!! “कल्प भेंटवार्ता : व्यक्तित्व परिचय : श्रीमती कल्याणी गुप्ता कृति” !!
- कल्प भेंटवार्ता
- 19/06/2026
- लेख
- साक्षात्कार
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!! “कल्प भेंटवार्ता : व्यक्तित्व परिचय : श्रीमती कल्याणी गुप्ता कृति” !!
तिथि :- १८/६/२०२६
सम्पर्क सूत्र :- 7974641255
!! “मेरा परिचय” !!
नाम :- श्रीमती कल्याणी गुप्ता “कृति”
माता/पिता का नाम :- शारदा देवी/स्व महेशचंद्र सुगंधी
जन्म स्थान एवं जन्म तिथि :- जोबट मध्यप्रदेश 19/04/80
पति/पत्नी का नाम :- भूपेंद्र गुप्ता
बच्चों के नाम :- ओजस्वी गुप्ता पुत्री
शिक्षा :- M.SC.MA हिंदी साहित्य, D.Ed
व्यावसाय :- विद्यालयीन संदर्भ पुस्तक लेखन
वर्तमान निवास :- इंदौर मध्यप्रदेश
आपकी मेल आई डी :-
kalyani.gupta14@gmail.com
आपकी कृतियाँ :-
आपकी विशिष्ट कृतियाँ :-
डिजिटल संस्करण
साझा संकलन: महिला एक जननी,पिता की छाँव,आस्था के रंग,बसंतराग , निर्झरा , बेटियाँ
संपादन : सृजनदीप
आपकी प्रकाशित कृतियाँ :-
ऑफलाइन:
निर्झर, वसंत राग, सृजनदीप
पुरूस्कार एवं विशिष्ट स्थान :-
📍इंदौर रत्न अलंकरण सम्मान
📍विश्व हिंदी रचनाकार मंच सम्मान
📍पत्रिका समाचार पत्र में इंदौरी तासीर एवं इंदौरी सवाल कॉलम लेखन
इंदौर समाचार,विनय उजाला नईदुनियाँ में लेख,कविता कहानी प्रकाशन।
!! “मेरी पसंद” !!
उत्सव :- दिवाली
भोजन :- घर का सादा भोजन
रंग :नीला
परिधान : साड़ी
स्थान एवं तीर्थ स्थान :- इंदौर
तीर्थ स्थान : वैष्णो देवी, वृंदावन
कवि/कवयित्री :- गोपालदास नीरज, निराला, दुष्यंत कुमार
उपन्यास/कहानी/पुस्तक :-
उपन्यास: अपने अपने अज़नबी (अज्ञेय) ,एक योगी की आत्मकथा (परमहंस योगानंद),
सबहीं नचावत राम गोसाईं ( भगवती शरण उपाध्याय), शह और मात (राजेंद्र यादव)
कहानी: राजा निरबंसिया (कमलेश्वर)
दिल्ली में एक मौत ( कमलेश्वर)
उसने कहा था ( चंद्रधर शर्मा गुलेरी)
खेल : राइफल शूटिंग (मेरी बेटी नेशनल लेवल राइफल शूटर है)
फिल्में/धारावाहिक (यदि देखते हैं तो) :- खामोशी (पुरानी), चुपके चुपके, लम्हें, ब्लैक
धारावाहिक : नहीं
आपकी लिखी हुई आपकी सबसे प्रिय कृति :-
गीत : तुम न लौटे कभी मैं बुलाती रही
!! कल्प भेंटवार्ता के प्रश्न : कल्याणी जी के उत्तर !!
प्रश्न १. – जीवन की इस यात्रा में साहित्य के प्रति आपकी चेतना का प्रथम अंकुर कब और किन परिस्थितियों में प्रस्फुटित हुआ?
कल्याणी जी :– साहित्य के प्रति रुझान बचपन से
रहा ,इसका श्रेय मेरे पिताजी और दादीजी को जाता है। उन्होंने कक्षा दो से मेरे लिए सामान्य ज्ञान की पुस्तकें लाना शुरू कर दिया था इसके बाद अन्य पुस्तकें पढ़ने लगी घर में प्रतिमाह राजकमल प्रकाशन से पुस्तकें आती थी,पिताजी मंचीय कवि भी थे उनके द्वारा कविताएँ पाठ श्रवण करते हुए और पढ़ते पढ़ते मैने स्वयं नौ वर्ष की उम्र से लेखन शुरू कर दिया।
प्रश्न २. – विज्ञान एवं हिंदी साहित्य, दोनों विषयों में आपकी गहरी रुचि रही है। इन दोनों धाराओं ने आपके व्यक्तित्व को किस प्रकार समृद्ध किया?
कल्याणी जी :– मेरे विचार से विज्ञान और साहित्य देखने में बहुत भिन्न लगते हैं, एक तर्क की बात करता है तो दूसरा हृदय में उपजी कल्पनाओं की लेकिन मैने विद्यालयीन कक्षाओं में माध्यमिक स्तर पर सारे विषय पढ़ाए है तब अक्सर हिंदी की कक्षा में विज्ञान के उदाहरण देकर समझाती थी,छात्र जल्दी समझ जाते थे,क्योंकि विज्ञान आसपास घटित होता है समझ आता है।
प्रत्येक मस्तिष्क में तर्कशीलता और रचनात्मकता के दो अलग भाग होते हैं, बांया और दायां भाग इन्हें कंट्रोल करता है यदि किसी व्यक्ति में तर्कशीलता और कल्पना इन दोनों का सामंजस्य हो जाता है तो दिमाग अधिक क्षमता से दोनों क्षेत्रों में कार्य करने लगता है।
यह हुआ वैज्ञानिक तर्क पूर्ण उत्तर ,परंतु इसके साथ ही इसमें रुचि भी पूर्णतया समाहित है।
प्रश्न ३. – जोबट की माटी से लेकर इंदौर तक की आपकी यात्रा ने आपके चिंतन और सृजन को किस प्रकार आकार दिया?
कल्याणी जी :– जोबट मेरा केवल जन्मस्थान है वहाँ रहना नहीं हो पाया। मेरे जीवन का शुरुआती समय दादीजी और पिताजी के शासकीय सेवास्थलों के साथ बदलता रहा , बचपन अधिकतर निमाड़ क्षेत्र और उसके बाद पढ़ाई के लिए इंदौर आकर वहीँ रहना हुआ,इन सभी स्थानों पर,विभिन्न क्षेत्रों में रहते हुए मैं आसपास के वातावरण ,संस्कृति,शिक्षकों आदि से बहुत कुछ ग्रहण चली गई ,इंदौर में साहित्यिक कार्यक्रमों से जुड़ाव हुआ इसके बाद इस यात्रा को और विस्तार मिलता चला गया।
प्रश्न ४. – विद्यालयीन संदर्भ पुस्तकों के लेखन एवं साहित्य-सृजन, दोनों क्षेत्रों में सक्रिय रहने का अनुभव कैसा रहा?
कल्याणी जी :– मैं शुरुआत से ही लेखन और पठन से जुड़ी हूँ पिताजी शिक्षक थे,घर में ट्यूशंस कक्षाएं चलती थी,तो वो माहौल शुरू से देखा मैने भी स्वयं की पढ़ाई के साथ ट्यूशंस भी पढ़ाती रही,भाई साहब विद्यालयीन संदर्भ पुस्तक प्रकाशन कंपनी के कार्यरत थे उनसे सीखते हुए शौकिया मैने भी संदर्भ पुस्तकों का लेखन शुरू कर दिया ,मेरी शासकीय शिक्षिका की नौकरी भी बीस वर्ष की उम्र में लग चुकी थी ,२२ वर्ष की उम्र में मैने पहली बार कक्षा पांच संपूर्ण विषय की विद्यालयीन संदर्भ पुस्तक लिखी,उसके बाद जैसे समय मिलता रहा आज तक ये कार्य जारी है, और साहित्य की यात्रा भी उसी के समानांतर चल रही है।
प्रश्न ५ – आपकी दृष्टि में साहित्य केवल अभिव्यक्ति का माध्यम है या समाज और मानवीय संवेदनाओं का दर्पण भी?
कल्याणी जी :– साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता है, हमें दर्पण से स्वयं की छवि स्पष्ट देखने के लिए उसे साफ और परावर्तन योग्य बनाए रखना आवश्यक है। साहित्य की प्रेरणा समाज से आती है वैसे ही समाज में चेतना के जागरण का स्रोत की भूमिका साहित्य निभाता है इसलिए साहित्य को देश और समाज हित में सोद्देश्यपूर्ण होना चाहिए।
प्रश्न ६. – “महिला एक जननी”, “पिता की छाँव”, “बेटियाँ” जैसे विषयों से आपका विशेष जुड़ाव रहा है। परिवार और नारी-चेतना को आप साहित्य में किस रूप में देखती हैं?
कल्याणी जी :– नारी किसी भी परिवार की धूरी होती है,नारी का उत्थान समाज का उत्थान है।
मेरे विचार से समाज में नारी विमर्श से जुड़े मुद्दों पर अब भी संतुलित रूप से सही दिशा में बहुत कार्य किया जाना आवश्यक है।साहित्य का भी उद्देश्य यही होना चाहिए कि वो इन महत्वपूर्ण मुद्दों पर चेतना जागृत कर समाज कल्याण हेतु संकल्पित रहे।
प्रश्न ७. – “सृजनदीप” के संपादन से जुड़ने का अनुभव कैसा रहा? एक रचनाकार और संपादक की दृष्टि में आप क्या अंतर अनुभव करती हैं?
कल्याणी जी :– सृजनदीय मेरे साहित्यिक समूह शब्द सागर की वार्षिक पत्रिका है अभी इसका एक अंक प्रकाशित हुआ है।
मुझे लगता है एक रचनाकार के रूप में कार्य में जितनी स्वतंत्रता होती है उतना ही एक संपादक को अपने लक्ष्य की प्राप्ति हेतु कठोर होना पड़ता है,कई ऐसे फैसले लेना होते है जो व्यक्तिगत रूप से भले ही सही नहीं हो परंतु पत्रिका या किसी प्रोजेक्ट की आवश्यकता हो,साथ ही सबसे समन्वय और समय सीमा में कार्य भी पूर्ण करना होता है इसलिए मेरे विचार से यह कार्य अधिक चुनौतीपूर्ण है।
प्रश्न ८. – आपकी प्रिय रचना “तुम न लौटे कभी, मैं बुलाती रही” की भावभूमि और सृजन-प्रक्रिया के बारे में हमारे श्रोताओं को बताइए।
कल्याणी जी :– यह एक प्रेम विरह गीत है।
मेरी लेखन शैली विविध रही है मैं सामाजिक लेख,व्यंग्य,कविता लघु कथाएँ लिखती हूँ,गीत मैने कम ही लिखें है परंतु जो भी लिखें हैं उनसे मन बहुत गहराई से जुड़ जाता है । तुम न लौटे कभी एक ऐसा ही गीत है जो मन की गहराइयों तक महसूस किया जा सकता है इसलिए मुझे ज्यादा पसंद है।
प्रश्न ९. – विभिन्न समाचार-पत्रों और साहित्यिक मंचों पर निरंतर लेखन तथा प्राप्त सम्मानों को आप अपनी साहित्यिक यात्रा में किस दृष्टि से देखती हैं?
कल्याणी जी :– विभिन्न समाचार पत्रों और साहित्यिक मंचों पर सक्रियता निश्चित ही स्वयं की सृजनशीलता की निरंतरता बनाए रखने का उद्यम है।लेखन और पठन की निरंतरता आपको भीतर से जागृत और सचेत बनाए रखने का कार्य करती है,जहां तक मिले सम्मानों की बात है उन सभी पटल और मंचों के प्रति कृतज्ञ हूं जिन्होंने मुझे इस योग्य समझा,परंतु मेरे विचार से लेखन का उद्देश्य केवल सृजन,चिंतन और मानसिक विकास होना चाहिए ,मैं भी इसी सिद्धांत के पालन के प्रयास हेतु कटिबद्ध हूँ।
प्रश्न १०. – अज्ञेय, कमलेश्वर, नीरज, निराला और दुष्यंत कुमार जैसे साहित्यकारों की रचनाओं से आपने क्या ग्रहण किया?
कल्याणी जी :– इन सभी रचनाकारों की रचनाएं मेरे जीवन में विविध ढंग से चेतना जागृत करने और प्रेरित करने वाली रही। कुछ कृतियाँ जीवन भर मस्तिष्क में अंकित रहते हुए अपना प्रभाव छोड़ती रहती है इसे शब्दों में बताना लगभग असंभव है,बस इतना कि मैंने साहित्य हमेशा स्वयं को बेहतर संवेदनशील इंसान बनने में सहायक होत है।
प्रश्न ११. – वैष्णो देवी और वृंदावन जैसे आध्यात्मिक स्थलों का आपकी लेखनी और जीवन-दृष्टि पर क्या प्रभाव पड़ा है?
कल्याणी जी :– ईश्वर की परमशक्ति आपको स्वयं का बोध करवाते हुए आत्मशक्ति को पहचानना सिखाती है।
मेरी दृष्टि में आपके इष्ट देव या उनके धार्मिक स्थल केवल पूजन के लिए नहीं बल्कि आपको उस परम चेतना को शुद्ध रूप में महसूस करते हुए जीवन का उद्देश्य समझने और सही मार्ग दिखाने का कार्य भी करते हैं।
प्रश्न १२. – आपकी पुत्री राष्ट्रीय स्तर की राइफल शूटर हैं। एक माँ के रूप में उनकी उपलब्धियों को देखकर आपके मन में कौन-सी अनुभूतियाँ जन्म लेती हैं?
कल्याणी जी :– हर माँ अपनी बेटी में अपना जीवन बढ़ते और पल्लवित होते हुए देखती हैं।निःसंदेह बेटी की उपलब्धियाँ गौरान्वित करने वाली रही है,साथ ही मन में ये संतोष भी है कि वो वैचारिक रूप से भी उतनी ही समृद्ध और लक्ष्य उन्मुख है जीवन में अपना लक्ष्य निर्धारत कर कठोर श्रम करते हुए उस लक्ष्य की प्राप्ति हेतु प्रयासरत है।
प्रश्न १३. – आज के बदलते समय में हिंदी साहित्य के समक्ष आप कौन-सी चुनौतियाँ और संभावनाएँ देखती हैं?
कल्याणी जी :– वर्तमान समय संक्रमण काल है,लेखन पठन वाली पीढ़ी और मोबाइल की दुनियाँ में रमने वाली पीढ़ी का,बेशक हिंदी साहित्य में उतना रुझान आज की नई पीढ़ी कम ही दिखा रही है,साथ ही सोशल मीडिया,फेक कंटेंट और कॉपी पेस्ट वास्तविक लेखक और कवियों का मनोबल कम करते हैं,बावजूद इसके
भविष्य की अनंत संभावनाएं भी दिख रही है जिसमें नई पीढ़ी के अच्छे रचनाकार सामने आ रहे हैं साहित्य सोशल मीडिया के माध्यम से लोकप्रिय भी हो रहा है।
इसलिए कहूँगी कि हिंदी साहित्य के सामने चुनौतियाँ अवश्य है लेकिन संभावनाएं अपार है।
प्रश्न १४. – यदि आपके सम्पूर्ण जीवन को किसी एक गीत, कविता या पंक्ति में व्यक्त करना हो, तो वह क्या होगी और क्यों?
कल्याणी जी :– मेरा एक पसंदीदा शेर है जो पिताजी से अक्सर सुनती रहती थी ,मुझे लगता है जीवन इसी तरह किसी ध्येय को पूर्ण समर्पित करने पर मनचाही सफलता और लक्ष्य प्राप्त हो सकता है,ये पंक्तियाँ मुझे हमेशा प्रेरणा देती है
अल्लामा इकबाल का शेर है –
मिटा दे अपनी हस्ती गर कुछ मर्तबा चाहे,
कि दाना ख़ाक में मिलकर गुल-ओ-गुलज़ार होता है।
प्रश्न १५. – अंत में, नवोदित रचनाकारों एवं हमारे श्रोताओं के लिए आप क्या संदेश देना चाहेंगी?
कल्याणी जी :– आप सभी से यही कहना चाहती हूँ,जीवन में आप जब जो चाहें कर सकते हैं।
हम कितनी बार सोचते हैं परिस्थितियां अनुकूल नहीं है,कभी समस्याएँ इतनी है, कि वह कार्य करना असंभव लगने लगता है।
परंतु हर असंभव लक्ष्य भी संभव बनाया जा सकता बशर्ते आप स्वयं को मानसिक रूप से इसके लिए तैयार कर लें और पूर्ण रूप से समर्पित हो जाएं ।इसलिए जीवन में बाद में अफसोस करने की बजाए हम जिस समय जितना प्रयास कर सकते हैं बिना परिणाम की चिंता करते हुए,केवल उसी पर ध्यान दें।
हमें अपने प्रयासों के अनुरूप सफलता मिलती ही है भले ही देर से मिले। इसलिए स्वयं पर विश्वास करते हुए आगे बढ़ें।
✍🏻 वार्ता : श्रीमती कल्याणी गुप्ता “कृति”
कल्प भेंटवार्ता में व्यक्तित्व परिचय के अंतर्गत आपका परिचय प्रबुद्ध साहित्यकार से कराने का विशेष प्रयास करते हुए आज हम बात कर रहे हैं साहित्य जगत के अभिनव साधिका कवयित्री श्रीमती कल्याणी गुप्ता “कृति” जी से। इन्हें विस्तार से सुनने व देखने के लिए हमारे यूट्यूब चैनल पर जाएं 👇
https://www.youtube.com/live/mKZlfFnRN8Q?si=fbyZm30H2ZeERUYD
इनसे बातें करना व मिलना आपको कैसा लगा? आप हमें कमेन्ट में बता सकते हैं। आपकी विशिष्ट प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी।
मिलते हैं अगले सप्ताह एक और प्रबुद्ध साहित्यकार के साथ। तब तक के लिए हमें आज्ञा दीजिये।
राधे राधे 🙏 🪷 🙏
✍🏻 लिखते रहिये 📖 पढ़ते रहिये और 🚶 बढ़ते रहिये ✴️
✍🏻 प्रश्नकर्ता : कल्प भेंटवार्ता प्रबंधन
🦚 आयोजक : कल्पकथा प्रमुख श्री राधा गोपीनाथ जी
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