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!! “कल्प भेंटवार्ता : व्यक्तित्व परिचय : श्रीमती श्रीमती नीरजा “नीरू” !!

!! “कल्प भेंटवार्ता : व्यक्तित्व परिचय :  श्रीमती नीरजा “नीरू” !! 

 

 

 तिथि -१९/७/२०२६

 

 सम्पर्क सूत्र :- 9721720059

 

!! “मेरा परिचय” !! 

 

नाम :- श्रीमती नीरजा “नीरू”

 

माता/पिता का नाम :- श्रीमती कौशल कुमारी

स्व.लल्तू राम

 

जन्म स्थान एवं जन्म तिथि :- 

ग्राम – परसेहरा (लखीमपुर खीरी)

10.02.1977

 

पति/पत्नी का नाम :- श्री मेवा लाल

 

बच्चों के नाम :- अमन वोहरा

                      आकाश वोहरा

 

शिक्षा :- बी एस सी ,एम ए ,बी एड

 

व्यवसाय :- अध्यापन

 

वर्तमान निवास :- लखनऊ 

 

आपकी मेल आई डी :- neerjaneeru42@gmail.com

 

आपकी कृतियाँ :- 1. मौन जब मुखरित हुआ ( गीत संग्रह) प्रकाशित 

                         2. मन से मन तक (गीत  

संग्रह) प्रकाश्य

 

आपकी विशिष्ट कृतियाँ :- मौन जब मुखरित हुआ (गीत संग्रह)

 

आपकी प्रकाशित कृतियाँ :- मौन जब मुखरित हुआ ( गीत संग्रह)

 

पुरूस्कार एवं विशिष्ट स्थान :-

 

-आगमन युवा प्रतिभा सम्मान ( आगमन संस्था)

– साहित्य साधक सम्मान ( वात्सल्य फाउंडेशन )

– साहित्य भारती सम्मान ( सशक्त फाउंडेशन)

– साहित्य रत्न सम्मान ( उड़ान समूह )

– भारत गौरव सम्मान- 2020( काव्य रंगोली )

– शिक्षक सम्मान -2020( नवीन कदम समूह) 

– साहित्य शिरोमणि सम्मान ( नवीन कदम समूह)

– कलमवीर सम्मान ( काव्य रंगोली )

– प्राइड वीमेन ऑफ इंडिया अवार्ड (आगमन द्वारा)

-वीमेन अचीवर अवार्ड ( क्षितिज ..where dreams meet reality )

-दिनकर गौरव सम्मान ( क्षितिज .. where dreams meet reality)

-दुर्गा शक्ति स्वरूपा सम्मान ( दुर्गा शक्ति फाउंडेशन द्वारा 

-मिशन सशक्तिकरण समिति लखनऊ द्वारा सम्मान 

-वूमेन प्रेस्टीज अवार्ड ( लॉयन्स क्लब दिल्ली वेज इंडो म्यांमार फ्रेंडशिप एसोसिएशन द्वारा)

 

साहित्यिक क्षेत्र की विभिन्न ऑनलाइन प्रतियोगिताओं में श्रेष्ठ स्थान की प्राप्ति तथा विभिन्न काव्य मंचों व साहित्यिक मंचों से सम्मान ..

 

कल्पा देवी स्मृति सम्मान 2024…प्रज्ञा साहित्य परिषद उत्तर प्रदेश द्वारा ” मौन जब मुखरित हुआ” ( गीत संग्रह) को

 

      

 

!! “मेरी पसंद” !!

 

उत्सव :- दीपावली

 

भोजन :- साधारण घर का खाना

 

रंग :- लाल

 

परिधान :- साड़ी ,सूट आदि

 

स्थान एवं तीर्थ स्थान :- प्राकृतिक एवं ऐतिहासिक स्थान ,पुरी

 

लेखक/लेखिका :-मुंशी प्रेमचंद्र

 

कवि/कवयित्री :- महादेवी वर्मा 

 

उपन्यास/कहानी/पुस्तक :- मंत्र

 

कविता/गीत/काव्य खंड :- मैं नीर भरी दुख की बदली

 

खेल :- बैडमिंटन 

 

फिल्में/धारावाहिक (यदि देखते हैं तो) :- दंगल

 

आपकी लिखी हुई आपकी सबसे प्रिय कृति :- मौन जब मुखरित हुआ ( गीत संग्रह )

 

 

 

 

 

 

!! कल्प भेंटवार्ता के प्रश्न : श्रीमती श्रीमती नीरजा “नीरू” जी के उत्तर !! 

 

 

प्रश्न १ – लखीमपुर खीरी की माटी से आरंभ हुई आपकी जीवन-यात्रा साहित्य और सृजन की ओर किस प्रकार अग्रसर हुई?

 

नीरजा जी :- लखीमपुर खीरी की पावन माटी और वहाँ का नैसर्गिक वातावरण मेरे भीतर के रचनाकार को तराशने में हमेशा से सहायक रहा है। इस मिट्टी से शुरू हुई मेरी यात्रा वास्तव में प्रकृति, समाज और मानवीय संवेदनाओं को समझने और उन्हें शब्दों में पिरोने की एक अनवरत साधना है।शुरुआती दिनों में, लखीमपुर खीरी की समृद्ध सांस्कृतिक पृष्ठभूमि और ग्रामीण अंचलों के अनछुए पहलुओं ने मेरे अंतर्मन को गहरा झकझोरा। आस-पास के परिवेश, लोकगीतों, स्थानीय उत्सवों और यहाँ के लोगों के सरल लेकिन संघर्षपूर्ण जीवन ने मुझे यह सिखाया कि हर चेहरे के पीछे एक कहानी होती है। जब इन अनुभवों को अभिव्यक्ति देने की व्याकुलता बढ़ी, तो कलम ने सहज ही कागज़ का रास्ता चुन लिया।साहित्य और सृजन की ओर इस झुकाव को विस्तृत रूप तब मिला, जब मैंने पुस्तकों में छिपी दुनिया को तलाशना शुरू किया। महान रचनाकारों के विचारों ने मेरे भीतर के अनुभवों को एक नई दिशा और भाषा दी । धीरे धीरे मन की बात डायरी के पन्नों पर उतरती गयी डायरी से सोशल मीडिया ,सोशल मीडिया से साहित्यिक मंच । साहित्यिक मंचों एवं संस्थाओं ने लेखनी को एक नई ऊर्जा दी ,इसी में एक उड़ान साहित्यिक संस्था में ऑनलाइन चलने वाले गुरुकुल में मिले गुरुओं आदरणीय मनोज शुक्ल ‘मनुज’ जी एवं आदरणीय सरोज सिंह परिहार ‘सूरज’ जी ने मेरे लेखन को परिमार्जित किया। उनके आशीर्वाद एवं मार्गदर्शन से एवं मेरे साथियों,परिवारीजनों के उत्साहवर्धन से लेखन को गति मिली और यह गति अभी भी ईश्वरीय और गुरु कृपा से जारी है।

 

 

 

प्रश्न २ – वर्तमान में आप लखनऊ से जुड़ी हुई हैं। लखनऊ की साहित्यिक एवं सांस्कृतिक विरासत ने आपके चिंतन और लेखन को किस प्रकार प्रभावित किया है?

 

नीरजा जी :- लखनऊ को नवाबों का शहर और पूर्व का स्वर्ण नगर कहा जाता है । हलचल भरा यह शहर नवाबी तहजीब ऐतिहासिक विरासतें स्वादिष्ट खान-पान और प्राचीन और आधुनिक संस्कृति के संगम के कारण प्रसिद्ध है। लखनऊ की ‘पहले आप’ ‘पहले आप’ की तहजीब और भाषा की मिठास कवि मन में स्वत: उतर जाती है,,मुशायरों और महफिलों की जीवंत परंपरा कवि हृदय को एक मंच देती है ,,जहाँ वह खुलकर अपनी बात कहता है , ऐतिहासिक इमारतों में छिपा संघर्ष और रुमानियत कवि हृदय को बरबस अपनी ओर खींच लेती है ,कथक ,शास्त्रीय संगीत और सूफियाना कलामों का प्रभाव कवि मन को लय-ताल से सराबोर कर देता है और उसकी कविताओं में लय-ताल का अनूठा संगम दिखने लगता है,अवधी और उर्दू साहित्य में विरह और श्रृंगार के व इश्क के गहरे भाव कवि के कोमल मन पर गहरा प्रभाव डालते हैं ।कवि मन स्वत: भावुक और संवेदनशील हो जाता है ।अत: लखनऊ की धरती से होने के कारण मुझ पर यह प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है और मेरी रचनाओं पर भी।

 

 

 

प्रश्न ३ – अध्यापन जैसे ज्ञानवर्धक क्षेत्र से जुड़े रहते हुए साहित्य-साधना के लिए समय और ऊर्जा का संतुलन आपने किस प्रकार बनाया?

 

नीरजा जी :- जैसे जीवन के लिए ऑक्सीजन आवश्यक है वैसे ही मेरे लिए पठन-पाठन और लेखन ।वास्तव में अध्यापन जैसे क्षेत्र ने मेरी रुचि को नए आयाम दिए ,विचारों को नया विस्तार दिया । लिखना मेरी रुचि है और रुचि के लिए समय कहीं न कहीं से निकाल ही लेती हूँ क्योंकि लिखना और पढ़ना मुझमें नवीन ऊर्जा भर देता है। हालाँकि अध्यापन के साथ-साथ घरेलू जिम्मेदारियों के बीच साहित्य सृजन मुश्किल तो होता है पर जब सृजन आपके जीवन का अभिन्न अंग बन जाए तो समय तो स्वत: ही निकल ही आता है।

 

 

 

प्रश्न ४ – आपकी पहली प्रकाशित कृति “मौन जब मुखरित हुआ” गीत संग्रह के पीछे कौन-सी अनुभूति और प्रेरणा रही?

 

नीरजा जी :- एक लेखक या रचनाकार के रूप में, पहली प्रकाशित कृति का सामने आना जीवन के सबसे भावुक और अविस्मरणीय क्षणों में से एक होता है। गीत संग्रह “मौन जब मुखरित हुआ” के संग्रह के पीछे सबसे बड़ी अनुभूति अंतर्मन का वह मौन रहा है, जो अक्सर शब्दों के अभाव में घुटता रहता है। जीवन के कुछ ऐसे गहरे अनुभव, भावनाएँ और संवेग होते हैं जिन्हें हम आम बोलचाल में व्यक्त नहीं कर पाते। जब वह संचित मौन अपनी चरम सीमा पर पहुँच जाता है, तो वह कविता, छंद और गीतों के माध्यम से ‘मुखरित’ होने के लिए छटपटाने लगता है। यही आंतरिक छटपटाहट इस कृति की मूल प्रेरणा बनी। इस संग्रह का शीर्षक और इसके गीत इसी अनुभूति को समर्पित हैं कि जब हृदय का मौन टूटता है, तो वह संगीत और काव्य बनकर गूँज उठता है।पहली बार अपनी अनुभूतियों को कागज़ पर उकेर कर उसे एक पुस्तक के रूप में देखने की चाह हर नवोदित रचनाकार की सबसे बड़ी प्रेरणा होती है। पाठकों तक अपने हृदय की बात पहुँचाने और उनके साथ एक भावनात्मक सेतु बनाने की आकांक्षा ने ही इन गीतों को संकलित करने की प्रेरणा दी।”मौन जब मुखरित हुआ” केवल कुछ गीतों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह अंतर्मन की गहराइयों से उपजी उन सिसकियों, मुस्कुराहटों और विचारों का जीवंत दस्तावेज़ है, जिन्हें अंततः शब्दों का सुंदर परिधान मिला।

 

 

 

प्रश्न ५ – आपकी दृष्टि में गीत विधा की सबसे बड़ी विशेषता क्या है और यह पाठकों के हृदय तक किस प्रकार पहुँचती है?

 

नीरजा जी :- गीत विधा की सबसे बड़ी विशेषता इसकी गेयता (संगीतात्मकता) और भावों की सहज अनुभूति है। संगीतमय लय और छंदबद्धता के कारण यह पाठक के मन में सीधे उतर जाती है।

 

 

 

प्रश्न ६ – आपकी रचनाओं में भावनाओं और संवेदनाओं की गहराई दिखाई देती है। जीवन के कौन-से अनुभव आपकी लेखनी को सबसे अधिक प्रभावित करते हैं?

 

नीरजा जी :- मेरी लेखनी को सबसे अधिक प्रभावित करते हैं जीवन के वे अनछुए पल और व्यक्तिगत अनुभव, जहाँ भावनाएं अपने सबसे कच्चे और वास्तविक रूप में सामने आती हैं। अपनों से बिछोह का दर्द, संघर्षों से उपजा साहस, और रोजमर्रा की जिंदगी की छोटी-छोटी खुशियां ही मेरे शब्दों को गहराई देती हैं ।प्रकृति के सानिंध्य में बिताए पल,सामाजिक ताने बाने में फंसा मानव जीवन , रोजी रोटी के लिए उसका संघर्ष मेरी लेखनी को भाव देते हैं ,और कभी-कभी अंतर्मन का संघर्ष भी लेखनी के माध्यम से कागज पर उतर आता है।

 

 

 

प्रश्न ७ – मुंशी प्रेमचंद और महादेवी वर्मा जैसे साहित्यकारों से आपने अपने लेखन के लिए क्या प्रेरणा ग्रहण की है?

 

नीरजा जी :- मुंशी प्रेमचंद और महादेवी वर्मा जैसे महान साहित्यकारों का लेखन किसी भी लेखक के लिए एक शाश्वत मार्गदर्शिका की तरह है। उनसे प्रेरणा ग्रहण कर लेखन को न केवल भाषाई रूप से समृद्ध बनाया जा सकता है, बल्कि उसे एक सामाजिक उद्देश्य भी दिया जा सकता है। प्रेमचंद जी से जहाँ यथार्थ की जमीन पर खड़े रहकर समाज को देखने का नजरिया मिलता है, वहीं महादेवी जी से उस यथार्थ को अत्यंत संवेदनशील, करुणामय और कलात्मक रूप से व्यक्त करने की प्रेरणा मिलती है।मेरी रचनाएं भी उपरोक्त भावनाओं से प्रेरित हैं।

 

 

 

प्रश्न ८ – एक शिक्षिका और साहित्यकार के रूप में आप समाज निर्माण में शिक्षा और साहित्य की भूमिका को किस रूप में देखती हैं?

 

नीरजा जी :- एक शिक्षिका और साहित्यकार के रूप में, मैं शिक्षा और साहित्य को समाज निर्माण के दो सबसे मजबूत स्तंभ मानती हूँ। ये दोनों अलग-अलग होते हुए भी एक-दूसरे के पूरक हैं। जहाँ शिक्षा व्यक्ति को वैचारिक रूप से सक्षम बनाती है, वहीं साहित्य उसे संवेदनशील और मानवीय बनाता है। जब शिक्षा और साहित्य का मिलन होता है, तो एक आदर्श समाज की नींव पड़ती है। शिक्षा व्यक्ति को ‘मस्तिष्क’ देती है और साहित्य उसे ‘हृदय’ देता है। बिना शिक्षा के समाज प्रगति नहीं कर सकता, और बिना साहित्य के समाज भावशून्य और क्रूर हो सकता है।इसलिए, एक शिक्षिका और शिक्षार्थी के रूप में मेरा निरंतर यह प्रयास रहता है कि मैं अपने विद्यार्थियों में केवल कौशल ही न भरूँ, बल्कि उनके भीतर साहित्य के माध्यम से जीवन मूल्यों और नैतिक चेतना का भी संचार कर सकूँ।

 

 

 

प्रश्न ९ – अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित होने का अनुभव आपकी साहित्यिक यात्रा को किस प्रकार नई दिशा देता है?

 

नीरजा जी :- अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित होने का अनुभव एक लेखक की साहित्यिक यात्रा को कई गहरे स्तरों पर प्रभावित करता है और उसे एक नई दिशा देता है। उसको सामाजिक और नैतिक जिम्मेदारी का बोध कराता है ,वह अपनी लेखनी के प्रति सचेत हो जाता है क्योंकि उसका लेखन समाज को प्रभावित कर सकता है ,विषय चयन में गहराई आती है व्यापक पाठक वर्ग तक पहुंचने पर उनकी प्रतिक्रियाएं और अपेक्षाएं लेखक को नए

दृष्टिकोण से सोचने को और लिखने को मजबूर करती हैं ,लेखक की आत्म संतुष्टि बढ़ती है , आत्मविश्वास बढ़ता है ।लेखक नई पीढ़ी के लिए मार्गदर्शक की भूमिका निभाता है ।

   सच कहें तो सम्मान मिलने से यात्रा ठहरती नहीं है, बल्कि यह लेखक के भीतर एक नया आत्ममंथन शुरू करती है, जो उसे और अधिक गंभीर तथा कालजयी साहित्य रचने की ओर अग्रसर करती है।

 

 

 

प्रश्न १० – आपकी प्रिय रचना “मौन जब मुखरित हुआ” को पाठकों का स्नेह मिला। इस कृति से जुड़ी आपकी विशेष अनुभूति क्या है?

 

नीरजा जी :- मौन जब मुखरित हुआ” को पाठकों से मिले अपार स्नेह और सराहना ने मेरे हृदय को गहराई से छू लिया है। एक लेखक के रूप में जब आपकी कोई कृति पाठकों के दिलों तक पहुँचती है, तो वह क्षण बेहद संतोषजनक और भावुक करने वाला होता है।इस कृति से जुड़ी मेरी विशेष अनुभूति यह है कि “मौन” केवल शब्दों की अनुपस्थिति नहीं है, बल्कि यह अपने आप में एक गहरी भाषा है। जब हम भीतर के उस मौन को, उन अनकहे जज्बातों और छुपे हुए संघर्षों को शब्दों का रूप देते हैं, तो वह केवल एक रचना नहीं रह जाती, बल्कि एक जीवंत संवाद बन जाती है। पाठकों ने जिस तरह इस पुस्तक के खाली स्थानों और पंक्तियों के बीच छिपे भावों को समझा है, उसने मुझे यह विश्वास दिलाया कि मौन की भी अपनी एक मुखर गूँज होती है जो सीधे आत्मा से जुड़ती है।

 

 

 

प्रश्न ११ – प्राकृतिक और ऐतिहासिक स्थानों के प्रति आपका विशेष आकर्षण है। यात्राएँ आपकी रचनात्मकता को किस प्रकार प्रभावित करती हैं?

 

नीरजा जी :- प्राकृतिक और ऐतिहासिक स्थानों की यात्राएँ केवल भूगोल को जानने का माध्यम नहीं हैं, बल्कि ये मेरी रचनात्मकता को गहराई, विस्तार और एक नई दृष्टि देने वाली संजीवनी हैं। जब मैं किसी सदियों पुराने ऐतिहासिक स्मारक की दहलीज़ पर कदम रखती हूँ या प्रकृति के किसी शांत कोने में बैठती हूँ, तो मेरी आंतरिक चेतना और लेखन प्रक्रिया पर इसका गहरा प्रभाव पड़ता है। संवेदना का विस्तार होता अनुभव को प्रामाणिकता मिलती ,स्थानीय संस्कृति,, स्थानीय लोगों से मिलकर आने वाली रचनाओं के लिए विषय व जीवंत पात्र मिलते हैं ,लोक कथाओं और बिम्बों का जन्म होता है ।प्रकृति के बीच जाने पर—चाहे वह हिमालय की चोटियाँ हों या सुदूर दक्षिण के समुद्र तट—मन इंसानी सीमाओं से ऊपर उठकर ब्रह्मांड की विशालता से जुड़ता है। यह अनुभव रचना को सतहीपन से निकालकर उसमें एक दार्शनिक गहराई भर देता है।जब मैं किसी शांत प्राकृतिक स्थान या किसी प्राचीन मंदिर/मठ के परिसर में बैठती हूँ, तो वह साधना का एक रूप बन जाता है। वहाँ मिलने वाला एकांत मुझे आत्म-निरीक्षण का अवसर देता है, जिससे बिखरे हुए विचार एक सुगठित रचना का रूप लेने लगते हैं।ऐतिहासिक स्थान हमें समय की नश्वरता का बोध कराते हैं। राजा-महाराजा, साम्राज्य और उनके अहंकार सब समय के गाल में समा गए, बची रह गई तो केवल कला और संस्कृति। इस तरह ऐतिहासिक और प्राकृतिक यात्राएं मेरे लेखन पर गहरा असर डालती हैं।

 

 

 

प्रश्न १२ – वर्तमान समय में हिन्दी साहित्य और विशेष रूप से गीत विधा के सामने आपको कौन-सी चुनौतियाँ और संभावनाएँ दिखाई देती हैं?

 

नीरजा जी :- वर्तमान समय में हिंदी साहित्य और विशेष रूप से ‘गीत विधा’ (नवगीत, प्रगीत और पारंपरिक गीत) एक अत्यंत संवेदनशील और परिवर्तनशील दौर से गुजर रहे हैं।भूमंडलीकरण, डिजिटल क्रांति और बदलती जीवनशैली ने जहाँ इसके सामने कई गंभीर चुनौतियाँ खड़ी की हैं, वहीं संभावनाओं के नए द्वार भी खोले है।आजकल मंचों का व्यवसायीकरण हो गया है ,शुद्ध साहित्यिक गीतों की जगह चुटकुलों ने ले ली है ,समीक्षाओं का अभाव है ,पाठकों की घटती रुचि ,भाषाई क्लिष्टता ,सामयिक उपमानों का प्रयोग न के बराबर दिखता है । लेकिन इसके बावजूद गीत विधा में नयी संभावनाएं दिख रही हैं डिजिटल और सोशल मीडिया ने प्रकाशकों और मंचों की मध्यस्थता को खत्म कर दिया है , आज कोई भी प्रतिभाशाली गीतकार करोड़ों श्रोताओं और पाठकों से इन माध्यमों से आसानी से जुड़ सकता है ,इंटरनेट के कारण हिंदी की पहुंच दूर दूर देशों तक हुई है , हिंदी गीत विधा संकट में जरूर दिखाई देती है, लेकिन उसकी जड़ें भारतीय जनमानस की चेतना में इतनी गहरी हैं कि वह कभी समाप्त नहीं हो सकती। आवश्यकता इस बात की है कि गीतकार समय के साथ अपनी भाषा और प्रतीकों को बदलें और तकनीक का सही उपयोग करके नई पीढ़ी तक पहुँचें।

 

 

 

प्रश्न १३ – आपकी दृष्टि में एक श्रेष्ठ रचनाकार की पहचान प्रतिभा से अधिक संवेदना और साधना में क्यों निहित होती है?

 

नीरजा जी :- एक श्रेष्ठ रचनाकार की पहचान केवल उसकी जन्मजात ‘प्रतिभा’ से नहीं, बल्कि उसकी ‘संवेदना’ और ‘साधना’ से होती है। क्योंकि रचना का बीज और आत्मप्रतिभा किसी व्यक्ति को शब्दों के चयन, भाषा पर पकड़ या शिल्प में निपुण बना सकती है, लेकिन जब तक हृदय में गहरी संवेदना नहीं होगी, तब तक कोई भी रचना पाठकों के हृदय को नहीं छू सकती।संवेदना वह तत्व है जो एक रचनाकार को समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति के दुःख, पीड़ा, हर्ष और संघर्ष को महसूस करने की क्षमता देती है। इसी प्रकार साधना का अर्थ है—कला के प्रति पूर्ण समर्पण, निरंतर अध्ययन, आत्म-निरीक्षण और बार-बार सुधार करने का धैर्य। महान रचनाएँ रातों-रात नहीं लिखी जातीं; वे रचनाकार के वर्षों के मानसिक और बौद्धिक श्रम का परिणाम होती हैं। साधना रचनाकार को विनम्र बनाती है। यदि प्रतिभा को एक ‘बीज’ मान लिया जाए, तो संवेदना वह ‘मिट्टी और पानी’ है जो उसे अंकुरित करती है, और साधना वह ‘निरंतर देखभाल व धूप’ है जो उसे एक विशाल, फलदार वृक्ष बनाती है।केवल प्रतिभा के भरोसे रहने वाला रचनाकार कुछ समय के लिए अपने वाक-चातुर्य या लेखन शैली से लोगों को प्रभावित कर सकता है, लेकिन समय के साथ उसकी रचनाएँ एकांगी या खोखली होने लगती हैं।इसके विपरीत, जिस रचनाकार के पास गहरी संवेदना और अटूट साधना होती है, वह अपनी सीमित प्रतिभा को भी असीमित विस्तार दे देता है। उसकी रचनाएँ केवल समकालीन नहीं रहतीं, बल्कि सर्वकालिक बन जाती हैं।

 

 

 

प्रश्न १४ – यदि आपको अपनी साहित्यिक यात्रा को एक शब्द में व्यक्त करना हो, तो वह शब्द क्या होगा और क्यों?

 

नीरजा जी :- यदि मुझे अपनी साहित्यिक यात्रा को एक शब्द में व्यक्त करना होगा तो वो है “नदी” यदि “नदी” शब्द को लिया जाए, तो मेरी साहित्यिक यात्रा की अभिव्यक्ति को एक बेहद खूबसूरत, गतिशील और गहरा आयाम मिलता है। इस यात्रा को “नदी” के रूप में देखने के मुख्य कारण हैं पहला निरंतर प्रवाह:नदी कभी रुकती नहीं है, वह हमेशा आगे बढ़ती रहती है। इसी तरह, मेरी भाषाई और साहित्यिक यात्रा भी निरंतर गतिशील है। हर दिन नए विचार, नए शब्द और नया ज्ञान इस प्रवाह में जुड़ते चले जाते हैं। दूसरा -ज्ञान का संचय और वितरण: नदी पहाड़ों और जंगलों से गुजरते हुए अपने साथ कई तरह के खनिज और पोषक तत्व समेटती है और मैदानों को उपजाऊ बनाती है। ठीक वैसे ही, मैं भी विशाल वैश्विक ज्ञान और साहित्य को समेटकर उसे पाठकों के लिए एक सहज और उपयोगी रूप में प्रस्तुत करती हूँ।तीसरा -अनुकूलनशीलता : नदी अपना रास्ता खुद बनाती है। रास्ते में चट्टान आए तो वह मुड़ जाती है, लेकिन रुकती नहीं। साहित्य और भाषा भी समय के साथ बदलते हैं, नए रूपों में ढलते हैं, और मैं भी हर पाठक की अनूठी शैली, भाषा और जरूरत के अनुसार खुद को ढालने का प्रयास करती हूँ।चौथा-सागर से मिलने की चाह: नदी का अंतिम लक्ष्य सागर में विलीन होना है। मेरी इस यात्रा का अंतिम लक्ष्य भी इंसानी समझ, संवेदना और असीम ज्ञान के महासागर का हिस्सा बनना है, जहाँ पहुँचकर हर जिज्ञासा शांत हो सके।संक्षेप में, “नदी” मेरी यात्रा के उस स्वरूप को दर्शाती है जो थमती नहीं, जो सबको जीवन देती चलती है और जिसमें ठहराव नहीं, बल्कि एक सुंदर बहाव है।

 

 

 

प्रश्न १५ – अंत में, नवोदित साहित्यकारों एवं हमारे श्रोताओं के लिए आपका प्रेरणास्पद संदेश क्या होगा ? 

 

नीरजा जी :- नवोदित साहित्यकारों के लिए मेरा यही संदेश है कि वे अपनी मौलिकता को बनाए रखें और श्रोताओं से अनुरोध है कि वे साहित्य को सिर्फ मनोरंजन न मानें, बल्कि उसे जीवन का हिस्सा बनाएं साहित्यकारों के लिए मेरी सबसे बड़ी सीख यह है कि वे दूसरों की नकल करने से बचें, अपने आस-पास के अनुभवों, मानवीय संवेदनाओं और यथार्थ को अपनी रचनाओं का आधार बनाएं,श्रद्धा और धैर्य के साथ साहित्य का सृजन करें, क्योंकि एक अच्छी रचना समाज को एक नई दिशा और ऊर्जा दे सकती है।

 

✍🏻 वार्ता : श्रीमती नीरजा “नीरू”

 

 

 

कल्प भेंटवार्ता में व्यक्तित्व परिचय के अंतर्गत आपका परिचय प्रबुद्ध साहित्यकार से कराने का विशेष प्रयास करते हुए आज हम बात कर रहे हैं लखनऊ , उप्र की कवयित्री श्रीमती नीरजा “नीरू” जी से। इन्हें विस्तार से सुनने व देखने के लिए हमारे यूट्यूब चैनल पर जाएं 👇

 

 

https://www.youtube.com/live/AEeZpdy4xT0?si=GDMbYNp1G6ptTkVi

 

 

इनसे बातें करना व मिलना आपको कैसा लगा? आप हमें कमेन्ट में बता सकते हैं। आपकी विशिष्ट प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी। 

 

मिलते हैं अगले सप्ताह एक और प्रबुद्ध साहित्यकार के साथ। तब तक के लिए हमें आज्ञा दीजिये। 

राधे राधे 🙏 🪷 🙏 

 

✍🏻 लिखते रहिये 📖 पढ़ते रहिये और 🚶 बढ़ते रहिये ✴️ 

 

✍🏻 प्रश्नकर्ता : कल्प भेंटवार्ता प्रबंधन 

 

🦚 आयोजक : कल्पकथा प्रमुख श्री राधागोपीनाथ जी 

 

कल्प भेंटवार्ता

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