. जितेन्द्र प्रसाद माथुर.

 

माता/पिता का नाम :- स्व. श्री श्रीनारायण माथुर.

 स्व.श्रीमती विष्णु देवी माथुर.

 

जन्म स्थान :- जयपुर , राजस्थान.

 

पत्नी का नाम :- श्रीमती राजेश माथुर.

 

 

बच्चों के नाम :- 1.अंकुर माथुर, 2.अक्षय माथुर.

 

शिक्षा :- M.Com. (B.Adm.), D.H.M.S., D.J. व 

 M.A.(Hindi)

 

व्यवसाय :- सहायक मुख्य कुलानुशासक, (सेवा निवृत्त), राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर.

 

वर्तमान निवास :- मानसरोवर, जयपुर.

 

ई-मेल :- drjp9784@gmail.com.

 

 

 

🌸 !! मेरी साहित्यिक यात्रा !! 🌸

 

प्रकाशित कृतियाँ :-

 1. *मेरे शब्द छलक जाते हैं* काव्य संग्रह.

2.*सूखी सी मुस्कान.* उपन्न्यासिका.

3.*एक दिन-एक उम्र.*

     उपन्न्यासिका. प्रकाशनाधीन.

4.*मेरी लघुकथाएँ.* प्रकाशनाधीन.

 

साझा संकलन :- पिता का आशीर्वाद, हस्ताक्षर, हास्य और व्यंग्य ही जीवन है, 

जैसी लगभग 7 संकलन.

 

आगामी कृतियाँ :- उपरोक्त

 

 

 

🌷 !! मेरी पसंद !! 🌷

 

उत्सव :- साहित्यिक उत्सव, दीपावली

    

भोजन :- सभी प्रकार का सादा भोजन

 

रंग :- आसमानी

 

परिधान :- सूट, कुर्ता पाजामा

 

पसंदीदा स्थान :- जयपुर

 

प्रिय लेखक/लेखिका :- सभी लेखकों की साहित्यिक रचनाएँ पसन्द

 

पसंदीदा धारावाहिक :- तारक मेहता का उल्टा चश्मा.

 

पसंदीदा फिल्में :- फिल्म देखना पसंद नहीं

 

पसंदीदा संगीत :- क्लासिक संगीत

 

 

 

🌸 !! मेरे व्यक्तित्व की झलक !! 🌸

 

जीवन का मूल मंत्र :- जीओ और जीने दो

 

जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि :- साहित्य का लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड 

 

✍🏻 कल्प भेंटवार्ता प्रबंधन

 

 

 

 

💠 !! कल्प भेंटवार्ता के प्रश्न : डॉ. जितेन्द्र प्रसाद माथुर जी के उत्तर !! 💠 

 

 

प्रश्न १. बचपन, पारिवारिक संस्कार और व्यक्तित्व निर्माण के बारे में बताइए।

 

उत्तर: मेरा जन्म 10 जुलाई 1952 को जयपुर की सांस्कृतिक धरती पर हुआ। मेरे माता-पिता, स्वर्गीय श्रीमती विष्णु देवी और स्वर्गीय श्री श्रीनारायण माथुर के संस्कारों ने मेरे जीवन को दिशा दी। सरलता, संवेदनशीलता, मानवीय संबंधों का सम्मान और सकारात्मक दृष्टिकोण मेरे व्यक्तित्व के प्रमुख आधार रहे हैं। जीवन के अनुभवों ने मुझे मनुष्य को समझना और उसकी भावनाओं को शब्द देना सिखाया।

 

प्रश्न २. राजस्थान विश्वविद्यालय में आपके सेवाकाल का कोई विशेष अनुभव?

 

उत्तर: राजस्थान विश्वविद्यालय में लगभग 36 वर्षों की सेवा मेरे जीवन का महत्त्वपूर्ण अध्याय रही। सहायक मुख्य कुलानुशासक के रूप में अनुशासन, उत्तरदायित्व और मानवीय व्यवहार के बीच संतुलन बनाए रखना मेरे लिए एक बड़ी सीख थी। इस दौरान विद्यार्थियों और विभिन्न व्यक्तित्वों के संपर्क ने मुझे समझाया कि किसी भी समस्या का समाधान कठोरता से अधिक विवेक, संवाद और संवेदनशीलता में निहित है।

 

प्रश्न ३. आपके जीवन-मंत्र ‘जियो और जीने दो’ का वास्तविक अर्थ क्या है?

 

उत्तर: मेरे लिए ‘जियो और जीने दो’ केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन है। प्रत्येक व्यक्ति को अपनी सोच, रुचि और व्यक्तित्व के अनुसार जीने का अधिकार है। हमें अपनी मान्यताएँ दूसरों पर थोपने के बजाय उनके विचारों का सम्मान करना चाहिए। परस्पर सम्मान, सहिष्णुता और सद्भाव से ही जीवन सुंदर बनता है।

 

प्रश्न ४. आपकी साहित्यिक यात्रा में परिवार और जीवनसंगिनी का कितना सहयोग रहा?

 

उत्तर: परिवार जीवन की शक्ति और भावनात्मक संबल होता है। मेरी जीवनसंगिनी श्रीमती राजेश माथुर का साथ मेरे लिए महत्त्वपूर्ण है। साहित्य-सृजन के लिए मानसिक शांति, समय और भावनात्मक समझ की आवश्यकता होती है, जिसमें परिवार की भूमिका महत्त्वपूर्ण रहती है। पारिवारिक संबंधों की आत्मीयता, संवेदनाएँ और जीवन की छोटी-बड़ी घटनाएँ मेरी रचनाओं को भी विषय और भावभूमि प्रदान करती हैं।

 

प्रश्न ५. ‘मेरे शब्द छलक जाते हैं’ शीर्षक के पीछे क्या भावना है?

 

उत्तर: जब मन में भावनाएँ उमड़ती हैं और अनुभव अभिव्यक्ति के लिए व्याकुल होते हैं, तो शब्द स्वतः छलक पड़ते हैं। मेरे काव्य-संग्रह ‘मेरे शब्द छलक जाते हैं’ का शीर्षक इसी भावभूमि से जुड़ा है। मैं चाहता हूँ कि मेरी रचनाएँ पाठकों के मन को स्पर्श करें, उन्हें आत्मचिंतन के लिए प्रेरित करें और जीवन के सुख-दुःख से आत्मीय संबंध स्थापित करें।

 

प्रश्न ६. उपन्यासिका ‘सूखी-सी मुस्कान’ की मूल संवेदना क्या है?

 

उत्तर: ‘सूखी-सी मुस्कान’ स्त्री-मन की अनकही पीड़ा, रिश्तों की जटिलता, आधुनिक जीवन के अकेलेपन और संघर्ष के बीच जीवित रहने की जिजीविषा की कथा है। इसके माध्यम से मैंने यह रेखांकित करने का प्रयास किया है कि मुस्कान हमेशा सुख का प्रमाण नहीं होती; कभी-कभी उसके पीछे गहरी वेदना छिपी होती है। मेरी दृष्टि में मनुष्य की वास्तविक शक्ति विपरीत परिस्थितियों में भी अपनी गरिमा और आत्मसम्मान बनाए रखने में है।

 

प्रश्न ७. ‘एक दिन—एक उम्र’ और ‘मेरी लघुकथाएँ’ की विषयवस्तु क्या है?

 

उत्तर: ‘एक दिन—एक उम्र’ में समय, स्मृतियों, प्रेम, संबंधों और मनुष्य के मनोवैज्ञानिक द्वंद्वों को केंद्र में रखा गया है। कभी-कभी जीवन का एक दिन हमारे भीतर पूरी उम्र की अनुभूतियाँ जगा देता है। वहीं, मेरी लघुकथाएँ जीवन के छोटे-छोटे प्रसंगों में छिपे बड़े सत्य, सामाजिक विसंगतियों और मानवीय संवेदनाओं को उजागर करने का प्रयास हैं। इन रचनाओं के माध्यम से मैं जीवन के अनकहे पक्षों को अभिव्यक्ति देना चाहता हूँ।

 

प्रश्न ८. साझा संकलनों और व्यक्तिगत पुस्तक के अनुभव में क्या अंतर है?

 

उत्तर: साझा संकलन अनेक रचनाकारों की सृजनात्मक प्रतिभा को एक मंच प्रदान करते हैं और साहित्यिक संवाद को विस्तार देते हैं। व्यक्तिगत पुस्तक में लेखक को अपनी संवेदना, विचारधारा और रचनात्मक दृष्टि को स्वतंत्र रूप से प्रस्तुत करने का अवसर मिलता है। मेरे लिए दोनों का अपना महत्त्व है। साझा संकलन साहित्यिक सहभागिता का प्रतीक हैं, जबकि व्यक्तिगत पुस्तक लेखक की सृजन-यात्रा का अपेक्षाकृत व्यापक प्रतिबिंब होती है।

 

प्रश्न ९. आपके बहुआयामी अध्ययन ने लेखन को कैसे समृद्ध किया?

 

उत्तर: वाणिज्य, हिंदी साहित्य, पत्रकारिता और अन्य विषयों के अध्ययन ने मुझे जीवन को विभिन्न दृष्टियों से देखने की समझ दी। वाणिज्य ने व्यावहारिक पक्ष, पत्रकारिता ने समसामयिकता और साहित्य ने संवेदनशील अभिव्यक्ति की दृष्टि विकसित की। हास्य और व्यंग्य के माध्यम से मैं विसंगतियों पर चोट करना चाहता हूँ, जबकि गंभीर रचनाओं में मानवीय पीड़ा और संबंधों की गहराई को स्वर देता हूँ। मेरा प्रयास रहता है कि विचार की गंभीरता और भाषा की सहजता साथ-साथ चलें।

 

प्रश्न १०. साहित्य का लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड प्राप्त करना आपके लिए क्या मायने रखता है?

 

उत्तर: साहित्य के क्षेत्र में लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड प्राप्त करना मेरे लिए प्रसन्नता, संतोष और विनम्रता का विषय है। यह सम्मान मेरी अब तक की साहित्यिक यात्रा के प्रति एक सकारात्मक स्वीकार्यता है। मैं इसे अपनी यात्रा का विराम नहीं, बल्कि आगे और बेहतर लिखने की प्रेरणा मानता हूँ। मेरे विचार में सम्मान तभी सार्थक है, जब वह रचनाकार को अपनी जिम्मेदारियों के प्रति अधिक सजग बनाए।

 

प्रश्न ११. एक पाठक के रूप में आप किसी रचना में सबसे पहले क्या तलाशते हैं?

 

उत्तर: मैं किसी रचना में सबसे पहले उसकी संवेदनात्मक सच्चाई और मौलिकता तलाशता हूँ। भाषा सरल हो या अलंकृत, वह भावों को प्रभावी ढंग से व्यक्त करने में समर्थ होनी चाहिए। विचारों की गहराई, सामाजिक सरोकार और मानवीय अनुभूतियाँ रचना को स्थायित्व प्रदान करती हैं। मेरा मानना है कि अच्छी रचना वह है, जो पढ़ने के बाद भी पाठक के मन में बनी रहे।

 

प्रश्न १२. डिजिटल माध्यमों ने हिंदी साहित्य को कितना लाभ पहुँचाया है?

 

उत्तर: डिजिटल माध्यमों ने हिंदी साहित्य को व्यापक पाठक-वर्ग तक पहुँचाने के नए अवसर दिए हैं। अब रचनाकार भौगोलिक सीमाओं से परे अपनी रचनाएँ साझा कर सकते हैं और तत्काल संवाद स्थापित कर सकते हैं। किंतु पहुँच का विस्तार ही साहित्यिक गुणवत्ता का प्रमाण नहीं है। भाषा की शुद्धता, मौलिकता, विचारों की गहराई और संपादन के अनुशासन पर ध्यान देना भी उतना ही आवश्यक है। तकनीक साधन बने, सृजनशीलता का विकल्प नहीं।

 

प्रश्न १३. साहित्य और दीपावली के प्रकाश में आप क्या समानता देखते हैं?

 

उत्तर: दीपावली बाहरी अंधकार को दूर करने के साथ मन में आशा और सकारात्मकता जगाने का पर्व है। साहित्य भी अज्ञान, रूढ़ियों, संवेदनहीनता और सामाजिक विसंगतियों के अंधकार को दूर करने का प्रयास करता है। जिस प्रकार एक दीप अनेक दीपों को प्रज्वलित कर सकता है, उसी प्रकार एक सार्थक रचना अनेक मनों में विचार और संवेदना का प्रकाश जगा सकती है। मेरे लिए साहित्य भी एक प्रकार की दीप-साधना है।

 

प्रश्न १४. जीवन की वह कौन-सी सीख है, जिसे आप नई पीढ़ी से साझा करना चाहेंगे?

 

उत्तर: जीवन ने मुझे सिखाया है कि परिस्थितियाँ सदैव हमारे अनुकूल नहीं होतीं, लेकिन उनके प्रति हमारा दृष्टिकोण हमारे हाथ में होता है। कठिनाइयों में धैर्य, संबंधों में संवेदनशीलता और अपने कर्म के प्रति ईमानदारी बनाए रखनी चाहिए। नई पीढ़ी से मेरा यही आग्रह है कि सफलता की दौड़ में मानवीय मूल्यों को न भूलें। जीवन में आगे बढ़ें, लेकिन दूसरों को पीछे धकेलकर नहीं।

 

प्रश्न १५. भविष्य की साहित्यिक योजनाएँ और पाठकों के लिए आपका संदेश क्या है?

 

उत्तर: भविष्य में भी कविता, कहानी, लघुकथा, गीत, नवगीत और समसामयिक विषयों पर लेखन जारी रखने की इच्छा है। मेरी कोशिश रहेगी कि बदलते समय के प्रश्नों, मानवीय संबंधों की जटिलताओं और समाज की विसंगतियों को अपनी रचनाओं में स्थान दूँ। पाठकों से मेरा विनम्र आग्रह है कि साहित्य को केवल पढ़ें नहीं, उसे जीवन में महसूस भी करें। यदि मेरी कोई रचना किसी एक व्यक्ति के मन में संवेदना, सकारात्मकता या आत्मचिंतन का दीप जला सके, तो मैं अपने लेखन को सार्थक मानूँगा।

 

✍🏻 वार्ता : डॉ. जितेन्द्र प्रसाद माथुर

 

 

कल्प भेंटवार्ता में व्यक्तित्व परिचय के अंतर्गत आपका परिचय वरिष्ठ साहित्यकार से कराने का विशेष प्रयास करते हुए आज हम बात कर रहे हैं जयपुर, राजस्थान की के विद्वान लेखक व साहित्यकार डॉ. जितेन्द्र प्रसाद माथुर जी से। इन्हें विस्तार से सुनने व देखने के लिए हमारे यूट्यूब चैनल पर जाएं 👇

 

https://www.youtube.com/live/rdgG8NwReyQ?si=KNkn2JiK0aZR1HLx

 

इनसे बातें करना व मिलना आपको कैसा लगा? आप हमें कमेन्ट में बता सकते हैं। आपकी विशिष्ट प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी। 

 

मिलते हैं अगले सप्ताह एक और प्रबुद्ध साहित्यकार के साथ। तब तक के लिए हमें आज्ञा दीजिये। 

राधे राधे 🙏 🪷 🙏 

 

✍🏻 लिखते रहिये 📖 पढ़ते रहिये और 🚶 बढ़ते रहिये ✴️ 

 

✍🏻 प्रश्नकर्ता : कल्प भेंटवार्ता प्रबंधन 

 

🦚 आयोजक : कल्पकथा प्रमुख श्री राधागोपीनाथ जी 

 

कल्प भेंटवार्ता

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