ओ सखा! लौट आओ
ओ सखा! लौट आओ
मैं स्मृतियों का अश्वमेध हूँ, तेरे द्वारे आया हूँ।
बचपन के निष्कलुष सखा! तुझको संदेशा लाया हूँ।।
पीपल वाली छाँव तले जो सपनों का उत्सव बोया था।
वर्षा ने भी आकर भाई स्वर्णिम पथ को धोया था।।
माटी की उस भीनी गंध में जीवन का श्रृंगार मिला।
तेरे संग हर हार हँसी थी, हर आँसू को प्यार मिला।।
गिल्ली, कंचे, धूल, नदी का निर्मल बचपन गाता था।
साँझ ढले हर स्वर्ण क्षितिज पर अपना सूरज आता था।।
जैसे माखन-चोरी की अठखेली में कृष्ण-सुदामा हँसते थे।
वैसे ही हम जीवन-पथ पर निष्कपट चरण धर चलते थे।।
एक निवाला आधा करके हमने जग को जीता था।
छोटे-छोटे सुख में ही तो जीवन का फल मीठा था।।
राम-सुग्रीव-सा अटल भरोसा मन के सिंहासन पर था।
एक ध्वनि उठते ही जैसे सारा जग अभयंकर था।।
वन की राहें, पर्वत, नदियाँ सब साक्षी बन जाती थीं।
मित्रों की कौतुक वाणी तब अमर कथाएँ गाती थीं।।
कर्ण-दुर्योधन की दृढ़ता भी मित्र-धर्म सिखलाती है।
विपदा की अग्नि में निष्ठा भी कुंदन बन जाती हैं।।
स्वार्थ नहीं, समर्पण ही तब संबंधों की भाषा था।
तेरा मेरा एक हृदय था, एक प्राण, एक आशा था।।
अब तो केवल शेष पड़ी हैं सूनी – सूनी पगडंडी।
सूने आँगन विचर रही है मूक अकेली वय संधि।।
बरगद की हर डाल झूलती तेरा नाम सुनाती है।
साँझ उतरते खेत की मिट्टी आ सुन तुझे पुकारती है।।
तेरे बिना अधखिली पड़ी हैं मन की सारी कविताऐं।
ज्यों तुलसी के बिना वीरानी होती घर की संध्याएं।।
सूनी चौपालों की साँसें तेरा पता बताती हैं।
भीगी आँखें उत्सव में चुपचाप तुझे बुलाती हैं।।
यदि यह पत्र तुझे मिल जाए, लौट सखा! मुस्काना तुम।
बीते युग की भीगी मिट्टी फिर से साथ सजाना तुम।।
आओ फिर से वही दुपहरी पीपल तले बिताएँ हम।
जीवन के इस शोर जगत में बचपन फिर दोहराएँ हम।।
धन-दौलत के राजमहल सब क्षणभर में ढह जाते हैं।
सच्चे मित्र हृदयों के दीपक युग-युग तक मुस्काते हैं।।
समय सभी वैभव हर लेता, यश भी धूल हो जाता है।
किन्तु सखा का निर्मल बंधन युगों-युगों तक गाता है।।
यदि जन्मों का सत्य कहीं मित्रता वही पहचान है।
बाकी सब हर रोज बदलता पर मित्र वही उद्यान है।।
मैं स्मृतियों का अश्वमेध हूँ, तेरे द्वारे आया हूँ,l
बचपन के निष्कलुष सखा! संदेशा लाया आया हूँ।।
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