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खाली घोंसला

अस्वीकरण
(यह कहानी पूर्णतः काल्पनिक है। इसमें वर्णित पात्र, संस्थाएँ, स्थान, घटनाएँ और परिस्थितियाँ किसी वास्तविक व्यक्ति, संस्था अथवा घटना से संबंधित नहीं हैं। यदि कहीं किसी क्रम में किसी से यह जुड़ता है तो  उसे केवल संयोग माना जाए। लेखक भारतीय संविधान के अनुसार सभी नियमों का पालन करने के लिए प्रतिबद्ध है।)

“दादू, मैं जा रहा हूँ।” आँखों में नई दुनिया का सपना और कंधे पर छोटा-सा बैग टांगे राहुल ने दरवाजे पर खड़े होकर कहा।

“जा रहा है?” चश्मा उतारते हुए दादू ने पूछा।

“हाँ।” बैग संभालते हुए राहुल ने कहा। “नौकरी मिल गई। बेंगलुरु में।”

“अच्छा है।” कॉपी बंद करते हुए दादू ने कहा। “बहुत अच्छा, सदा उन्नति करो।”

“दादू, आप उदास हैं?” मुस्कुराते हुए राहुल ने पूछा।

“नहीं रे?” चश्मा मेज पर रखते हुए दादू ने कहा। “तू जा रहा है, आगे मेहनत से, समर्पण से, नए आयाम स्थापित करना, खूब तरक्की करना।”

“बेटा।” फिर उसके कंधे पर हाथ रखकर मुस्कुराए। “मेरे पंख,  मैं तो यही चाहता हूँ कि तू उड़, सबसे अच्छा काम कर।”

राहुल ने दादू के पैर छुए और बाहर चला गया। उनकी आँखों के सामने राहुल गाड़ी में बैठा, एक बार फिर उनको देखकर मुस्कुराया, और गाड़ी चली गई।

दादू अंदर आकर कुर्सी पर बैठे और उन्होंने कानों पर हाथ लगाकर सुनने का उपक्रम किया शायद किसी आहट को सुनने की कोशिश कर रहे थे।

“अभी नहीं आई।” मुस्कुराकर दादू ने खुद से कहा। “पर आहट आएगी। ज़रूर आएगी।”

यह घर है ”खाली घोंसला” नाम का एक अनाथ आश्रम, चालीस साल पहले दादू ने इसे बनाया था। उस दिन के बाद यह घोंसला कभी खाली नहीं हुआ, कभी भरा भी नहीं क्योंकि हर बार कोई पँख बनकर खाली घोंसले में आता और कोई अपनी जीवन यात्रा में आगे बढ़ जाता।

यहाँ किसी से कोई प्रश्न नहीं पूछा जाता, न नाम न धर्म न जाति न कारण, बस एक ही सवाल “भूख लगी है?” अगर आने वाला राजी होता तो खाना खाकर चला जाता। दादू हर आने जाने वाले को पँख कहते हैं, ऐसे पँख जो अपनों से बिछड़ गए हैं, ऐसे पँख जो फिर किसी को अपनाएंगे।

“दादू, चाय।” कप आगे बढ़ाती हुई नन्हीं गुड़िया दौड़कर आई।

“ला।” कप लेते हुए दादू ने कहा।

“दादू, ये चाय में चीनी कम है।” कप में झाँकते हुए गुड़िया ने कहा।

“तो क्या करूँ?” हँसते हुए दादू ने पूछा।

“मैं डाल दूँ?” चम्मच उठाते हुए गुड़िया ने पूछा।

“डाल दे।” कप आगे बढ़ाते हुए दादू ने कहा। “पर एक चम्मच से ज्यादा नहीं।”

गुड़िया ने एक चम्मच शक्कर डाली फिर कुछ सोचकर दो और डाल दीं।

“अरे!” हँसते हुए दादू ने कहा। “इतनी चीनी?”

“मीठी चाय अच्छी लगती है।” मुस्कुराते हुए गुड़िया ने कहा और दौड़कर खेलने चली गई।

“यही तो है छोटी-छोटी बातें जो बड़ी यादें बन जाती हैं।” दादू चाय पीते हुए मुस्कुराये।

“खुश रहो मेरे बच्चों।” दादू चाय पीकर अंदर कमरे में आए। “हमेशा खुश रहो।” और दीवार की ओर देखने लगे जहां पर सौ से अधिक तस्वीरें लगीं थी, किसी की शादी, किसी की नौकरी, किसी का जन्म दिन, किसी का मेडल, किसी को अवार्ड, हर तस्वीर में दादू साथ में खड़े मुस्कुरा रहे थे क्योंकि यह सब उनके पंख है जो आए और फिर से उड़ गए।

“दादू, खाना।” आवाज़ लगाती हुई सोलह वर्षीया बालिका सरिता दरवाजे पर आई।

“आ रहा हूँ।” तस्वीरें देखते हुए दादू की आँखें भर आईं साथमुस्कुराए। “देखो, कितने पंख उड़ गए, कितने ऊँचे गए।”

वह बाहर आए, जहां खाने के लिए टेबल पर आठ बच्चे बैठे थे, आठ बच्चे, आठ कहानियाँ, दादू के आठ पँख।

“दादू, राहुल भाई चले गए?” थाली में रोटी तोड़ते हुए छोटू ने पूछा।

“हाँ।” थाली उठाते हुए दादू ने कहा।

“अब कौन आएगा?” रोटी मुँह में डालते हुए छोटू ने पूछा।

“कोई न कोई आएगा।” कहते हुए दादू ने उसकी थाली में सब्जी परोसी। “घोंसला खाली है, तो किसी को तो आना ही है।”

“और कौन जाएगा?” सरिता ने पूछा।

“कोई न कोई जाएगा।” मुस्कुराकर दादू ने कहा। “और जब जाएगा, तो मुझे गर्व होगा।”

“गर्व?” भौंहें सिकोड़कर सरिता ने पूछा।

“हाँ।” रोटी तोड़ते हुए दादू ने कहा। “क्योंकि जो उड़ता है, वह मेरा पंख है।” फिर उसकी ओर देखकर मुस्कुराए। “और मेरा पंख ऊँचा उड़े, यही तो मेरी जीत है।”

“दादू, आपको बुरा नहीं लगता?” धीमे से सरिता ने पूछा।

“लगता है।” रोटी खाते हुए दादू ने कहा। “पर उससे क्या?” फिर रोटी का निवाला तोड़ते हुए आगे बोले। “यही तो इस घोंसले का काम है।”

“काम?” छोटू ने पूछा।

“हाँ।” उसकी ओर देखते हुए दादू ने कहा। “यह घर बच्चों को रोकने के लिए नहीं है।” फिर आँगन में ऊपर दिखाई दे रहे आसमान की ओर इशारा करते हुए बोले। “यह घर उन्हें उड़ाने के लिए है।”

“उड़ाने के लिए?” भौंहें सिकोड़कर सरिता ने फिर पूछा।

“हाँ।” निवाला चबाते दादू ने कहा। “जिसे हम रोक लें, वह बड़ा कैसे होगा?” फिर उसकी ओर देखकर धीमे से बोले। “जिसे हम बाँध लें, वह उड़ेगा कैसे?”

“तो हम सब जाएँगे?” आँखें भर आईं छोटू की।

“हाँ शायद, एक दिन।” उसका हाथ पकड़ते हुए दादू ने कहा। “पर तब तक… यहाँ रहो, खाओ, पढ़ो, हँसो।” फिर उसके सिर पर हाथ रखकर मुस्कुराए। “और जब जाना, तो खुशी से जाना क्योंकि जो जाता है, वह मेरा पंख बनकर जाता है।”

रात को आँगन में चारपाई पर बैठे दादू आकाश में तारे देख रहे थे।

“दादू, सो नहीं रहे?” चादर लेकर आई सरिता ने पास बैठते हुए पूछा।

“नींद नहीं आ रही।” चादर लेते हुए दादू ने कहा।

“राहुल भाई की याद आ रही है?” पूछते हुए सरिता ने उनकी ओर देखा।

“हर बार आती है।” आकाश की ओर देखते हुए दादू ने कहा। “जब कोई जाता है, तो लगता है…” फिर चादर ठीक करते हुए धीमे से बोले। “…घोंसला खाली हो गया।”

“तो दादू उदास हो जाते हैं?” सरिता को समझ नहीं आया उसने क्यों पूछा।

“उदास?” मुस्कुराकर दादू ने कहा। “नहीं।”

“मैं तो कान लगाता हूँ।” फिर उसकी ओर देखकर आँखें चमकाते हुए बोले।

“कान?” सरिता ने पूछा।

“हाँ।” चादर ठीक करते हुए दादू ने कहा। “खाली घोंसले में आहट होती है किसी नए पंख की यानि किसी नए बच्चे की।” फिर आकाश की ओर देखकर मुस्कुराए। “जो अभी रास्ते में है।”

“कैसे पता चलता है?” सरिता ने पूछा।

“पता चलता है।” आकाश की ओर देखते हुए दादू ने कहा। “जब घोंसला खाली होता है, तो हवा भी कुछ कहती है। पत्ते भी कुछ कहते हैं।”

“सच में दादू?” सरिता के लिए यह आश्चर्यजनक था।

“और मुझे लगता है कोई आ रहा है। कोई ज़रूर आ रहा है।” फिर उसकी ओर देखकर धीमे से बोले।

“और अगर न आए?” सरिता ने पूछा।

“आएगा।” उसकी ओर देखते हुए दादू ने कहा। “यह घोंसला ऐसे ही भरता है। चालीस साल से भर रहा है।” फिर चादर ओढ़ते हुए मुस्कुराए। “एक खाली होता है, दूसरा भर जाता है।”

“तो दादू कभी अकेले नहीं होंगे?” सरिता ने पूछा।

“अकेले?” हँसते हुए दादू ने कहा। “मैं तो हमेशा भीड़ में हूँ।” फिर आकाश की ओर देखकर धीमे से बोले। “कभी बच्चों की भीड़ में, कभी उनकी यादों की भीड़ में। और जब दोनों न हों, तो उनकी आहट की भीड़ में।”

“दादू, आप कभी रोते नहीं?” धीमे से सरिता ने पूछा।

“रोता हूँ।” चादर ओढ़ते हुए दादू ने कहा। “पर तब, जब कोई नहीं उड़ता है या बहुत ज्यादा ऊँचा उड़ता है।” फिर आँखें पोंछते हुए मुस्कुराए। “तब आँखें भर आती हैं। पर वे आँसू… आँसू नहीं होते।”

“तो क्या होते हैं?” सरिता दादू के पास बैठ गई।

“वे…” आकाश की ओर देखते हुए दादू ने धीमे से कहा। “…कुछ पल होते हैं। जो आँखों से बह जाते हैं।”

अगली सुबह दरवाजे पर दस्तक हुई, दरवाजा खोलते हुए दादू ने देखा हाथ में तीन साल का बच्चा और आँखों में डर लिए एक औरत खड़ी थी।

“यह…” बच्चे को आगे करते हुए औरत ने धीमे से कहा। “…इसे रख लेंगे?”

बच्चे की ओर देखते हुए दादू मुस्कुराए।

“अंदर आओ।” दरवाजा खोलते हुए उन्होंने कहा। “चाय पिएँगी?”

“आप पूछ नहीं रहे कि यह कौन है? कहाँ से आया?” आश्चर्य से औरत ने पूछा।

“यहाँ कोई प्रश्न नहीं पूछा जाता।” बच्चे का सिर सहलाते हुए दादू ने कहा। “बस एक सवाल पूछा जाता है—भूख लगी है?”

बच्चा औरत के साथ अंदर आया, उसको आँगन में खड़ा किया, बच्चा चारों ओर घूमकर देखने लगा, औरत की आँखें भर आईं।

“दादू, यह कौन?” दौड़कर आई गुड़िया ने पूछा।

“यह…” बच्चे का सिर सहलाते हुए दादू ने कहा। “…नया पंख है।”

गुड़िया ने बच्चे का हाथ पकड़ा। “चल, तुझे खिलौने दिखाती हूँ।”

दोनों दौड़कर अंदर चले गए।

आँगन में खड़े दादू ने बच्चों की हँसी सुनी फिर आकाश की ओर देखा।

“देखा?” धीमे से उन्होंने कहा। “मैंने कहा था न। आहट आई थी। कोई आया था।”

घोंसला फिर भर गया था।

और दादू जानते थे एक दिन यह भी खाली होगा क्योंकि खाली घोंसला होता ही फिर से भरने के लिए है।

पवनेश

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