खड्डस बॉस
(अस्वीकरण – यह लघुकथा पूर्णतः काल्पनिक है। किसी भी व्यक्ति, संस्था या घटना से इसका कोई संबंध नहीं है।)
मातृत्व अवकाश के छह महीने पूरे हो चुके थे। सुबह की हल्की धूप में नैना अपने छह महीने के बेटे आरव को गोद में सँभालते हुए काँच की इमारत के सामने खड़ी थी। उसने बच्चे के माथे को चूमा और बैग का पट्टा कंधे पर ठीक करते हुए मन ही मन कहा, “आज से फिर वही ऑफिस… और वही खड़ूस बॉस।”
सहकर्मियों की बातें कानों में गूँज रही थीं
“मिश्रा सर से सहानुभूति की उम्मीद मत करना… छुट्टी माँगो तो दस सवाल… उनके लिए कर्मचारी सिर्फ कर्मचारी इंसान नहीं।”
नैना ने गहरी साँस ली, बच्चे को पति के हवाले किया और रिसेप्शन पार कर ऑफिस पहुंच गई।
रास्ते में रोहित ने फाइलें सँभालते हुए पूछा “मैडम, आज ज्वाइन कर रही हैं?”
“हाँ,” नैना ने मुस्कुराकर कहा, “अब बेटे को घर छोड़कर ऑफिस की दुनिया में वापस आना ही पड़ेगा।”
रोहित ने आवाज धीमी की “बस मिश्रा सर से संभलकर… छह महीने बाद लौटने वालों को वे बिल्कुल नहीं बख्शते।”
नैना की उँगलियाँ आईडी कार्ड पर कस गईं। बिना कुछ कहे वह आगे बढ़ गई। केबिन के बाहर उसने एक लंबी साँस ली, बाल सँवारे और दस्तक दी।
भीतर से गंभीर आवाज आई “कम इन।”
नैना ने दरवाजा खोला। मिश्रा सर अपनी मेज पर रखी रिपोर्ट से नजर उठाकर उसकी ओर देखने लगे।
नैना ने अपनी आवाज को भरसक संयत रखते हुए कहा “सर, मैं आज से ज्वाइन कर रही हूँ।”
मिश्रा सर ने सिर हिलाया और बस इतना पूछा “बच्चा ठीक है?”
“हाँ सर ठीक है।” नैना की आवाज में तरलता समा गई।
“नाम क्या रखा है?” मिश्रा सर ने नैना के चेहरे पर सरसरी नजर डालते हुए पूछा।
“सर र” नैना को इस प्रश्न की बिल्कुल उम्मीद नहीं थी। “आरव, सर आरव नाम रखा है।” और जल्दी से छह महीने के शिशु की तस्वीर उसने टेबल पर रख दी।
“ह्म्म्म” मिश्रा सर ने एक नजर तस्वीर पर डाली।
मिश्रा सर ने इंटरकॉम उठाया “रोहित, पूजा और अमित को मेरे केबिन में भेजो।”
तीनों सामने आए तो मिश्रा ने फाइलें खोलते हुए कहा
“नैना मैडम, छह महीने की मैटरनिटी लीव के बाद आज ऑफिस ज्वॉइन कर रही है।” उनकी आँखें मानों चारों को स्कैन कर रही थी। “मैं इनको इनके वर्तमान पद से मुक्त कर रहा हूं, आज से नैना का काम आप तीनों को डिस्ट्रिब्यूट किया जा रहा है, आप तीनों को न्यू वर्क असाइनमेंट का मेल भेज दिया है अब आप उसके हिसाब से काम करेंगे।”
रोहित ने आश्चर्य से पूछा “सर, तो नैना मैडम को कोई काम नहीं देना?”
मिश्रा ने चश्मा उतारकर मेज पर रखा और सख्ती से कहा “मैंने जो कहा, वही करो। बाकी मैं देख लूँगा।”
तीनों ने एक-दूसरे को देखा, लेकिन कुछ पूछने की हिम्मत नहीं हुई। नैना की आँखों के आगे लगभग अंधेरा छा गया, घर के खर्चे, बच्चे की दवाइयां, पति की भाग दौड़, सब एक – एक करके सामने आने लगे, तब तक तीनों सहकर्मी वापस निकल गए और दरवाजा बंद हो गया।
मिश्रा सर ने कंप्यूटर पर कुछ टाइप किया, नैना की मोबाइल स्क्रीन पर एक मेल आया मिश्रा सर एकदम निर्विकार बने रहे।
मेल का सब्जेक्ट था “टीम लीडर नैना कश्यप, वर्क फ्रॉम होम – ३ वर्ष (अप्रूव्ड)”
नैना की साँसें थम गईं। उसने स्क्रीन को घूरा, फिर मिश्रा को देखा “सर… ये…”
मिश्रा सर सपाट स्वर में कहा
“तीन साल का वर्क फ्रॉम होम। टीम को लीड करते हुए आप घर से काम करेंगी। छह महीने के बच्चे को छोड़कर आपसे ऑफिस आने की उम्मीद करना कंपनी का नियम नहीं है।”
नैना की आँखें नम हो गईं।
मिश्रा ने फिर वही ठंडी, सख्त आवाज़ में कहा
“और हाँ, हर वीकेंड प्रिंस आरव को ऑफिस फैमिली से मिलाने लाना है ध्यान रहे, काम में लापरवाही बिल्कुल नहीं चलेगी। वर्क फ्रॉम होम का मतलब वर्क फ्रॉम होम है, हॉलिडे फ्रॉम होम नहीं।” उनकी आवाज अचानक से मधुर लगने लगी।
नैना ने आँसू पोंछते हुए मुस्कुराई “थैंक यू, सर।”
मिश्रा सर ने फाइल खोलते हुए कहा “थैंक यू बाद में… पहले आज की रिपोर्ट शाम पाँच बजे तक भेजिए।”
नैना दरवाजे से बाहर निकली तो उसके कदम हल्के थे।
पीछे मुड़कर उसने मिश्रा को देखा वही कठोर चेहरा, वही सख्त आवाज, वही अनुशासन।
लेकिन अब उस चेहरे के पीछे छिपा इंसान उसे दिखाई दे रहा था।
उसने मन ही मन कहा
“हर खड़ूस बॉस, खड़ूस नहीं होता… कुछ लोग अपनी संवेदनाएँ मुस्कान से नहीं, जिम्मेदारी से व्यक्त करते हैं।”
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