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गुलाबी लिपिस्टिक

अस्वीकरण

(यह कहानी पूर्णतः काल्पनिक है। इसमें प्रयुक्त पात्र, स्थान, संगठन, घटनाएँ और परिस्थितियाँ रचनात्मक कल्पना पर आधारित हैं। कहानी में नक्सलवाद, हिंसा और उससे जुड़े जीवन का चित्रण किसी भी प्रकार से उग्रवाद अथवा हिंसा के समर्थन या महिमामंडन के लिए नहीं किया गया है। इसका उद्देश्य हिंसा की छाया में खोए बचपन, स्त्री के संघर्ष, मानसिक आघात, आत्मसमर्पण, पुनर्वास और सामान्य जीवन की ओर लौटती मानवीय आकांक्षा को अभिव्यक्त करना है।)

दर्पण के सामने

शाम के लगभग साढ़े पांच बज चुके थे।

पुनर्वास प्रशिक्षण केंद्र का ब्यूटी-केयर कक्ष दिनभर की हलचल के बाद धीरे-धीरे शांत हो रहा था।

टेबल पर रखी कंघियाँ धुलकर एक स्टील की ट्रे में सलीके से रखी थीं। हेयर-ब्रश के पास छोटी-छोटी काँच की शीशियाँ कतार में खड़ी थीं। कोने में रखा हेयर ड्रायर अभी-अभी बंद हुआ था, इसलिए कमरे में उसकी गर्म हवा की हल्की गंध अब भी ठहरी हुई थी।

खिड़की पर लगे हल्के नीले पर्दे को बाहर से आती हवा बार-बार फुला रही थी।

सीमा ने रजिस्टर बंद किया और कुर्सी पीछे सरकाई।

“चलो लड़कियों, आज के लिए इतना ही।”

दो प्रशिक्षु महिलाएँ अपना सामान समेटते हुए उठीं।

“सीमा दीदी, कल फेस क्लीनिंग फिर से कराएँगी?”

सीमा ने मुस्कुराते हुए हाँ में सिर हिलाया।

“हाँ, लेकिन इस बार हाथ हल्का रखना। त्वचा पर जोर नहीं।”

एक लड़की ने अपना दुपट्टा कंधे पर डालते हुए कहा

“मैं तो कल भी ग्राहक की जगह गुड़िया पर अभ्यास करूँगी।”

सब हँस पड़ीं।

झिमली भी हल्का-सा मुस्कुराई।

उसकी मुस्कान क्षणभर के लिए आई और फिर जैसे कहीं भीतर लौट गई।

सीमा ने उसकी ओर देखा।

“तुम नहीं चल रही?”

झिमली ने मेज पर रखे ब्रशों को एक-एक करके सीधा करते हुए कहा

“बस… ये रख देती हूँ।”

“ठीक है। ज्यादा देर मत करना।”

सीमा ने दरवाजे की ओर कदम बढ़ाए, फिर पलटकर बोली

“और हाँ, आज पहला दिन था। अच्छा किया तुमने।”

झिमली ने उसकी ओर देखा।

उसकी पलकें दो-तीन बार तेजी से झपकीं।

“सच?”

“बिल्कुल।”

सीमा मुस्कुराई और बाहर चली गई।

दरवाजा धीरे से बंद हो गया।

कमरे में अब केवल घड़ी की टिक-टिक थी।

झिमली ने आखिरी ब्रश ट्रे में रखा।

फिर उसकी नजर सामने रखी लिपिस्टिकों की छोटी-सी पंक्ति पर पड़ी।

उसकी उँगलियाँ वहीं रुक गईं।

गुलाबी रंग की एक लिपिस्टिक बाकी से थोड़ी अलग थी।

उसने उसे उठाया।

कुछ क्षण तक ढक्कन पर उँगली फेरती रही।

फिर खिड़की की ओर देखा।

बाहर पुनर्वास केंद्र के आँगन में दो महिलाएँ कपड़े सुखाने की रस्सी समेट रही थीं।

कहीं दूर से प्रेशर कुकर की सीटी सुनाई दी।

झिमली ने गहरी साँस ली।

धीरे-धीरे दर्पण के सामने जाकर खड़ी हो गई।

उसने अपने चेहरे को देखा।

दर्पण में एक लगभग अट्ठाईस वर्ष की युवती थी।

चेहरे पर उम्र से अधिक थकान थी।

आँखों के नीचे हल्की कालिमा।

बाल सलीके से बँधे हुए।

और उन आँखों के भीतर जैसे तेईस वर्षों की कोई लंबी, अंधेरी यात्रा ठहरी हुई थी।

उसने लिपिस्टिक खोली।

हाथ काँपा।

वह रुक गई।

फिर उसने धीरे से निचले होंठ पर गुलाबी रंग लगाया।

ऊपरी होंठ पर लगाया।

लिपिस्टिक बंद की।

दर्पण में खुद को देखा।

उसकी पलकें स्थिर हो गईं।

कुछ क्षण बाद होंठ काँपे।

आँखों में पानी भर आया।

एक आँसू नीचे उतरा।

फिर दूसरा।

झिमली ने जल्दी से उसे पोंछना चाहा, लेकिन हाथ गाल तक पहुँचने से पहले ही काँप गया।

वह फूट पड़ी।

दोनों हाथों से चेहरा ढककर रोने लगी।

दरवाजे के बाहर कदमों की आवाज आई।

“झिमली?”

झिमली ने तुरंत चेहरा पोंछा।

सीमा दरवाजे पर खड़ी थी।

उसके पीछे दो प्रशिक्षु भी झाँक रही थीं।

“क्या हुआ?”

झिमली ने सिर झुका लिया।

“कुछ नहीं।”

सीमा ने धीरे से कमरे में कदम रखा।

पर्दा हवा के झोंके से फिर फड़फड़ाया।

सीमा ने उसे देखा, फिर झिमली के चेहरे की ओर।

“कुछ नहीं है तो आँखें इतनी लाल क्यों हैं?”

झिमली ने पलकें झपकाईं और नजरें दर्पण से हटा लीं।

“बस… आँख में कुछ चला गया था।”

एक प्रशिक्षु ने मुस्कुराते हुए कहा—

“दोनों आँखों में?”

झिमली के होंठों पर क्षीण-सी मुस्कान आई, मगर वह तुरंत बुझ गई।

सीमा ने उसके पास आकर उसका हाथ पकड़ लिया।

“सच बताओ।”

झिमली की उँगलियाँ सीमा की हथेली में सिकुड़ गईं।

उसने धीरे से अपना दूसरा हाथ खोला।

गुलाबी लिपिस्टिक दिखाई दी।

एक प्रशिक्षु ने आश्चर्य से कहा

ओह! तुमने लिपिस्टिक लगाई है?”

झिमली ने सिर हिलाया।

“हाँ।”

“तो इसमें रोने वाली क्या बात है?”

झिमली ने दर्पण की ओर देखा।

उसकी आँखें फिर भर आईं।

“मैंने…”

वह रुक गई।

पलकें झपकाईं।

“मैंने आज पहली बार लिपिस्टिक लगाई है।”

सीमा कुछ क्षण चुप रही।

“पहली बार?”

झिमली ने हल्के से सिर हिलाया।

“हाँ।”

“लेकिन तुम इतनी भावुक क्यों हो गईं?”

झिमली ने लिपिस्टिक को अपनी मुट्ठी में बंद कर लिया।

“क्योंकि…”

बाहर से किसी वाहन के गुजरने की आवाज आई।

वह अनायास खिड़की की ओर देखने लगी।

फिर बहुत धीमे से बोली

“इसे लगाने का सपना मैंने पाँच साल की उम्र में देखा था।”

कमरे में अचानक चुप्पी छा गई।

सीमा ने उसकी उँगलियाँ और कसकर पकड़ लीं।

“पांच साल से अभी तक कभी नहीं, ऐसा क्यों?”

झिमली ने दर्पण में अपने गुलाबी होंठ देखे।

“बताऊँगी…”

उसकी आवाज काँपी।

“लेकिन यह कहानी लिपिस्टिक से शुरू नहीं होती।”

उसने धीरे से कुर्सी खींची।

“मेरी कहानी… एक हाट से शुरू होती है।”
******************************

तेईस वर्ष

सीमा ने उसके सामने पानी का गिलास रख दिया।

“पहले पानी पी लो।”

झिमली ने गिलास उठाया।

गिलास उसके होंठों से लगा, लेकिन पीने से पहले ही वह कुछ क्षण ठहर गई।

फिर दो घूँट पानी पिया।

बाहर गलियारे में किसी महिला के चप्पलों की आवाज आई और धीरे-धीरे दूर चली गई।

झिमली ने गिलास दोनों हाथों से पकड़ लिया।

“मैं पाँच साल की थी।”

सीमा ने सिर हिलाया।

“हमारा गाँव जंगल के किनारे था।”

“घर मिट्टी का था। बरसात में दीवारें गीली हो जाती थीं।”

“माँ महुआ बीनती थी। पिता खेतों में मजदूरी करते थे।”

एक प्रशिक्षु ने पूछा

“तुम्हारे घर में और कौन था?”

झिमली ने आँखें झपकाईं।

“बस माँ, पिता और मैं।”

उसकी उँगली गिलास के किनारे पर घूमने लगी।

“एक दिन माँ मुझे साप्ताहिक हाट ले गई थी।”

खिड़की का पर्दा फिर हवा से हिला।

“वहाँ बहुत भीड़ थी।”

“कहीं गरम पकौड़ियों की खुशबू आ रही थी। कहीं गुड़ के ढेले रखे थे।”

“मैं माँ की साड़ी का पल्लू पकड़े चल रही थी।”

झिमली के चेहरे पर पहली बार बचपन की चमक आई।

“तभी मैंने एक महिला को देखा।”

सीमा आगे झुक गई।

“उसके होंठ गुलाबी थे।”

झिमली ने अपनी उँगली से अपने होंठ छुए।

“मैं उसे देखती रह गई।”

“फिर?”

“मैंने माँ से पूछा ‘माँ, उसके होंठ ऐसे कैसे हैं?'”

झिमली के होंठों पर हल्की मुस्कान आई।

माँ ने कहा था ‘लिपिस्टिक लगाई है।’

मैंने पूछा ‘मेरे भी ऐसे होंगे?’

माँ हँस पड़ी।

झिमली ने आँखें बंद कर लीं।

‘बड़ी हो जाएगी तब लगा लेना।’

उसने धीरे से आँखें खोलीं।

बस… मैंने उसी दिन तय कर लिया था कि बड़ी होकर गुलाबी लिपिस्टिक लगाऊँगी।

एक क्षण बाद उसकी मुस्कान गायब हो गई।

लेकिन मैं बड़ी अपने घर में नहीं हुई।

कमरे में किसी ने साँस तक नहीं ली।

झिमली ने गिलास नीचे रखा।

कुछ ही समय बाद हमारे गाँव के आसपास ‘लालवन जनमुक्ति दस्ता’ नक्सली गुट का प्रभाव बढ़ गया था।

“एक रात कुछ लोग हमारे घर आए।”

उसकी उँगलियाँ काँपने लगीं।

“उन्होंने मेरे माता-पिता पर पुलिस का मुखबिर होने का आरोप लगाया।”

सीमा ने धीरे से पूछा

और?

झिमली की आवाज बहुत धीमी हो गई।

“अगली सुबह माँ और पिता दोनों नहीं थे।”

उसने कुछ क्षण होंठ भींचे।

“मुझे उनके साथ जाना पड़ा।”

“उस समय तुम पाँच साल की थीं?” किसी ने पूछा

“हाँ।”

“तेईस साल पहले की वह रात…”

झिमली ने सिर उठाकर सीमा की ओर देखा।

“तेईस साल…”

उसने जैसे खुद से कहा।

“मैं तेईस साल उस दुनिया में रही।”

बाहर से किसी ने बरामदे में बाल्टी रखी।

धातु की हल्की खनक कमरे में गूँजी।

झिमली ने एक पल के लिए उस आवाज की ओर देखा।

फिर बोली

“पहले मुझे लगता था कि वे मुझे किसी दिन माँ के पास वापस छोड़ देंगे।”

“फिर धीरे-धीरे समझ आया कि ऐसा कुछ नहीं होने वाला।”

“जंगल ही घर था।”

“रात का अँधेरा ही छत था।”

“और डर…”

वह रुक गई।

“डर रोज का साथी।”

एक प्रशिक्षु ने पूछा

“तुम्हें वहाँ सबसे मुश्किल क्या लगता था?”

झिमली ने तुरंत उत्तर नहीं दिया।

उसने अपनी चूड़ियों को देखा।

फिर एक-एक करके उन्हें उँगली से छुआ।

“लड़की होना।”

सीमा ने उसकी ओर देखा।

झिमली ने कहा

“वहाँ कोई यह नहीं पूछता था कि तुम्हें दर्द हो रहा है या नहीं।”

“थकी हो तो भी चलना था।”

“बीमार हो तो भी खुद को संभालना था।”

“डर लग रहा हो तो चेहरा सीधा रखना था।”

“उन दिनों में सबसे ज्यादा मुश्किल होती थी।”

“न घर था, न माँ थी, न कोई अपना।”

उसकी आवाज भर्रा गई।

“कई बार मुझे याद आता था कि माँ कैसे मेरे बालों में तेल लगाती थी।”

उसने अपने बालों को छुआ।

“मैं जंगल में बैठकर अपने बालों को खुद ही सुलझाती थी।” एक पल के लिए वह रुकी “और जब सुलझाना संभव नहीं हुआ तब अपना सर मुंडवा लिया।”

एक आँसू उसकी ठुड्डी तक आ गया।

सीमा ने धीरे से उसका हाथ पकड़ लिया।

झिमली ने हाथ नहीं हटाया।

“कभी किसी मेले की आवाज दूर से सुनाई देती थी तो मन करता था दौड़कर चली जाऊँ।”

“कभी किसी औरत को रंगीन साड़ी में देखती तो सोचती थी—क्या सचमुच ऐसी जिंदगी होती है?”

“कभी किसी बच्चे की हँसी सुनती तो…”

वह रुक गई।

“तो क्या?”

“तो मुझे अपना बचपन याद आता था।”

कमरे के बाहर हवा तेज हुई।

पर्दा भीतर की ओर फूला और फिर धीरे से गिर गया।

झिमली ने उसे देखा।

“मुझे सबसे ज्यादा डर किस चीज से लगता था, जानते हैं?” उसने अपनी आंखों को ऊपर उठाया।

सबने सिर हिलाया।

“अपने मन से।”

“क्यों?”

“क्योंकि मन कभी-कभी घर जाना चाहता था।”

“माँ को पुकारना चाहता था।”

“सजना चाहता था।”

“हँसना चाहता था।”

“और वहाँ इन इच्छाओं की कोई जगह नहीं थी।”

सीमा की आँखों में भी आँसू थे।

“फिर तुमने आत्मसमर्पण करने का फैसला कैसे किया?”

झिमली ने कुछ देर खिड़की के बाहर देखा।

आँगन में दो महिलाएँ कपड़े तह कर रही थीं।

एक महिला दूसरी के बालों में तेल लगा रही थी।

झिमली उन्हें देखती रही।

“एक दिन मैंने देखा…”

“यहाँ आने से पहले?”

“हाँ।”

“एक माँ अपनी छोटी बेटी के बाल बना रही थी।”

“लड़की बार-बार सिर हिला रही थी और माँ उसे डाँटने के बजाय हँस रही थी।”

झिमली की आँखों में वह दृश्य ठहर गया।

“उस दिन मुझे लगा…”

“मेरी माँ ने भी शायद कभी मेरे बाल इसी तरह बनाए होंगे।”

“और मैं…”

उसने अपनी हथेली देखी।

“मैं तेईस साल से अपने ही जीवन से दूर भाग रही थी।”

“तब मैंने तय किया कि अगर जिंदगी में लौटने का एक मौका भी है…”

“तो मुझे उसे पकड़ना होगा।”

सीमा ने पूछा

“और यहाँ आने के बाद?”

झिमली की आवाज में पहली बार हल्की गर्माहट आई।

यहाँ पहली बार किसी ने मुझसे पूछा—’तुम क्या सीखना चाहती हो?’

वह मुस्कुराई।

मुझे लगा, यह भी कोई सवाल है?”

एक प्रशिक्षु हँस पड़ी।

“फिर तुमने क्या कहा?”

झिमली ने सामने रखे ब्रश को उठाकर देखा।

“मुझे नहीं पता था।”

“फिर?”

प्रशिक्षण केंद्र में पहले दिन हमें अलग-अलग काम दिखाए गए।

सिलाई।

कढ़ाई।

अगरबत्ती मोमबत्ती बनाना।

बाँस का काम।

कंप्यूटर।

खाना बनाने और छोटे उद्यम का प्रशिक्षण।

स्वास्थ्य और परामर्श सत्र।

बैंक खाता चलाना।

दस्तावेज समझना।

और ब्यूटी-केयर।

उसने ब्रश को मेज पर रख दिया।

“मैंने यही चुना।”

सीमा मुस्कुराई।

“क्यों?”

झिमली ने लिपिस्टिक की ओर देखा।

“शायद इसलिए…क्योंकि मेरे भीतर पाँच साल की एक लड़की अभी भी बैठी थी।”

कमरे में हल्की हँसी फैल गई।

तभी गलियारे से आवाज आई—

“झिमली!. . . . “

वह अचानक चौंकी।

एक पल के लिए उसकी गर्दन दरवाजे की ओर घूम गई।

अटेंडर दरवाजे पर खड़ा था।

“हाँ?”

झिमली ने धीमे से पूछा।

अटेंडर ने कहा

आपसे कोई मिलने आया है।”

झिमली की भौंहें सिकुड़ गईं।

“कौन?”

अटेंडर ने सिर हिलाया।

“नाम नहीं बताया गया है। लेकिन उनके पास केंद्र का सत्यापित आगंतुक बैज है। सुरक्षा डेस्क ने पहचान सत्यापित करके भेजा है।”

झिमली कुछ क्षण चुप रही।

उसकी उँगलियाँ लिपिस्टिक पर कस गईं।

“मेरे लिए?”

जी।”

अटेंडर ने रास्ता छोड़ दिया।

“आप चाहें तो पहले महिला अधिकारी के साथ मिल सकती हैं।”

झिमली ने सीमा की ओर देखा।

सीमा ने उसका हाथ थाम लिया।

“मैं साथ चलूँ?”

झिमली ने धीरे से सिर हिलाया।
************************************

आपकी झिमली बड़ी हो गई

अतिथि कक्ष के बाहर सुरक्षा डेस्क पर रजिस्टर खुला था।

अटेंडर ने अपनी पहचान-पट्टी ठीक करते हुए कहा

“आगंतुकों की एंट्री हो चुकी है। सत्यापन भी हो गया है।”

सीमा ने सिर हिलाया।

“ठीक है।”

दरवाजा खोला गया।

झिमली ने अंदर कदम रखा।

एक वृद्ध पुरुष कुर्सी से उठने की कोशिश कर रहा था।

उसके बाल लगभग सफेद हो चुके थे।

बगल में एक महिला बैठी थी।

उसके हाथ में कपड़े का छोटा-सा बैग था।

झिमली ने दोनों को देखा।

पहले उसकी भौंहें सिकुड़ीं।

फिर आँखें फैल गईं।

उसके होंठों से बहुत धीमी आवाज निकली “मामा…?”

वृद्ध पुरुष वहीं ठिठक गया।

“०झिमली…”

उस आवाज ने जैसे तेईस वर्षों के बंद दरवाजे एक साथ खोल दिए।

झिमली की पलकें तेजी से झपकीं।

वह दो कदम आगे बढ़ी।

“मामी…?”

महिला कुर्सी से उठ चुकी थीं।

“हाँ बेटी…”

झिमली कुछ क्षण उन्हें देखती रही।

फिर अचानक दौड़कर मामा से लिपट गई।

“मामा…”

मामा ने काँपते हाथों से उसके सिर को पकड़ लिया।

“मेरी बच्ची…”

झिमली फूट पड़ी।

“आपने मुझे ढूँढा था?”

मामा ने उसकी पीठ थपथपाई।

“तेईस साल…”

उनकी आवाज भर्रा गई।

“तेईस साल से।”

झिमली ने सिर उठाया।

आँखों से आँसू लगातार बह रहे थे।

“मुझे लगा…”

उसने पलकें झपकाईं।

“मुझे लगा सबने मुझे भूल दिया होगा।”

मामी ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“परिवार अपने बच्चों को नहीं भूलता।”

झिमली ने उनकी हथेली को दोनों हाथों में थाम लिया।

“मामी…”

“हाँ बेटी?”

“आप वैसी ही बोलती हैं।”

मामी की आँखों में आँसू आ गए।

“और तू अभी भी वैसी ही आँखों से देखती है।”

झिमली हल्का-सा मुस्कुराई।

तभी मामी ने अपने कपड़े के बैग की ओर हाथ बढ़ाया।

“तेरे लिए कुछ लाई हूँ।”

झिमली ने आँखें पोंछते हुए पूछा

“क्या?”

मामी ने बैग खोला।

अंदर से एक छोटी-सी गुलाबी लिपिस्टिक निकाली।

झिमली उसे देखते ही चुप हो गई।

उसकी उँगलियाँ हवा में ही ठहर गईं।

“यह…”

मामी ने उसे उसकी हथेली पर रख दिया।

“तेरी माँ की याद है।”

झिमली ने लिपिस्टिक को देखा।

फिर मामी को।

“आपको याद था?”

मामी ने सिर हिलाया।

“तेरी माँ ने हाट से लौटकर मुझे बताया था।”

“क्या?”

“कि मेरी झिमली ने आज गुलाबी लिपिस्टिक देखी है।”

मामी मुस्कुराईं।

“और वह बड़ी होकर वही लगाएगी।”

झिमली ने लिपिस्टिक को सीने से लगा लिया।

उसकी आँखें बंद हो गईं।

“माँ को याद था…”

“माँ को अपनी बेटी की छोटी-सी इच्छा भी याद रहती है बेटी।”

मामा ने काँपती आवाज में कहा

“और आज हम उसे पूरा होते देखने आए हैं।”

झिमली ने आँसू पोंछे।

“अभी?”

मामी मुस्कुराईं।

“अभी।”

सीमा ने पास रखे दर्पण की ओर इशारा किया।

“चलो।”

झिमली धीरे-धीरे दर्पण के सामने गई।

मामा और मामी पीछे खड़े थे।

उसने लिपिस्टिक खोली।

इस बार उसकी उँगलियाँ बिल्कुल स्थिर थीं।

उसने अपने होंठों पर गुलाबी रंग लगाया।

फिर दर्पण में खुद को देखा।

मामी ने पीछे से पूछा

“कैसी लग रही है?”

झिमली मुस्कुराई।

“माँ जैसी?”

मामी ने आँखें पोंछते हुए कहा

नहीं, माँ की बेटी जैसी।”

झिमली हँस पड़ी।

उसकी हँसी कमरे में फैल गई।

बाहर से किसी महिला की आवाज आई

“चाय रख दूँ?”

सीमा ने मुस्कुराकर कहा

हाँ, चार कप।”

चाय के कप आए।

भाप ऊपर उठी।

मामा ने कप उठाया।

“अब क्या करेगी बेटी?”

झिमली ने चाय का कप दोनों हाथों से थाम लिया।

“सीखूँगी।”

“फिर?”

“काम करूँगी।”

“फिर?”

उसने दर्पण में खुद को देखा।

“एक दिन अपना ब्यूटी पार्लर खोलूँगी।”

मामा मुस्कुराए।

“नाम?”

झिमली ने अपनी गुलाबी लिपिस्टिक की ओर देखा।

“गुलाबी लिपिस्टिक।”

मामी ने हँसते हुए कहा

“तेरी माँ को बहुत पसंद आता।”

झिमली ने चाय का कप नीचे रखा।

“माँ को बताऊँगी।”

मामा ने उसकी ओर देखा।

“कैसे?”

झिमली ने खिड़की के बाहर देखा।

आसमान में शाम का नीला रंग गहराने लगा था।

“आसमान से।”

उस रात भोजन के बाद पुनर्वास केंद्र धीरे-धीरे शांत हो गया।

कमरों की बत्तियाँ एक-एक करके बुझने लगीं।

आँगन में लगे पीले बल्ब के नीचे कुछ पतंगे चक्कर काट रहे थे।

झिमली अकेली बाहर आकर खड़ी हो गई।

उसने आसमान की ओर देखा।

हल्की हवा उसके बालों को छूकर निकल रही थी।

उसने अपने गुलाबी होंठों पर उँगली रखी।

“माँ…”

आवाज बहुत धीमी थी।

“पिताजी…”

आँखें बंद करते ही जैसे वर्षों पुराना आँगन सामने आ गया।

माँ की गोद।

पिता की उँगली।

साप्ताहिक हाट।

गुलाबी होंठों वाली वह अनजान महिला।

और पाँच साल की वह बच्ची।

झिमली ने ऊपर देखते हुए कहा—

“देख रहे हो न?”

हवा ने उसके बालों को फिर छुआ।

“माँ, मैंने लगा ली।”

उसके होंठ मुस्कुराए।

“वही गुलाबी लिपिस्टिक।”

एक आँसू गाल पर उतर आया।

“जिसके लिए तुमने कहा था—बड़ी होकर लगाना।”

वह हँसी और रोई एक साथ।

“बहुत देर हो गई माँ…”

कुछ पल बाद उसने आसमान की ओर दोनों हाथ उठा दिए।

पवनेश

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