
📹 “!! कल्प लाइव भेंटवार्ता श्रीमती नेहा शर्मा जी के साथ !!” 📝
- कल्प भेंटवार्ता
- 24/04/2025
- लेख
- संस्मरण
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कल्प भेंटवार्ता
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“मन के भाव शब्दों में उतरते रहे
और यूँ ही, बस यूँ ही,
इंद्रधनुष पृष्ठों पर उभरते रहे
सुधिजनों के सानिध्य में लेखनी निखरती रही
मन भावों की सुगंध संग, सुगंध सँवरती रही…”

“यथा चित्तं तथा वाचः, यथा वाचः तथा कर्म”— जैसा मन होता है, वैसी ही वाणी और कर्म होते हैं। मेरी रचनात्मक प्रक्रिया भी इसी सिद्धांत पर आधारित है।
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भक्ति डूब कर ऊब कर नहीं
मिलिए सब सौं दुर्भाव बिना रहिये सत्संग उजागर में।
रसखान गुविन्दही यौ भजिये जिमि नागरी को चित गागर में।।

कल्पकथा परिवार ने हम सभी साहित्यकारों को एक सुन्दर, रचनात्मक मंच प्रदान किया है। कल्पकथा के सभी आयोजन, प्रतियोगिता एक वृहद सकारात्मक उद्देश्य को समाहित रखते हैं। संवाद वार्ताएं आयोजित की जाती हैं। विशिष्ट व्यक्तित्व से परिचित करवाया जाता है।
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श्री राधा गोपीनाथ बाबा के प्रमुखता से मैं और कल्पकथा के सभी सदस्य स्वयं को भाग्यशाली समझते हैं क्योंकि यह इकलौता मंच से जहां देशभक्ति, ईश्वर भक्ति सनातन धर्म के प्रति साहित्य को जोड़कर यह मंच खुद की प्रतिष्ठा को कायम रख रहा है। और मैं इससे प्रभावित ही नहीं सन्तुष्ट भी हूं।
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श्री राधा गोपीनाथ बाबा के प्रमुखता से मैं और कल्पकथा के सभी सदस्य स्वयं को भाग्यशाली समझते हैं क्योंकि यह इकलौता मंच से जहां देशभक्ति, ईश्वर भक्ति सनातन धर्म के प्रति साहित्य को जोड़कर यह मंच खुद की प्रतिष्ठा को कायम रख रहा है। और मैं इससे प्रभावित ही नहीं सन्तुष्ट भी हूं।
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हिन्दी में अन्य भाषाओं के शब्दों का समावेश एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, जो इसे अधिक समृद्ध और व्यापक बनाता है। यह प्रवृत्ति साहित्य को आधुनिक और प्रासंगिक बनाती है, जिससे नई पीढ़ी आसानी से जुड़ पाती है। हालांकि, मूल भाषा की शुद्धता बनाए रखना भी आवश्यक है ताकि हिन्दी की विशिष्टता और सांस्कृतिक पहचान बनी रहे।
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जब मैं पहली कविता लिखी थी तो मेरी मम्मी ने मुझे बहुत डांट लगाई थी कि अब तुम भगवान राम की भी हंसी उड़ाने लगी हो। परंतु जब उन्होंने पूरी कविता का मर्म समझा और जाना तो मुझे बहुत शाबासी दी।
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