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!! “कल्प भेंटवार्ता : व्यक्तित्व परिचय : श्रीमती शिमला शर्मा “लक्ष्मीप्रिया” !!

!! “कल्प भेंटवार्ता : व्यक्तित्व परिचय : श्रीमती शिमला शर्मा “लक्ष्मीप्रिया” !! 

 

 

 तिथि – १६/७/२०२६

 

सम्पर्क सूत्र -7999237845

 

!! “मेरा परिचय” !!

 

नाम :- शिमला शर्मा लक्ष्मी प्रिया 

 

माता/पिता का नाम :-

माता – स्व.श्रीमती लक्ष्मी देवी शर्मा 

पिता – स्व. श्री अमरचंद्र शर्मा 

 

जन्म स्थान एवं जन्म तिथि :- कौलारस जिला शिवपुरी (मध्य प्रदेश)

 

पति/पत्नी का नाम :- 

पति – श्री कमलेश कुमार शर्मा (रिट. बैंक मेनेजर)

 

बच्चों के नाम :-

प्रथम पुत्र – स्व.अभिनव शर्मा 

द्वितीय पुत्र – प्रशान्त शर्मा 

 

शिक्षा :- स्नातक

 

व्यावसाय :- गृहणी 

 

वर्तमान निवास :- बी एच 140 दीनदयाल नगर (ग्वालियर मध्यप्रदेश)

 

आपकी मेल आई डी :- shimlasharma0105@gmail.com

 

आपकी कृतियाँ :- साझा संकलन 25 स्वयं की तीन 

 

आपकी विशिष्ट कृतियाँ :- 

 1 *( यादों से गुफ़्तगू ग़जल संग्रह)*

 2 *(अभिनव काव्यांश काव्य संग्रह)*  

3 *( अभिनव काव्य कुंज काव्य संग्रह)*

संपादक – अभिनव काव्यांजलि साझा संकलन

 

आपकी प्रकाशित कृतियाँ :- तीन कृतियॉं प्रकाशित हैं तीन प्रकाशित होने वाली हैं

 

पुरूस्कार एवं विशिष्ट स्थान :- करीब 150 स्मृति चिन्ह और सम्मान पत्र प्राप्त हुए कुछ नाम प्रेषित है।

( राष्ट्र गौरव अटल सम्मान, अटल कवि सम्मान , मॉं अहिल्या देवी ,मात्र शक्ति , काव्यांजलि , महादेवी वर्मा स्मृति, विवेकानंद स्मृति, साहित्य सारथी , हिंदी सागर, साहित्य शक्ति, महिला रत्न, अक्षर-दीप , उत्कृष्ट रचनाकार, सर्वश्रेष्ठ सृजनकार, कलम की खनक रत्न, साहित्य शिरोमणि, काव्य बसंत, काव्य जगदीश ,शब्द -दीप , भाषा भूषण , शब्द शिल्पी , मानस मणि , श्रेष्ठ चित्र मणि, काव्य कोहिनूर, जिज्ञासा उत्कृष्ट मंच प्रभारी,जिज्ञासा रत्न सम्मान आदि…..

स्थान – अयोध्या धाम 

 

 

 

!! “मेरी पसंद” !!

 

उत्सव :- दीपावली 

 

भोजन :- सादा पसंद है 

 

रंग :- लाल, गुलाबी, आसमानी 

 

परिधान :- साड़ी व सलवार सूट 

 

स्थान एवं तीर्थ स्थान :- चारोधाम यात्रा दो बार और विदेश यात्रा

 

लेखक/लेखिका :- मुंशी प्रेमचंद, महादेवी वर्मा, 

 

कवि/कवयित्री :- श्री अटल बिहारी वाजपेयी , सुभद्रा कुमारी चौहान 

 

उपन्यास/कहानी/पुस्तक :- उपन्यास/कहानी धार्मिक पुस्तक।

 

कविता/गीत/काव्य खंड :- सभी 

 

खेल :- एथलेटिक्स खेल स्कूल समय में मैंने भी प्रतिस्पर्धा में भाग लिया है 

 

फिल्में/धारावाहिक (यदि देखते हैं तो) :- फिल्में धार्मिक और सामाजिक 

 

आपकी लिखी हुई आपकी सबसे प्रिय कृति :- सभी हैं

 

 

 

!! कल्प भेंटवार्ता के प्रश्न : श्रीमती शिमला शर्मा “लक्ष्मीप्रिया” जी के उत्तर !! 

 

 

 

प्रश्न १ – शिवपुरी की पावन धरती से आरम्भ हुई आपकी जीवन-यात्रा साहित्य की ओर किस प्रकार अग्रसर हुई? वह कौन-सा प्रथम क्षण था जिसने आपकी लेखनी को जन्म दिया?

 

शिमला जी :- मैं बचपन से ही प्रखर बुद्धि की रही हूॅं। जीवन में कुछ प्राप्त करते रहना मेरी रुचि है। मेरा पालन -पोषण भक्तिमय वातावरण में हुआ मॉं पिताजी राधा कृष्ण के अनन्य भक्त थे। घर में भजन कीर्तन अखण्ड रामायण आदि आए दिन धार्मिक आयोजन होते थे। मॉं के साथ मुझे भी गाना बजाना अच्छा लगता था। थोड़ी बड़ी हुई तो संगीतमय रामायण भी पढ़ने लगी। इसी बीच मेरे अन्दर सृजन के भाव जाग्रत हुए और मैंने भजन लिखना प्रारम्भ किया। किन्तु जल्दी शादी होने से पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण सृजन में थोड़ा विध्न आ गया। परन्तु रचनाकार की कलम कहाॅं रुकती है। अवसर मिलते ही फिर मुखर हुई। अनेक विधाओं में रचनाएं लिखना प्रारम्भ किया। कई पुस्तकें प्रकाशित हुई। कलम आज भी चल रही है और जीवन पर्यन्त निरंतर चलती रहेगी। 

 

 

 

प्रश्न २ – एक गृहिणी, माँ और साहित्य-साधिका के रूप में आपने जीवन के विविध दायित्वों का निर्वहन किया है। इन सबके मध्य साहित्य-साधना का संतुलन आपने किस प्रकार बनाए रखा?

 

शिमला जी :- ससुराल में मैं सबसे बड़ी थी परिवार भी बड़ा था। और काम भी बहुत था। मेरा जीवन सदैव संघर्ष युक्त रहा इसलिए मेरे सृजन की चाल बहुत धीमी जरूर हो गई पर मैंने सृजन करना बंद नहीं किया। समय निकाल कर सृजन करने की कोशिश करती रहती थी। अपनी दैनिक दिनचर्या में बच्चों की परवरिश और पारिवारिक रिश्तों से मिलने वाले जीवन्त अनुभवों को अपनी कहानी और कविता का विषय बनाती क्योंकि जीवन में प्रतिदिन कुछ नया अनुभव अवश्य प्राप्त होता है बस उन्ही भावों का मन में मंथन कर शब्दों में पिरोती और समय मिलते ही डायरी में लिख लेती थी। जिससे एक रचना का जन्म होता इस प्रकार दायित्वों का निर्वहन करते हुए साहित्य- साधना करती रही।

 

 

 

प्रश्न ३ – आपकी साहित्यिक यात्रा में जीवन के अनुभवों, संघर्षों और संवेदनाओं ने आपकी लेखनी को किस प्रकार समृद्ध किया?

 

शिमला जी :- साहित्यिक यात्रा- मेरा जीवन सदैव मुश्किलों से जूझता रहा है मेरे जीवन में घटित घटनाओं से ही मेरी रचनाओं को यथार्थ और प्रामाणिक आधार मिला, संघर्ष और कठिनाइयों से मन में शब्दों को आकार देने की गहरी क्षमता और दृष्टिकोण विकसित हुआ। 

परन्तु 2021 मेरे जीवन में असहनीय वेदना लेकर आया और मेरा मन अवसाद से ग्रस्त हो गया। मेरा सृजन लगभग बंद हो चुका था। मेरी हिम्मत टूट चुकी थी। फिर हितैषियों व पति के सहयोग और प्रेरणा से धीरे-धीरे फिर साहित्य की ओर अग्रसर हुई। किंतु मेरी कलम सिर्फ वेदना से युक्त चल रही थी। इसी बीच मन में साहित्य सेवा का विचार आया और नव कलमकारों के प्रशिक्षण हेतु मैंने वॉट्सप और फेसबुक (अभिनव काव्यांश मंच) संस्था बनाई जिसमें प्रबुद्ध साहित्यकारों द्वारा निशुल्क नव कलमकारों को प्रशिक्षण दिया जाता है। इस प्रकार वेदना को संगठित शक्ति में बदलकर सार्थक उद्देश्य की नीव रखी। इन्हीं संवेदनाओं ने मानवीय भावनाओं के प्रति सहानुभूति प्रेम अपनापन से शब्दों में प्राण भरकर लेखनी को समृद्ध बनाया।

 

 

 

प्रश्न ४ – आपकी साहित्यिक साधना में गीत, ग़ज़ल और कविता—तीनों विधाओं का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। इन विभिन्न काव्य-विधाओं में सृजन करते समय आपकी अनुभूति और अभिव्यक्ति किस प्रकार परिवर्तित होती है?

 

शिमला जी :- गीत, ग़ज़ल और कविता—तीनों अलग-अलग माध्यम हैं। इनको सृजन करते वक्त विधान अनुसार अनुभूति और अभिव्यक्ति परिवर्तित हो जाती है।

 

 

 

प्रश्न ५ – आपकी लेखनी में स्मृतियाँ केवल अतीत का दस्तावेज़ नहीं बनतीं, बल्कि जीवन-दर्शन का स्वर भी बन जाती हैं। कोई भाव आपके अंतर्मन में किस प्रकार अंकुरित होकर कविता अथवा ग़ज़ल का रूप ग्रहण करता है?

 

शिमला जी :- अंतर्मन में भाव अंकुरित होना – अमूर्त भावनाएं शब्दों के माध्यम से दृश्य (बिंब) में ढलने लगती हैं। कवि विचारों को स्पष्ट करने के लिए प्रकृति या रोजमर्रा की जिंदगी से प्रतीक चुनता है। जब कोई दृश्य, वियोग, प्रेम, पीड़ा या जीवन का गहरा यथार्थ हृदय को छूता है। तो उसका प्रभाव अवचेतन मन में उतरकर एक बेचैनी या उमंग पैदा करता है,जो अंततः एक मूल भाव का रूप लेकर शब्दों में ढलता है जो कविता अथवा ग़ज़ल का रूप ग्रहण करता है।

 

 

 

प्रश्न ६ – आपने अनेक साझा संकलनों का संपादन भी किया है। एक संपादक और एक रचनाकार के रूप में आप इन दोनों भूमिकाओं में क्या मूलभूत अंतर अनुभव करती हैं?

 

शिमला जी :- एक रचनाकार (लेखक) शून्य से विचारों को जन्म देता है। रचनाकार की प्रक्रिया भावनात्मक और कल्पनाशील होती है। वह अपने विचारों को शब्दों में ढालकर कविता रचता है। वहीं संपादक की प्रक्रिया विश्लेषणात्मक और उद्देश्यपूर्ण होती है। एक संपादक उन विचारों को तराश कर सही दिशा, स्पष्टता और पूर्णता प्रदान करता है।  

 

 

 

प्रश्न ७ – लगभग डेढ़ सौ से अधिक सम्मान एवं अलंकरण प्राप्त करने के उपरांत भी आपकी साहित्य-साधना निरंतर गतिमान है। आपकी दृष्टि में सम्मान का वास्तविक महत्व क्या है?

 

शिमला जी :- सम्मान व्यक्ति के प्रयासों की प्रामाणिक स्वीकृति और उसकी कार्यक्षमता को बढ़ाने का एक सशक्त माध्यम है। सम्मान का वास्तविक महत्व व्यक्ति के मनोबल को बढ़ाना उसे प्रेरणा प्रदान करना और उसकी कड़ी मेहनत को सार्वजनिक मान्यता में समाहित करना है। जिससे आत्मविश्वास में वृद्धि होती है। और वह उत्साह के साथ निरंतर गतिमान रहता है।

 

 

 

प्रश्न ८ – आपकी रचनाओं में संवेदना, स्मृति और जीवन-दर्शन का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। आपके लिए साहित्य आत्माभिव्यक्ति है, आत्मसाधना है अथवा समाज के प्रति उत्तरदायित्व?

 

शिमला जी :- साहित्य में मेरे लिए इन तीनों का एक संपूर्ण और संतुलित महत्व है। मूलतः आत्माभिव्यक्ति का माध्यम ही स्वयं को समझने की आत्मसाधना होता है। और वही समाज के प्रति एक सशक्त उत्तरदायित्व के रूप में फलीभूत होता है।

 

 

 

प्रश्न ९ – मुंशी प्रेमचंद, महादेवी वर्मा, अटल बिहारी वाजपेयी एवं सुभद्रा कुमारी चौहान जैसे महान साहित्यकारों से आपने कौन-से साहित्यिक संस्कार और जीवन-मूल्य आत्मसात किए?

 

शिमला जी :- महान साहित्यकारों से मानवीय संवेदनाओं और श्रेष्ठ आचरण को अपने दैनिक जीवन में ग्रहण कर करुणा, सत्य, और नैतिकता समाज और संस्कृति का बोध हुआ तथा संस्कार, संस्कृति और नैतिक मूल्य को जीवन में आत्मसात किया।

 

 

 

प्रश्न १० – आपने चारधाम यात्राएँ तथा विदेश यात्राएँ भी की हैं। इन यात्राओं ने आपके चिंतन, व्यक्तित्व और साहित्य को किस प्रकार समृद्ध किया?

 

शिमला जी :- चारधाम और विदेश यात्राओं ने जीवन को एक नया आयाम दिया। चारधाम की यात्रा – उत्तराखंड का मनोरम दृश्य और दुर्गम पहाड़ियाॅं पवित्र नदियाॅं (यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ, बद्रीनाथ) के सानिध्य ने मुझे प्रकृति की दिव्यता और विराटता का साक्षात्कार कराया, चिंतन में परिवर्तन आया इस यात्रा ने मुझे भौतिक सुखों से परे आत्म-संयम और धैर्य का पाठ पढ़ाया वहॉं जो पण्डा होते हैं उनके रजिस्टर में हमारे पूर्वजों के नाम अंकित होते हैं जिसकी वजह से यह यात्रा हमें अपनी जड़ों से जुड़ने का अवसर प्रदान करती है। यात्रा का साहित्यि पर गहरा प्रभाव हुआ और मेरे लेखन में भारतीय संस्कृति, दर्शन और सनातन परंपराओं के प्रति निष्ठा और अधिक गहरी हो गई। चारधाम यात्रा ने जहाँ आध्यात्मिक गहराई और सांस्कृतिक एकता का बोध कराया, वहीं विदेश यात्रा ने वैश्विक दृष्टिकोण और आधुनिक चिंतन को विकसित किया। वहाॅं की संस्कृति जीवन-शैली और सामाजिक व्यवस्थाओं को देखने से सोच में सकारात्मक विस्तार हुआ। इन दोनों अनुभवों ने मिलकर मेरे साहित्य को समृद्ध और व्यापक बनाया है।

 

 

 

प्रश्न ११ – धार्मिक एवं सामाजिक विषयों के प्रति आपका विशेष अनुराग है। आपकी दृष्टि में साहित्य आध्यात्मिक चेतना और सामाजिक जागरण का सशक्त माध्यम किस प्रकार बन सकता है?

 

शिमला जी :- साहित्य शब्दों और विचारों के माध्यम से समाज को एक नई दिशा प्रदान करने की अद्वितीय क्षमता रखता है। आत्मा और परमात्मा के संबंध से साहित्य जब मनुष्य को उसकी आंतरिक शक्तियों और स्वधर्म से परिचित कराता है। तब वह आध्यात्मिक चेतना का रूप ले लेता है। रचनाओं के माध्यम से पाखंड रूढ़िवाद कुरितियाॅं और अंधविश्वासों का विरोध कर सामाजिक समता और बंधुत्व का संदेश देकर साहित्य धार्मिक सुधार और सामाजिक जागरण का एक सशक्त माध्यम बनता है।

 

 

 

प्रश्न १२ – वर्तमान समय में हिंदी साहित्य के समक्ष आपको कौन-सी प्रमुख चुनौतियाँ और कौन-सी नवीन संभावनाएँ दिखाई देती हैं?

 

शिमला जी :- वर्तमान समय में हिंदी साहित्य के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती भाषा की शुद्धता का संकट है अंग्रेजी का बढ़ता प्रभाव और पाठकों की घटती पुस्तक पढ़ने की आदत है। साहित्यिक पत्रिकाओं का पतन पारंपरिक पत्र-पत्रिकाओं का संकट बढ़ा है और युवा पीढ़ी विचार-मंथन से दूर होकर मोबाइल की लघु सामग्री तक सीमित होती जा रही है।

हिन्दी की नवीन संभावनाएँ दिखाई देती हैं। -डिजिटल माध्यम और वैश्विक पहुँच से इंटरनेट ने हिंदी साहित्य को भौगोलिक सीमाओं से मुक्त कर दिया है। ई-बुक्स, ब्लॉग्स, वेब पोर्टल्स और ऑडियो-बुक्स (जैसे पॉडकास्ट) ने नए पाठकों तक हिंदी की पहुँच बहुत आसान कर दी है।

 

 

 

प्रश्न १३ – यदि आपको अपनी सम्पूर्ण साहित्यिक यात्रा को केवल एक शब्द में अभिव्यक्त करना हो, तो वह शब्द क्या होगा? और क्यों?

 

 शिमला जी :- *”निरंतरता’*

क्यों – सृजन संवेदनाओं का एक ऐसा अविराम प्रवाह है जो हर पल चलता रहता है। एक रचनाकार के रूप में लिखना खुद को निरंतर तराशने की एक प्रक्रिया है। जिसमें ठहराव का मतलब रचनात्मकता का अंत है। साहित्य समय के साथ बदलता रहता है। और निरंतरता ही उस परिवर्तन को पाठकों तक पहुॅंचाती है और पीढ़ियों के बीच जोड़कर रखती है।

 

 

 

प्रश्न १४ – नवोदित रचनाकारों, विशेषकर साहित्य के क्षेत्र में आगे बढ़ने की आकांक्षा रखने वाली महिलाओं के लिए आपका प्रेरणादायी संदेश क्या होगा?

 

शिमला जी :- नवोदित रचनाकार और महिलाओं के लिए संदेश -अपने मन के भाव और दृष्टिकोण को बिना किसी संकोच के शब्दों में पिरोऍं। आपके व्यक्तिगत अनुभव, संघर्ष और संवेदनाएं ही आपके सृजन को वास्तविक और सशक्त बनायेंगे। प्रतिदिन लिखना और पढ़ना आपकी शैली को निखारता है। आगे बढ़ने के लिए निरंतरता बनाए रखें। लेखन को एक साधना की तरह अपनाएं। जहॉं प्रबुद्ध साहित्यकार प्रशिक्षण देते हैं ऐसे साहित्यिक संस्थाओं और मंचों से जुड़े अपनी रचना साझा करें। यदि रचना में कोई त्रुटि बताई जाए तो हताश न हो उसका सुधार करें और अपने सृजन को सुदृढ़ बनाऍं। अपने आप पर विश्वास रखें हर चुनौती का सामना कर खुद को मजबूत बनाऍं और साहित्य के क्षेत्र में एक नया आयाम हासिल करें।

 

 

 

प्रश्न १५ – अंत में, हमारे समस्त श्रोताओं एवं साहित्य-प्रेमियों के लिए आपका वह जीवन-संदेश क्या होगा, जिसे आप अपनी साहित्य-साधना का सार मानती हैं?

 

शिमला जी :- कला और शब्द केवल मनोरंजन का साधन नहीं हैं बल्कि समाज के उत्थान और आत्म-परिष्कार का माध्यम हैं। अपनी संस्कृति और संस्कार के प्रति समर्पण, मानवता की सेवा, अनुभूतियों का विस्तार और जीवन को सत्य, प्रेम व समरसता की राह पर चलना तथा जीवन में संघर्ष करते हुए निरंतरता बनाऍं रखना ही मेरी साहित्य-साधना का सार है।

 

 

✍🏻 वार्ता : श्रीमती शिमला शर्मा “लक्ष्मीप्रिया”

 

 

 

कल्प भेंटवार्ता में व्यक्तित्व परिचय के अंतर्गत आपका परिचय प्रबुद्ध साहित्यकार से कराने का विशेष प्रयास करते हुए आज हम बात कर रहे हैं ग्वालियर, मप्र की कवयित्री श्रीमती शिमला शर्मा “लक्ष्मीप्रिया” जी से। इन्हें विस्तार से सुनने व देखने के लिए हमारे यूट्यूब चैनल पर जाएं 👇

 

 

https://www.youtube.com/live/mN3EbQ_9rMk?si=z3HssWzn1WLSUijp

 

 

इनसे बातें करना व मिलना आपको कैसा लगा? आप हमें कमेन्ट में बता सकते हैं। आपकी विशिष्ट प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी। 

 

मिलते हैं अगले सप्ताह एक और प्रबुद्ध साहित्यकार के साथ। तब तक के लिए हमें आज्ञा दीजिये। 

राधे राधे 🙏 🪷 🙏 

 

✍🏻 लिखते रहिये 📖 पढ़ते रहिये और 🚶 बढ़ते रहिये ✴️ 

 

✍🏻 प्रश्नकर्ता : कल्प भेंटवार्ता प्रबंधन 

 

🦚 आयोजक : कल्पकथा प्रमुख श्री राधागोपीनाथ जी 

 

कल्प भेंटवार्ता

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