
“!! व्यक्तित्व परिचय :- डॉ रवि ‘घायल’ !!”
- कल्प भेंटवार्ता
- 17/04/2025
- लेख
- भेंटवार्ता
- 2 Comments
कल्प भेंटवार्ता
Continue ReadingDark
Auto
Light
Dark
Auto
Light

कल्प भेंटवार्ता
Continue Reading
“मन के भाव शब्दों में उतरते रहे
और यूँ ही, बस यूँ ही,
इंद्रधनुष पृष्ठों पर उभरते रहे
सुधिजनों के सानिध्य में लेखनी निखरती रही
मन भावों की सुगंध संग, सुगंध सँवरती रही…”

“यथा चित्तं तथा वाचः, यथा वाचः तथा कर्म”— जैसा मन होता है, वैसी ही वाणी और कर्म होते हैं। मेरी रचनात्मक प्रक्रिया भी इसी सिद्धांत पर आधारित है।
Continue Reading
भक्ति डूब कर ऊब कर नहीं
मिलिए सब सौं दुर्भाव बिना रहिये सत्संग उजागर में।
रसखान गुविन्दही यौ भजिये जिमि नागरी को चित गागर में।।

कल्पकथा परिवार ने हम सभी साहित्यकारों को एक सुन्दर, रचनात्मक मंच प्रदान किया है। कल्पकथा के सभी आयोजन, प्रतियोगिता एक वृहद सकारात्मक उद्देश्य को समाहित रखते हैं। संवाद वार्ताएं आयोजित की जाती हैं। विशिष्ट व्यक्तित्व से परिचित करवाया जाता है।
Continue Reading
श्री राधा गोपीनाथ बाबा के प्रमुखता से मैं और कल्पकथा के सभी सदस्य स्वयं को भाग्यशाली समझते हैं क्योंकि यह इकलौता मंच से जहां देशभक्ति, ईश्वर भक्ति सनातन धर्म के प्रति साहित्य को जोड़कर यह मंच खुद की प्रतिष्ठा को कायम रख रहा है। और मैं इससे प्रभावित ही नहीं सन्तुष्ट भी हूं।
Continue Reading
श्री राधा गोपीनाथ बाबा के प्रमुखता से मैं और कल्पकथा के सभी सदस्य स्वयं को भाग्यशाली समझते हैं क्योंकि यह इकलौता मंच से जहां देशभक्ति, ईश्वर भक्ति सनातन धर्म के प्रति साहित्य को जोड़कर यह मंच खुद की प्रतिष्ठा को कायम रख रहा है। और मैं इससे प्रभावित ही नहीं सन्तुष्ट भी हूं।
Continue Reading
हिन्दी में अन्य भाषाओं के शब्दों का समावेश एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, जो इसे अधिक समृद्ध और व्यापक बनाता है। यह प्रवृत्ति साहित्य को आधुनिक और प्रासंगिक बनाती है, जिससे नई पीढ़ी आसानी से जुड़ पाती है। हालांकि, मूल भाषा की शुद्धता बनाए रखना भी आवश्यक है ताकि हिन्दी की विशिष्टता और सांस्कृतिक पहचान बनी रहे।
Continue Reading
जब मैं पहली कविता लिखी थी तो मेरी मम्मी ने मुझे बहुत डांट लगाई थी कि अब तुम भगवान राम की भी हंसी उड़ाने लगी हो। परंतु जब उन्होंने पूरी कविता का मर्म समझा और जाना तो मुझे बहुत शाबासी दी।
Continue Reading
जब भी कलम उठे, जब भी वाणी निकले, जब भी उद्बोधन हो तथा कोई आचरण हो, सदैव मर्यादित, अनुशासित एवं देश और समाज के हित में हो। संस्कार और अनुशासन से समझौता नहीं होना चाहिए। देश सर्वोपरि हो।
Continue Reading