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घर वापसी

शीर्षक: घर वापसी पिता सोच रहा है,खुश हूं इस बात पर कि बेटा लौट आया है ,उसके पास ।या मनाऊं मातम ,कि सपनों का खून कर लौटा है घर वापस । माटी के आंचल में रोने को,शायद टूट कर ।क्योंकि शहरों की सड़कों पर ,कहां है वह गांव की मिट्टी की सी नमी ?जहां ना रोने को कोई कंधा ही …

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“वो हमारे परमवीर”

कीर्ति जिनकी है अजर, तेज जिनका है प्रखर, शौर्य जिनका है अमर,  देश जिनका मन हैं प्राण हैं। वो हमारे परमवीर, वो हमारे स्वाभिमान हैं। – 2 राष्ट्र जिनकी चेतना, राष्ट्र जिनकी वंदना, राष्ट्र जिनकी प्रार्थना, राष्ट्र जिनकी आन बान हैं।  वो हमारे परमवीर, वो हमारे स्वाभिमान हैं। – 2 कीर्ति जिनकी है अजर, तेज जिनका है प्रखर, शौर्य जिनका …

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प्रतीक

शीर्षक: प्रतीक । चर्चा का विषय रहा है,औरत का विधवा होना,टूटना चूड़ियों का, मांग का सुना होना ।कहते है…पुरुष ने क्या पुण्य किया,विधुर होने पर भी , पत्नी को क्या दिया ? घड़ी, ऐनक या हुक्का, कोई प्रतीकतो पुरुष के लिए होते,तोड़कर जिन्हें..विधुर होने का प्रमाण देते ।पर टूट गया जिसका जग सारा, और छूट गया गृहस्थी का सहारा ,जिसके …

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खानाबदोश ( बंजारे )

शीर्षक: खानाबदोश ( बंजारे ) खाने का ना होश है,जिंदगी खानाबदोश है ।चिथड़ों से ढकते है लाज को,चुप रहकर कहते है अपनी बात को । टुकड़ों पर पलते है बच्चे,चलते है, रास्ते तो है, मगर कच्चे ।अजब जिंदगी का ये मोड़ है,इसे चलाता तो कोई और है । कारवां गमों से रहा है भर,खाली हाथ मुझे रहा है कर ।आज …

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आदमी की कहानी

आदमी अंदर-अंदर दु:खी है,औरों के सामने है खुश। अंदर से है टूटा- टूटा,अपनों के लिए है खुश। (खुशी) हंसती है अपने आने पर,वो रोता है उसे पाने पर । वो सोता तो है ,(सोने )को ,पर जागता है उसे पाने को । वो दिखना कोई चाहता है,पर अंदर से देखें तो,वो दिखता है कोई और । कौन सुनता है उसकी …

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यहां कौन तेरा है?

शीर्षक: यहां कौन तेरा है ? हम आएं है किस जहां से,किस जहां में हमारा गमन होगा।किन रिश्तों को छोड़ आए पीछे,किन नातों का आगमन होगा। जीवन के रहते रिश्ते-नाते निभाते ,मृत्यु उपरांत किसी नए सफर को निकल जाते ।किस जन्म में कौन था अपना, कौन पराया, भूल चुके है अब सारे वादे, सारे रिश्ते-नाते । सफ़र जीवन-मरण के हर …

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पौने का होना ( पूरे से कम )

पौने का होना ( पूरे से कुछ कम ) जीवन में जो कुछ मिला,पौना ही रह गया,दी सांस अगर , जीना था, सौ वर्ष मगर,पौना ही रह गया, सोचा था खेलेंगे मन भर,मां ने जो लगाई आवाज़खेल अधूरा ही रह गया,पढ़ पढ़ कर काटी रात सभीआया निष्कर्ष तोपौना ही रह गया, पाया तो रिश्तों में कुछ न ,लोगों को खोना …

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सप्तशती सारांश

शीर्षक: सप्तशती सारांश  जो प्रतापी था, वह स्वजन से हारा गया,स्व प्रजा का बोझ ना, अब उससे धारा गया ।रण से हारा, लौट रहा था नगर को,मन से हारा, बल से ना वह मारा गया । नाम सुरथ था, न्याय में ना उसका कोई पार था,अपनी प्रजा, अपनी पत्नी, अपने पुत्रों से उसे प्यार था ।आज रण में हारकर, सबके …

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