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सीरियल किलर की डायरी

अस्वीकरण
(यह कहानी पूर्णतः काल्पनिक है। इसमें वर्णित पात्र, घटनाएँ, स्थान, चिकित्सकीय परिस्थितियाँ तथा अपराध कथा-साहित्य की कल्पना पर आधारित हैं। किसी वास्तविक व्यक्ति, संस्था, चिकित्सक, पुलिस अधिकारी अथवा घटना से इसका कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं है। कहानी का उद्देश्य केवल साहित्यिक मनोरंजन और रहस्य-रोमांच की प्रस्तुति है।)

वह शांत मरीज

रात के लगभग साढ़े नौ बज रहे थे। शहर पर शाम से बरस रही बारिश अब कुछ धीमी पड़ गई थी, लेकिन डॉ. दयाल के क्लिनिक की तीसरी मंजिल पर लगी बड़ी खिड़की के शीशों पर बूंदें अभी भी लगातार फिसल रही थीं। प्रतीक्षालय की सारी कुर्सियाँ खाली थीं। रिसेप्शन की मेज पर रखा लैम्प बुझ चुका था और लंबे गलियारे में केवल डॉ. दयाल के कमरे से आती पीली रोशनी फैल रही थी। वह अपनी आखिरी केस-फाइल बंद करके चश्मा उतार ही रहे थे कि दरवाजे पर तीन हल्की दस्तकें हुईं।

“आइए।” डॉ. दयाल ने चश्मा मेज पर रखते हुए दरवाजे की ओर देखा और कुर्सी की पीठ सीधी कर ली, तभी दरवाजा धीरे-से खुला और लगभग तीस वर्ष का एक दुबला-पतला युवक भीतर आया। उसने भीगे बालों पर हाथ फेरा, दरवाजा बंद किया और सामने की कुर्सी पर बैठते हुए कुछ क्षण कमरे की दीवारों, किताबों और खिड़की को बारी-बारी से देखने लगा। “आप केतन हैं?” डॉ. दयाल ने केस-शीट अपनी ओर खींचते हुए पूछा।

“जी।” केतन ने घुटनों पर रखे अपने दोनों हाथों की उंगलियाँ आपस में फँसाईं और नीचे देखते हुए उत्तर दिया, “लेकिन आज मैं अपने इलाज के बारे में बात करने नहीं आया हूँ।”

“तो किस बारे में?” डॉ. दयाल ने कलम खोलकर केस-शीट पर तारीख लिखी और उसकी ओर देखते हुए हल्की मुस्कान दी, “आपने फोन पर तो कहा था कि आपको रात में नींद नहीं आती।”

“नींद आती है।” केतन ने कुछ क्षण अपनी उंगलियों को देखा, फिर खिड़की पर पड़ती बारिश की ओर नजर उठाई और धीमे स्वर में कहा, “मगर मैं जिस आदमी के बारे में बात करने आया हूँ… उसे नींद में पता ही नहीं चलता कि वह क्या करता है।”

डॉ. दयाल की कलम कागज पर रुक गई।

“आप किसी ऐसे व्यक्ति को जानते हैं?” उन्होंने कलम को धीरे-धीरे बंद करते हुए पूछा, तभी केतन ने अपनी नजरें खिड़की से हटाकर उनके चेहरे पर टिका दीं। “बहुत करीब से।”

डॉ. दयाल ने कुर्सी पर अपना भार बदला।

“कौन है वह?” डॉ. दयाल ने आगे झुकते हुए पूछा, लेकिन केतन ने कोई उत्तर नहीं दिया। उसने अपने पैरों के पास रखा पुराना चमड़े का बैग उठाया, उसकी जिप खोली और भीतर से काले चमड़े की मोटी डायरी निकालकर मेज पर रख दी।

“पहले इसे देखिए।” केतन ने डायरी को अपनी हथेली से दबाते हुए कहा, फिर उसकी उंगलियाँ जिल्द पर ठहर गईं।

डॉ. दयाल ने डायरी को गौर से देखा।

“इसमें क्या है?” उन्होंने हाथ बढ़ाया, मगर केतन ने डायरी अपनी ओर खींच ली। “पिछले एक वर्ष में इस शहर में हुई ग्यारह मौतों का पूरा विवरण।”

“पुलिस रिकॉर्ड में तो ये सभी आत्महत्याएँ हैं।” डॉ. दयाल ने भौंहें सिकोड़ते हुए कहा और कुर्सी से थोड़ा आगे झुक गए, “आप मुझे पुरानी खबरें पढ़ाने आए हैं?”

“नहीं।” केतन ने डायरी खोलकर पहला पन्ना उनके सामने कर दिया और अपनी उंगली पहले नाम पर रख दी। “मैं आपको यह बताने आया हूँ कि इनवेस्टिगेशन में कुछ कमी थी।”

डॉ. दयाल की नजर पन्ने पर गई।

अनुराधा सेन।

उनकी उंगलियाँ अचानक मेज के किनारे पर ठहर गईं।

“यह लड़की…” उन्होंने नाम पढ़ते हुए धीरे से कहा, फिर तेजी से केतन की ओर देखा, “यह मेरी मरीज थी।”

“हाँ।” केतन ने बिना पलक झपकाए उनकी ओर देखा और अगला पन्ना पलट दिया।

राकेश मेहरा।

फिर अगला।

संध्या राव।

फिर अगला।

विवेक माथुर।

डॉ. दयाल ने अचानक डायरी बंद कर दी।

“बस।” उनकी उंगलियाँ जिल्द पर कस गईं।

केतन ने हाथ रोक लिया।

“क्यों?” उसने सिर थोड़ा झुकाकर पूछा।

“क्योंकि ये सभी मेरे मरीज थे।” डॉ. दयाल ने डायरी पर हाथ रखते हुए कहा, फिर उसकी आँखों में देखते हुए पूछा, “तुम्हें ये नाम कहाँ से मिले?”

“उनकी मौत की तारीख, समय और कारण भी इसी में हैं।” केतन ने डायरी को धीरे से अपनी ओर खींचा और पन्ने के नीचे लिखे शब्दों पर उंगली रखी। “लेकिन हर विवरण के अंत में एक ही शब्द लिखा है।”

डॉ. दयाल ने झुककर देखा।

हत्या।

उनकी सांस कुछ क्षण के लिए थम गई।

“तुम कहना क्या चाहते हो?” डॉ. दयाल ने सूखे होंठों पर जीभ फेरते हुए पूछा।

“इन ग्यारह लोगों ने आत्महत्या नहीं की।” केतन ने कुर्सी की बाँह पर रखे हाथ को धीरे-धीरे कसते हुए कहा, “उन्हें मारा गया।”

“किसने?” डॉ. दयाल का दिल तेज गति से धड़कने लगा।

केतन ने उत्तर देने के बजाय डायरी बंद कर दी। उसने बैग उठाया, कुर्सी से खड़ा हुआ और दरवाजे की ओर बढ़ते हुए कहा, “यह आपको खुद पता लगाना होगा।”

“तुम जा रहे हो?” डॉ. दयाल भी उठ खड़े हुए और मेज के किनारे से बाहर आए।

“डायरी रख लीजिए।” केतन ने दरवाजे की कुंडी पर हाथ रखा और पीछे मुड़कर देखा।

“और तुम?” डॉ. दयाल अभी भी आश्चर्यचकित थे।

“कल मिलेंगे।” आगंतुक ने संक्षिप्त उत्तर दिया और दरवाजे की ओर देखने लगा।

“क्यों?” डॉ. दयाल ने उसकी ओर दो कदम बढ़ाते हुए पूछा।

केतन ने दरवाजा खोला, बाहर अंधेरे गलियारे में एक क्षण देखा और फिर बहुत धीमे स्वर में कहा, “क्योंकि इस डायरी में ग्यारह मौतें हैं… लेकिन बारहवाँ नाम अभी लिखा जाना बाकी है।”

दरवाजा बंद हुआ। डॉ. दयाल कुछ क्षण वहीं खड़े रहे फिर उन्होंने धीरे से डायरी उठाई। पहले पन्ने के नीचे एक छोटी-सी पंक्ति लिखी थी

“जिसे सच पता होता है, वह सो नहीं पाता।”

डॉ. दयाल ने अनायास अपनी कलाई खुजलाई। वहाँ तीन ताजा खरोंचें थीं।

“डायरी के तीन हिस्से”

रात के ग्यारह बज चुके थे। डॉ. दयाल घर जाने के बजाय उसी कमरे में बैठे थे। उन्होंने बाहर से क्लिनिक का मुख्य दरवाजा बंद कर दिया था। मेज पर एक पीला लैम्प जल रहा था और उसके नीचे खुली डायरी के पन्नों पर उनकी परछाईं बार-बार काँप रही थी। खिड़की के बाहर पेड़ की एक शाखा शीशे से टकराती तो वह अनायास सिर उठाकर उसकी ओर देखने लगते।

डायरी के पहले हिस्से पर शीर्षक था

“पहला हिस्सा – मौतें।”

डॉ. दयाल ने पहला पन्ना खोला।

“अनुराधा सेन -15 अप्रैल।” उन्होंने तारीख पढ़ते हुए पन्ने के नीचे लिखे समय पर उंगली रखी, फिर धीरे से बोले, “रात दो बजकर सत्रह मिनट।”

अगले पन्ने पर राकेश मेहरा का नाम था।

“राकेश – 2 जून।” डॉ. दयाल ने पन्ना पलटा और भौंहें सिकोड़ते हुए कहा, “रात दो बजकर उन्नीस मिनट।”

तीसरा पन्ना।

“संध्या – 19 जुलाई।” उनकी उंगली तारीख से समय तक गई और वहीं ठहर गई। “दो बजकर अठारह मिनट।”

उन्होंने तेजी से अगले पन्ने पलटे।

चारों।

पाँचों।

छठे।

सभी की मृत्यु लगभग रात के दो बजे हुई थी।

डॉ. दयाल कुर्सी से उठे और कमरे में धीरे-धीरे चहलकदमी करने लगे। कुछ कदम बाद वह खिड़की के पास रुके, बाहर अंधेरे में देखा और खुद से बोले, “यह संयोग है।”

उन्होंने फिर डायरी उठाई।

हर मरीज की मृत्यु से ठीक एक दिन पहले डॉ. दयाल से मुलाकात हुई थी।

उनके हाथ में पकड़ी डायरी धीरे-धीरे नीचे झुक गई।

“नहीं…” उन्होंने पन्ने पर हथेली रखते हुए सिर हिलाया, “यह भी संयोग है।”

अगले पन्ने पर एक छोटा-सा वाक्य था “मृत्यु से पहले सभी ने डॉक्टर से बात की थी।” डॉ. दयाल की नजर उस वाक्य पर जम गई।

उन्होंने दूसरा हिस्सा खोला।

शीर्षक था

“दूसरा हिस्सा – मरीज।”

पहले पन्ने पर अनुराधा सेन की जानकारी थी। उसका बचपन उसका डर उसकी नींद, उसकी आखिरी मुलाकात।

डॉ. दयाल की उंगली अचानक एक पंक्ति पर रुक गई।

“अनुराधा ने डॉक्टर से कहा था -मैं मरना नहीं चाहती, मैं सिर्फ अपने भीतर का शोर बंद करना चाहती हूँ।” डॉ. दयाल की आंखें फैल गईं।

“यह बात…” उन्होंने पन्ने के किनारे को पकड़ते हुए कहा, फिर कुछ क्षण बाद उनकी आवाज धीमी हो गई, “यह तो उसने केवल मेरे सामने कही थी।”

उन्होंने अगला पन्ना पलटा।

राकेश मेहरा।

उसकी पत्नी से छिपा हुआ भय, उसके पिता की मृत्यु, उसकी आखिरी बातचीत।

फिर एक पंक्ति “डॉक्टर ने उससे कहा था आज रात सो जाइए, सुबह सब आसान लगेगा।” डॉ. दयाल ने तुरंत डायरी बंद कर दी।

उनकी सांस तेज चलने लगी। “मैंने यह कहा था।” उन्होंने कुर्सी पर बैठकर माथा दबाया।

कुछ क्षण बाद उन्होंने डायरी फिर खोली।

संध्या, विवेक, मीना, सुरेश हर मरीज की वही निजी बातें थीं जिन्हें डॉ. दयाल ने किसी फाइल में नहीं लिखा था, उन्होंने अचानक डायरी मेज पर पटक दी।

“यह किसने लिखी?” डॉ. दयाल ने कमरे के अंधेरे को देखते हुए पूछा, लेकिन कोई उत्तर नहीं आया।

कमरे में केवल घड़ी की टिक-टिक सुनाई देती रही।

डॉ. दयाल ने डायरी फिर उठाई।

दूसरे हिस्से के अंतिम पन्ने पर एक पंक्ति लिखी थी “जिसने मरीजों की बातें सुनीं, वही उनकी बातों को जानता था।” डॉ. दयाल की नजर धीरे-धीरे अपने ही हाथों पर चली गई। उन्होंने हाथ पलट, नाखूनों के नीचे हल्की मिट्टी जमी थी, उनका चेहरा बदल गया, उन्होंने अपने जूते उतारे, तलवों पर भी गीली मिट्टी चिपकी थी।

“मैं…” उन्होंने जूतों को देखते हुए कहा, फिर अचानक खिड़की की ओर देखा। “मैं आज शाम से बाहर गया ही नहीं।”

उसी क्षण तीसरा हिस्सा उनकी नजर में आया।

शीर्षक था “तीसरा हिस्सा – रात।”

डॉ. दयाल ने कुछ क्षण उस पन्ने को नहीं छुआ। फिर धीरे से उंगली बढ़ाई।

पहली पंक्ति थी “वह दिन में डॉक्टर था।”

दूसरी “रात में मरीजों के घर जाता था।”

तीसरी “सुबह उसे कुछ याद नहीं रहता था।”

डॉ. दयाल ने कुर्सी की पीठ पकड़ ली। उनकी आंखों के सामने धुंधला-सा दृश्य उभरा, एक कमरा – हल्की नीली रोशनी -बिस्तर पर सोता हुआ व्यक्ति – दरवाजे के पास खड़ा एक आदमी -उसके हाथ में सफेद रूमाल।

डॉ. दयाल ने आंखें बंद कर लीं।

“नहीं…” उन्होंने अपनी कनपटी दबाते हुए कहा, फिर जैसे किसी स्मृति को पकड़ने की कोशिश की। “मैं वहाँ नहीं था।”

अचानक उनका मोबाइल स्क्रीन जल उठा। एक संदेश आया – “आपको याद आने लगा है?” डॉ. दयाल ने कांपते हाथ से नंबर देखा।

अनजान नंबर।

उन्होंने तुरंत टाइप किया “तुम कौन हो?”

उत्तर आया “जिसे आपने अभी तक मरीज समझ रखा है।”

डॉ. दयाल ने मोबाइल मेज पर रख दिया।

तीसरे हिस्से का अगला पन्ना उन्होंने खोला। वहाँ ग्यारह रातों का विवरण था, हर रात – हर मरीज – हर घर -हर मृत्यु से पहले की गतिविधि -और हर घटना के अंत में एक ही टिप्पणी -“सुबह डॉक्टर को कुछ याद नहीं था।” डॉ. दयाल के हाथ से डायरी छूटते-छूटते बची।

उन्होंने अपनी कलाई देखी। तीन खरोंचें। फिर जूते देखे -मिट्टी- फिर कमरे की घड़ी -रात के दो बजकर तेरह मिनट “नहीं।” डॉ. दयाल ने अचानक कुर्सी पीछे कर दी।

वह उठे और कमरे में चहलकदमी करने लगे।

“मैं हत्यारा नहीं हूँ।” उन्होंने दीवार पर लगे शीशे में अपना चेहरा देखा।

कुछ क्षण तक वह स्वयं को देखते रहे।

फिर बहुत धीमे स्वर में बोले, “अगर मैं नहीं… तो कौन?”

शीशे में उनका प्रतिबिंब भी उसी क्षण होंठ हिलाता दिखाई दिया।

डॉ. दयाल पीछे हट गए।

“तुम?” उन्होंने शीशे की ओर हाथ बढ़ाया, मगर प्रतिबिंब के अतिरिक्त वहाँ कोई नहीं था।

उन्होंने तीसरा हिस्सा फिर उठाया, अंतिम पन्ने पर केवल एक नाम था -“केतन।”

उसके नीचे लिखा था -“बारहवीं रात – आज।”

डॉ. दयाल ने पन्ने पर उंगली रखी “तो तुम अगला मरीज हो।”

तभी दरवाजे पर दस्तक हुई, ठक-ठक-ठक डॉ. दयाल ने डायरी बंद की।

“कौन?” कुछ क्षण कोई आवाज नहीं आई।

फिर बाहर से केतन का स्वर सुनाई दिया “डॉक्टर… क्या मैं अंदर आ सकता हूँ?”

डॉ. दयाल ने दरवाजे की ओर देखते हुए धीरे से कहा, “हाँ।”

दरवाजा खुला और केतन भीतर आया। उसने भीगे बालों से पानी झाड़ा, दरवाजा बंद किया और सामने वाली कुर्सी पर बैठ गया।

“आपने सब पढ़ लिया?” उसने अपनी नजर डायरी पर रखते हुए पूछा।

डॉ. दयाल ने डायरी को अपनी ओर खींचा और उसकी जिल्द पर उंगलियाँ फेरते हुए कहा, “हाँ, पढ़ लिया और” उन्होंने शब्दों को चबाते हुए कहा, “अब मुझे समझ आ गया है कि तुम यहाँ क्यों आए थे।”

केतन ने अपनी भौंह थोड़ी उठाई “क्यों?”

डॉ. दयाल कुर्सी से उठे, मेज के पीछे खड़े होकर उसकी ओर देखते रहे और धीरे से बोले, “तुम्हें लगता है कि मैं हत्यारा हूँ।”

केतन ने कोई उत्तर नहीं दिया। डॉ. दयाल मेज के किनारे से बाहर आए।

“लेकिन तुम्हें एक बात नहीं मालूम।” उन्होंने उसकी ओर एक कदम बढ़ाया और अपनी उंगलियाँ मेज पर रख दीं।

“क्या?” केतन की नजर उसके हाथों पर गई।

डॉ. दयाल उसके बिल्कुल सामने जाकर रुक गए।

“हत्यारे को जब अपना राज पता चल जाता है…” उन्होंने धीमे स्वर में कहा, फिर केतन की आंखों में देखते हुए अपनी आवाज और नीचे कर दी, “तो वह गवाह को जिंदा नहीं छोड़ता।”

बारहवीं रात

केतन कुर्सी से उठ खड़ा हुआ। उसने डॉ. दयाल से दूरी बनाए रखते हुए कमरे की ओर एक नजर दौड़ाई। दरवाजा बंद था। खिड़की भीतर से बंद थी। मेज पर डायरी खुली थी और उसके पास रखा मोबाइल लगातार कंपन कर रहा था।

“आप मुझे धमका रहे हैं?” केतन ने मोबाइल की स्क्रीन पर नजर डालते हुए पूछा, फिर धीरे से उसे उल्टा कर दिया। डॉ. दयाल ने उसकी हरकत देखी और मेज के दूसरी ओर पड़े पेपर-कटर पर एक क्षण नजर डालकर वापस उसके चेहरे की ओर देखा। “नहीं, मैं तुम्हें एक आखिरी मौका दे रहा हूँ।”

“किस बात का?” केतन ने डॉ. दयाल के शब्दों में छिपी हिंसा को लक्ष्य कर पूछा।

“यहाँ से चले जाओ।” डॉ. दयाल ने डायरी बंद करते हुए कहा, फिर उसकी जिल्द पर हथेली रखी। “जो देखा है, भूल जाओ।”

केतन ने हल्की मुस्कान के साथ सिर हिलाया “अगर भूल सकता तो यहाँ आता ही क्यों?”

डॉ. दयाल ने दो कदम आगे बढ़कर पूछा, “तुम आखिर चाहते क्या हो?”

“सच।” उसके चेहरे पर हल्की सतर्क मुस्कान आई।

“सच?” डॉ. दयाल ने मेज पर उंगलियाँ रखते हुए धीरे-धीरे उसकी ओर देखा। “सच यह है कि मैं डॉक्टर हूँ, हत्यारा नहीं।”

“तो फिर यह क्या है?” केतन ने डायरी उठाई, पन्ना पलटकर उसके सामने कर दिया और अपनी उंगली डॉ. दयाल की तस्वीर पर रख दी। “ग्यारह रातों में ग्यारह जगहों पर आपकी मौजूदगी।”

डॉ. दयाल ने तस्वीर को देखा।

“यह तस्वीरें झूठी हैं।” उनकी पलकें कुछ क्षण तेजी से झपकीं।

“कैमरा झूठ नहीं बोलता।” केतन की आवाज भी तेज हो गई।

“कैमरा यह नहीं बता सकता कि मैं वहाँ क्यों था।” डॉ. दयाल का आत्मविश्वास डगमगा रहा था।

“लेकिन आप वहाँ थे।” केतन ने तस्वीर वापस डायरी में रखते हुए कहा, फिर उसकी ओर झुककर बोला, “और हर बार वही मरीज मरा।”

“मुझे याद नहीं।” डॉ. दयाल ने नजरें फेर लीं।

“मुझे पता है।” केतन ने जेब से छोटा-सा रिकॉर्डर निकाला और मेज पर रख दिया। “इसे सुनिए।”

रिकॉर्डर चालू हुआ। पहले कुछ सेकंड बारिश की आवाज आई। फिर दरवाजा खुलने की आवाज। फिर किसी व्यक्ति की धीमी सांस।

और उसके बाद डॉ. दयाल की आवाज – “सो जाइए… सुबह सब ठीक लगेगा।”

डॉ. दयाल ने रिकॉर्डर की ओर हाथ बढ़ाकर उसे बंद करना चाहा, लेकिन केतन ने उसकी कलाई पकड़ ली “अभी नहीं।”

“इसे बंद करो!” डॉ. दयाल ने हाथ छुड़ाने की कोशिश करते हुए कहा, फिर उनकी सांस तेज हो गई। “तुम नहीं जानते यह आवाज कैसे रिकॉर्ड हुई।”

“आपके अपने घर के कैमरे से।” केतन के स्वर में विश्वास की सच्चाई थी।

“मेरे घर से?” डॉ. दयाल स्थिर हो गए।

“हाँ।” केतन ने उनकी कलाई छोड़ते हुए कहा, फिर रिकॉर्डर के पास उंगली रखी। “जिस रात अनुराधा मरी थी, उसी रात आप अपने घर से निकले थे।”

“मैं सो रहा था।” डॉ. दयाल पीछे हटे।

“आप चल रहे थे।” केतन ने उतनी ही कठोरता से कहा।

“क्या?” डॉ. दयाल ने उसकी ओर देखा।

“आपको नींद में चलने की पुरानी बीमारी है।” केतन ने डायरी का तीसरा हिस्सा खोलते हुए कहा, फिर एक पन्ने पर उंगली रखी। “लेकिन पिछले एक वर्ष में यह बीमारी एक पैटर्न बन गई।”

“मैं किसी को नहीं मारता।” डॉ. दयाल घबरा गए।

“आप जागकर नहीं मारते।” केतन ने पन्ना पलटते हुए कहा, “आप सोते हुए मारते हैं।”

डॉ. दयाल ने दोनों हाथ सिर पर रख लिए।

कुछ क्षण वह उसी स्थिति में खड़े रहे।

फिर धीरे से बोले, “तो क्या मैं अपने शरीर का मालिक भी नहीं हूँ?”

“आपका शरीर आपका था।” केतन ने उनकी ओर देखा।

“और मेरा दिमाग?” उन्होंने मानों खुद से पूछा।

“वह भी।” केतन ने उनकी जगह उत्तर दिया।

“तो फिर यह सब किसने किया?” उन्होंने पुनः मानों खुद से प्रश्न किया।

“आपके भीतर के उस हिस्से ने, जिसे आपने खुद पहचानने से इनकार कर दिया।” केतन ने डायरी बंद की।

“तुम मुझे पागल साबित करना चाहते हो।” डॉ. दयाल ने धीरे-धीरे हाथ नीचे किए।

“नहीं।” केतन ने अपनी जेब से एक और चीज निकाली।

एक पारदर्शी प्लास्टिक पाउच।

उसमें सफेद रूमाल था।

डॉ. दयाल की आंखें उस पर टिक गईं।

“यह अनुराधा के कमरे से मिला था।” केतन ने पाउच मेज पर रखते हुए कहा, फिर दूसरी जेब से एक रिपोर्ट निकालकर उसके पास सरका दी। “इस पर आपकी उंगलियों के निशान हैं।”

डॉ. दयाल ने रिपोर्ट उठाई, उनकी आंखें तेजी से पंक्तियों पर दौड़ने लगीं।

“नहीं…” उनका हाथ नीचे गिर गया।

“अब भी नहीं?” केतन ने पूरी तरह शब्दों पर शिकंजा कस लिया।

“मैंने उन्हें बचाने की कोशिश की थी।” डॉ. दयाल ने सिर उठाया।

“फिर?” केतन पूरी तरह सावधान था।

“मुझे याद नहीं।” डॉ. दयाल के चेहरे पर अविश्वास के भाव आए।

“फिर भी आप उनके घर गए।” केतन ने मानों उन्हें घेर लिया।

“मुझे याद नहीं।” डॉ. दयाल की आवाज काँप गई।

“उनकी मौत के बाद पुलिस को आपने बताया कि आप उस रात घर पर थे।” केतन की आंखों में दृढ़ता झांक रही थी।

डॉ. दयाल चुप रहे।

“वह झूठ था।” कुछ पल बाद केतन ने कहा।

डॉ. दयाल ने आंखें बंद कर लीं।

“मुझे सच में कुछ याद नहीं था।”

केतन ने उसकी ओर देखते हुए कहा, “लेकिन किसी को याद था।”

“किसे?” डॉ. दयाल ने आंखें खोलीं।

केतन ने अपनी जेब से एक छोटा कैमरा निकाला और उसे मेज पर रखते हुए कहा, “मुझे।”

“तुम?” डॉ. दयाल ने कैमरे को देखा।

“हाँ, मैं।” केतन का आत्मविश्वास डॉ. दयाल के अवचेतन पर हावी हो गया था।

केतन ने कमरे की छत की ओर देखा, फिर कैमरे को उसकी दिशा में उठाया “इस कमरे में आने के बाद से जो कुछ आपने कहा है, वह सब रिकॉर्ड हो रहा है।”

“तुम मरीज नहीं हो।” डॉ. दयाल की आंखें अचानक फैल गईं।

केतन ने कुछ क्षण उसे देखा। फिर उसने अपनी जेब से पहचान-पत्र निकाला – “सीआईडी निरीक्षक केतन शर्मा।”

“सीआईडी?” डॉ. दयाल पीछे हटे।

“छह महीने से।” केतन ने सच बताया।

“तुमने मुझसे इलाज क्यों कराया?” डॉ. दयाल को खुद के सवाल पर विश्वास नहीं हुआ।

केतन ने पहचान-पत्र वापस जेब में रखते हुए कहा, “क्योंकि हमें शक था कि शहर में हो रही आत्महत्याओं के पीछे कोई ऐसा व्यक्ति है जो मृतकों की मानसिक अवस्था को पहले से जानता था।”

केतन ने डायरी उठाई – “प्रमाण नहीं था।”

“तो यह डायरी?” डॉ. दयाल की नजर डायरी पर टिक गई।

“आपके घर से मिली।” केतन ने सरलता मिश्रित सावधानी से कहा।

“क्योंकि मैं चाहता था कि आप खुद पढ़ें।” केतन ने डायरी का पहला पन्ना खोला और उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा।

“क्या?” डॉ. दयाल ने पन्ने को देखा। “अपनी ही लिखावट।”

डॉ. दयाल की उंगलियाँ काँपने लगीं। केतन ने पन्ना उसके सामने रखा। हर पन्ने पर अलग-अलग मरीजों के विवरण थे। हर विवरण के नीचे डॉ. दयाल के हस्ताक्षर जैसी लिखावट।

डॉ. दयाल ने धीरे से कहा, “मैंने यह कब लिखा?”

“हर हत्या के बाद।” केतन फिर मुस्कुराया।

“लेकिन मुझे याद नहीं।” डॉ. दयाल मानों अब खुद से लड़ने लगे।

“इसीलिए हमने आपको पकड़ने में छह महीने लगाए।” केतन ने दृढ़ता से कहा।

डॉ. दयाल ने अचानक डायरी झटके से बंद कर दी “अगर तुम्हारे पास सबूत था तो मुझे गिरफ्तार क्यों नहीं किया?”

“क्योंकि हमें आखिरी प्रमाण चाहिए था।” केतन ने एक क्षण उसकी ओर देखा। “आपकी अपनी स्वीकारोक्ति।”

“क्या?” डॉ. दयाल ने उसकी ओर देखा।

फिर उसके चेहरे पर धीरे-धीरे एक अजीब-सी मुस्कान आई।

“और अब?”

“अब आप गिरफ्तार हैं।” डॉ. दयाल अचानक मेज की ओर झपटे। पेपर-कटर उनकी मुट्ठी में आ गया। “तो तुम बारहवाँ मरीज नहीं हो!”

“नहीं।” केतन पूरी तरह सतर्क था।

“तुम पुलिस हो!” डॉ. दयाल का स्वर हिंसक हो गया।

“हाँ।” केतन हर स्थिति के लिए तैयार था।

डॉ. दयाल ने पेपर-कटर उठाया और उसकी ओर बढ़े।

“तुमने मुझे धोखा दिया।”

“आपने ग्यारह परिवारों को धोखा दिया।” केतन पीछे हटते हुए मेज के कोने से टकराया।

“चुप!” डॉ. दयाल ने हाथ उठाया।

केतन ने उसकी कलाई पकड़ ली। कुछ क्षण दोनों के बीच संघर्ष हुआ। पेपर-कटर फर्श पर गिरा। केतन ने डॉ. दयाल का हाथ मोड़ा और उसे मेज पर झुका दिया।

“हाथ पीछे!” काबू करते हुए केतन ने दृढ़ता से कहा।

“मुझे छोड़ो!” डॉ. दयाल ने छूटने की कोशिश की।

“हाथ पीछे!” केतन ने हथकड़ी निकालकर उसकी दोनों कलाइयाँ जोड़ दीं।

क्लिक।

कमरे में कुछ क्षण केवल दोनों की तेज सांसें सुनाई देती रहीं।

“इंस्पेक्टर…” डॉ. दयाल ने धीरे-धीरे सिर उठाया।

केतन ने हथकड़ी की पकड़ जांचते हुए पूछा, “क्या?”

“अगर मैं हत्यारा हूँ…” उन्होंने फर्श पर पड़ी डायरी की ओर देखा। “तो यह आखिरी पन्ना किसने लिखा?”

केतन ने डायरी उठाई।

आखिरी पन्ने पर लिखा था “बारहवीं हत्या रोक दी गई।”

उसके नीचे “हत्यारा गिरफ्तार।”

केतन ने पन्ने को गौर से देखा। फिर अचानक उसकी उंगली तीसरी पंक्ति पर ठहर गई।

वहाँ अभी-अभी लिखे गए शब्द दिखाई दे रहे थे “लेकिन हत्यारे को यह मत बताना कि अगला नाम कौन है।”

केतन का चेहरा गंभीर हो गया। उसने डॉ. दयाल की ओर देखा।
“यह किसने लिखा?”

“मैंने नहीं।” डॉ. दयाल ने पहली बार हथकड़ी लगे हाथों को उठाकर डायरी की ओर देखा।

बाहर बारिश फिर तेज हो चुकी थी।

खिड़की का पर्दा हवा से उठकर मेज पर आ गिरा। केतन ने पर्दा हटाया और खिड़की के बाहर देखा। सड़क पर कोई नहीं था। वह वापस मुड़ा। डॉ. दयाल उसी कुर्सी पर बैठा था। लेकिन उसके सामने डायरी खुली थी।

“इसे किसने खोला?” केतन तेजी से उसकी ओर बढ़ा।

डॉ. दयाल ने कांपती आवाज में कहा, “मैंने नहीं।”

केतन ने पन्ना पलटा।

एक नई पंक्ति दिखाई दी “डॉ. दयाल हत्यारा था।”

उसके नीचे दूसरी पंक्ति थी “लेकिन वह अकेला नहीं था।”

केतन की उंगलियाँ डायरी पर जम गईं।

तभी उसके मोबाइल पर संदेश आया।

उसने स्क्रीन देखी – “इंस्पेक्टर केतन शर्मा, बारहवीं मौत रोकने के लिए धन्यवाद।”

केतन ने कुछ क्षण संदेश पढ़ा।

फिर दूसरा संदेश आया – “अब तेरहवीं रात के लिए तैयार रहिए।”

केतन ने धीरे-धीरे सिर उठाया। डॉ. दयाल उसे देख रहा था।

“किसका संदेश है?” डॉ. दयाल ने हथकड़ी लगे हाथ मेज पर रखते हुए पूछा।

केतन ने मोबाइल बंद कर दिया।

“किसी ऐसे व्यक्ति का…” उसने डायरी को अपनी छाती के पास उठाते हुए कहा, “जिसे हमारे बारे में हमसे ज्यादा पता है।”

बाहर पुलिस की गाड़ी का सायरन सुनाई दिया।

दो अधिकारी दरवाजा खोलकर भीतर आए और डॉ. दयाल को अपने साथ ले जाने लगे।

“इंस्पेक्टर।” दरवाजे तक पहुँचकर डॉ. दयाल ने पीछे मुड़कर डायरी को देखा।

“हाँ?” केतन ने उसकी ओर देखा।

डॉ. दयाल ने होंठों पर हल्की, थकी हुई मुस्कान लाते हुए कहा, “मैंने ग्यारह लोगों को मारा था… यह सच है।” वह एक क्षण रुके। “लेकिन डायरी मैंने नहीं लिखी थी।”

पुलिस अधिकारी उन्हें लेकर बाहर निकल गए।

दरवाजा बंद हो गया। केतन अकेला कमरे में रह गया। उसने धीरे-धीरे डायरी खोली।

आखिरी पन्ने पर अब एक और वाक्य जुड़ चुका था “पहचान छिपाने वाला हत्यारा पकड़ा गया।”

और उसके नीचे “अब पहचान बताने वाला कौन है?”

केतन ने डायरी बंद कर दी। उसी क्षण कमरे के बाहर किसी के कदमों की आवाज सुनाई दी।

एक…

दो…

तीन…

कदम उसके दरवाजे के ठीक बाहर आकर रुक गए। केतन ने सिर उठाया। दरवाजे की कुंडी धीरे-धीरे नीचे होने लगी। उसकी उंगलियाँ अनायास कमर पर रखी पिस्तौल की ओर गईं।

दरवाजा खुला।

बाहर कोई नहीं था।

केवल फर्श पर एक नया लिफाफा पड़ा था।

केतन ने झुककर उसे उठाया।

लिफाफे पर सिर्फ चार शब्द लिखे थे

“अगला मरीज आपका इंतजार कर रहा है।” केतन ने लिफाफा खोला। अंदर एक तस्वीर थी।

तस्वीर में वह स्वयं था, तस्वीर के पीछे लिखी तारीख आज की थी।

उसने धीरे-धीरे तस्वीर नीचे की। मेज पर पड़ी डायरी का आखिरी पन्ना अपने आप पलटा।

और उस पर एक नया नाम उभर आया “केतन शर्मा।”

पवनेश

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