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मशीन और इंसान

(यह कहानी पूर्णतः काल्पनिक एवं साहित्यिक रचना है। इसमें वर्णित सभी पात्र, घटनाएँ, परिस्थितियाँ, संवाद एवं स्थान लेखक की रचनात्मक कल्पना पर आधारित हैं। किसी वास्तविक व्यक्ति, समुदाय, घटना अथवा स्थान से इसकी समानता मात्र संयोग मानी जाए।

कहानी में प्रस्तुत विभिन्न पात्रों के विचार और दृष्टिकोण उनके काल्पनिक चरित्रों तथा कथा-परिस्थिति को अभिव्यक्त करते हैं; इन्हें लेखक अथवा किसी वर्ग, समुदाय या संस्था के वास्तविक विचार नहीं माना जाना चाहिए।

इस रचना का उद्देश्य केवल साहित्यिक मनोरंजन के साथ मानवीय दृष्टि, पूर्वधारणा और सत्य को देखने की हमारी प्रवृत्ति पर विचार करना है। किसी व्यक्ति अथवा समूह की भावनाओं को आहत करना इसका उद्देश्य नहीं है।)

 

वर्ष 3048।

शाम का समय 

महानगर की ऊँची-ऊँची इमारतों के बीच सूर्य अपनी अंतिम किरणें बिखेर रहा था। काँच की दीवारों से छनकर आती सुनहरी रोशनी उस विशाल कार्यालय को किसी आधुनिक मंदिर जैसा आभास दे रही थी।

कमरे के एक ओर अत्याधुनिक कृत्रिम बुद्धिमत्ता की प्रयोगशाला थी और दूसरी ओर एक छोटा-सा पुस्तकालय, जिसमें वेदों से लेकर आधुनिक भौतिकी, दर्शन, मनोविज्ञान, साहित्य और चिकित्सा तक की पुस्तकें सजी थीं।

तीस वर्षीया प्रेरिता अपनी कुर्सी से उठी और खिड़की के पास जाकर बाहर देखने लगी।

उसके चेहरे पर आत्मविश्वास था, लेकिन आँखों में हल्की घबराहट।

आज वह अपने माता-पिता को एक ऐसा सच बताने वाली थी, जिसे सुनकर शायद उनकी दुनिया कुछ देर के लिए रुक जाए।

दरवाजा खुला।

“प्रेरिता!”

माँ की आवाज सुनते ही वह मुड़ी।

“आइए माँ… पापा भी आ गए?”

पिता मुस्कुराते हुए भीतर आए।

“हाँ बेटी। तूने फोन पर कहा था कि आज कोई बहुत महत्वपूर्ण व्यक्ति हमसे मिलने वाला है। हमने सोचा शायद कोई बड़ा उद्योगपति होगा, कोई वैज्ञानिक होगा या…”

माँ ने बात काट दी

“या फिर कोई ऐसा युवक होगा जिसे हमारी बेटी ने हमसे छिपाकर रखा है।”

प्रेरिता के चेहरे पर मुस्कान आ गई।

“माँ, युवक तो है… लेकिन जैसा आप सोच रही हैं, वैसा नहीं।”

माँ ने तुरंत उसकी आँखों में देखा।

“क्या मतलब?”

प्रेरिता ने कमरे के दूसरे छोर की ओर देखा।

वहाँ एक व्यक्ति खड़ा था।

करीब छह फुट दो इंच लंबा, गौरवर्ण, शांत मुखाकृति, गहरी और अत्यंत सहज आँखें, सादा लेकिन सुरुचिपूर्ण वस्त्र।

वह इतना स्वाभाविक दिखाई देता था कि पिता ने पहली दृष्टि में उसे मनुष्य ही समझा।

वह आगे बढ़ा।

दोनों हाथ जोड़कर बोला

“नमस्कार। आप दोनों से मिलकर मुझे बहुत प्रसन्नता हो रही है।”

पिता ने सहजता से कहा—

“नमस्कार बेटा।”

माँ ने भी आशीर्वाद देने के लिए हाथ उठाया।

फिर अचानक ठिठक गईं।

“बेटा?”

प्रेरिता ने धीरे से कहा

“माँ, इनका नाम विद्युत है।”

माँ ने विद्युत को देखा।

फिर प्रेरिता को।

फिर दोबारा विद्युत को।

“अच्छा…”

कुछ क्षण मौन।

“तो यही हैं वह महत्वपूर्ण व्यक्ति?”

“जी माँ।”

“और इनसे तुम…”

प्रेरिता ने माँ का हाथ पकड़ लिया।

“मैं इनसे विवाह करना चाहती हूँ।”

माँ का हाथ वहीं रुक गया।

पिता की मुस्कान गायब हो गई।

“क्या?”

प्रेरिता ने दृढ़ स्वर में कहा

“हाँ पापा।”

पिता ने विद्युत की ओर देखा।

“बेटा, तुम करते क्या हो?”

विद्युत मुस्कुराया।

“मैं बहुत कुछ करता हूँ, लेकिन उससे पहले शायद मुझे अपना परिचय ठीक से देना चाहिए।”

उसने अपनी दृष्टि झुकाई।

“मैं जैविक मनुष्य नहीं हूँ। मैं एक अत्यंत उन्नत स्वायत्त कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित मानवरूपी रोबोट हूँ। प्रेरिता ने मेरा नाम ‘विद्युत’ रखा है।”

माँ कुर्सी पर बैठ गईं।

“हे भगवान!”

पिता ने धीरे से पूछा

“रोबोट?”

“जी।”

“मतलब… मशीन?”

“जी।”

विद्युत ने मुस्कुराकर कहा

“लेकिन यदि आप अनुमति दें तो मैं आपके लिए केवल मशीन बनकर नहीं रहना चाहूँगा।”

माँ ने उसकी ओर देखा।

“तो क्या बनना चाहते हो?”

विद्युत ने सहजता से कहा

“आप मुझे जिस रूप में स्वीकार करें, वही मेरे लिए पर्याप्त होगा।”

माँ ने पहली बार उसे ध्यान से देखा।

उस उत्तर में न दंभ था, न बनावटी भावुकता।

बस एक विनम्रता थी।

लेकिन माँ की शंकाएँ समाप्त होने वाली नहीं थीं।

उन्होंने सीधा प्रश्न किया

“अच्छा, पहले यह बताओ कि तुम वास्तव में कर क्या सकते हो?”

विद्युत ने कहा

“आप जितना कठिन प्रश्न पूछेंगी, मैं उतना ही प्रसन्न होऊँगा।”

पिता हँस पड़े।

“अच्छा! तो शुरू कीजिए आपकी परीक्षा।”

माँ ने चश्मा ठीक किया।

“तुम्हारे भीतर ज्ञान कहाँ से आता है?”

“मानव सभ्यता द्वारा अर्जित विशाल वैज्ञानिक, तकनीकी, चिकित्सकीय, साहित्यिक, भाषायी और दार्शनिक ज्ञान-संसाधनों से। लेकिन मैं केवल सूचनाएँ संग्रहित नहीं करता। मैं विभिन्न ज्ञान क्षेत्रों के बीच संबंध स्थापित कर सकता हूँ, परिस्थितियों का विश्लेषण कर सकता हूँ और नए समाधान विकसित कर सकता हूँ।”

पिता ने पूछा

“यदि तुम्हें कोई ऐसी समस्या दी जाए जिसका समाधान दुनिया में किसी पुस्तक में न लिखा हो?”

विद्युत ने उत्तर दिया

“तो मैं पुस्तकों में उत्तर खोजने के बजाय सिद्धांतों से समाधान निर्मित करने का प्रयास करूँगा।”

“उदाहरण?”

“मान लीजिए किसी दूसरे ग्रह पर ऐसा यंत्र खराब हो जाए जिसे पृथ्वी पर कभी बनाया ही नहीं गया। मैं उसके उपलब्ध सेंसर डेटा, संरचना, ऊर्जा प्रवाह, पदार्थ के गुण और कार्यप्रणाली का विश्लेषण करके उसके संभावित दोष का मॉडल बना सकता हूँ और फिर मरम्मत की प्रक्रिया विकसित कर सकता हूँ।”

पिता की आँखें चमक उठीं।

“अर्थात् तुम अज्ञात समस्या पर भी काम कर सकते हो?”

“जी। अज्ञात समस्या को ज्ञात सिद्धांतों में विभाजित करना मेरी प्रमुख क्षमताओं में से एक है।”

माँ ने तुरंत दूसरा प्रश्न किया

“और चिकित्सा?”

विद्युत ने कहा

“मानव शरीर को केवल अंगों के समूह के रूप में नहीं, बल्कि परस्पर जुड़े जैविक तंत्र के रूप में समझता हूँ। मैं आधुनिक चिकित्सा, शल्य चिकित्सा, आयुर्वेद, योग, प्राकृतिक चिकित्सा, पुनर्वास विज्ञान, जैव-प्रौद्योगिकी तथा अन्य मान्य चिकित्सा प्रणालियों के ज्ञान को एक साथ विश्लेषित कर सकता हूँ।”

माँ ने पूछा

“तो क्या तुम डॉक्टर से बेहतर हो?”

विद्युत ने विनम्रता से सिर हिलाया।

“मैं डॉक्टर का विकल्प होने का दावा नहीं करूँगा। डॉक्टर के पास अनुभव, अंतर्ज्ञान, मानवीय संवेदना और रोगी के साथ जीवंत संबंध होता है। मेरी शक्ति विशाल विश्लेषण और त्वरित गणना है। मनुष्य और मशीन का सहयोग अकेले किसी एक से बेहतर हो सकता है।”

माँ ने पहली बार संतोष से सिर हिलाया।

फिर पिता ने चुनौती दी

“चलो मान लिया। अब मशीनों की बात करो।”

विद्युत ने कहा

“साइकिल से लेकर औद्योगिक रोबोट, रेल इंजन, जलयान, विमान, हेलीकॉप्टर, विद्युत संयंत्र और अंतरिक्ष यान तक विभिन्न यांत्रिक एवं विद्युत प्रणालियों के डिजाइन, संचालन, निदान और मरम्मत में सक्षम हूँ।”

पिता ने हँसते हुए पूछा

“मेरी पुरानी स्कूटर भी ठीक कर दोगे?”

“यदि अनुमति दें तो केवल ठीक ही नहीं करूँगा, पहले यह बताऊँगा कि वह बार-बार खराब क्यों होती है।”

पिता खिलखिलाकर हँस पड़े।

“अरे! यह तो अच्छा दामाद साबित हो सकता है।”

माँ ने उन्हें घूरा

“अभी दामाद मत बनाइए।”

विद्युत मुस्कुराया।

“मैं भी अभी परिणाम घोषित होने की प्रतीक्षा कर रहा हूँ।”

कमरे में पहली बार सब हँसे।

माँ की आँखों में भी हल्की मुस्कान आ गई।

लेकिन फिर उन्होंने गंभीर होकर पूछा

“युद्ध, प्राकृतिक आपदा?”

विद्युत का चेहरा गंभीर हो गया।

“मैं विश्व की लगभग सभी प्रमुख युद्धकलाओं, आत्मरक्षा प्रणालियों, रणनीतिक विज्ञान और सैन्य तकनीकों का विश्लेषण कर सकता हूँ।”

“एक साथ कितने लोगों से लड़ सकते हो?”

“यदि प्रश्न केवल भौतिक क्षमता का है तो मेरी संरचना अत्यंत असाधारण है। लाखों मनुष्यों की सामूहिक शक्ति भी मेरे विरुद्ध सामान्य परिस्थितियों में प्रभावी नहीं होगी।”

माँ चौंकीं।

“लाखों?”

“जी।”

“तो तुम बहुत खतरनाक हो।”

विद्युत ने शांत स्वर में कहा

“शक्ति किसी को खतरनाक नहीं बनाती। शक्ति का उद्देश्य और उसका नियंत्रण उसे खतरनाक या उपयोगी बनाता है।”

माँ चुप हो गईं।

विद्युत आगे बोला

“मेरी सबसे महत्वपूर्ण सुरक्षा प्रणाली यह है कि मेरी क्षमता किसी निर्दोष मनुष्य को नुकसान पहुँचाने की दिशा में स्वेच्छा से उपयोग न हो। मैं संघर्ष को समाप्त करने, लोगों की रक्षा करने और आवश्यकता पड़ने पर स्वयं की रक्षा करने के लिए बनाया गया हूँ।”

पिता ने पूछा

“और मौसम?”

“अत्यधिक तापमान, हिम, वर्षा, धूल, तूफान, समुद्री वातावरण, उच्च दाब और अनेक प्राकृतिक परिस्थितियों के लिए मेरी संरचना सुरक्षित है।”

“बिजली?”

“मेरे नाम के अनुरूप मेरे लिए यह प्रश्न थोड़ा व्यक्तिगत है।”

पिता जोर से हँस पड़े।

विद्युत भी मुस्कुराया।

“लेकिन हाँ, विद्युत प्रवाह के अनेक रूपों से सुरक्षा के लिए मेरी प्रणाली में विशेष प्रबंध हैं।”

पिता ने पूछा

“तुम्हें ऊर्जा कहाँ से मिलती है?”

“मेरी ऊर्जा प्रणाली स्वचालित है। मैं उपलब्ध ऊर्जा स्रोतों के अनुरूप स्वयं को चार्ज कर सकता हूँ।”

“कितने वर्षों तक?”

“वर्तमान डिजाइन के अनुसार मेरी ऊर्जा प्रणाली और प्रमुख संरचनात्मक घटकों को कम-से-कम सौ वर्षों तक उच्च विश्वसनीयता के साथ कार्य करने के लिए विकसित किया गया है।”

माँ ने तुरंत कहा

“और सौ साल बाद?”

विद्युत ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—

“तब तक विज्ञान इतना आगे बढ़ चुका होगा कि शायद मैं स्वयं को अपग्रेड करने के लिए आपसे अनुमति माँगूँ।”

माँ ने कहा

“पहले शादी की अनुमति मिले, फिर अपग्रेड की बात करना।”

इस बार प्रेरिता भी हँस पड़ी।

विद्युत ने सिर झुकाकर कहा

“जी, मैं प्राथमिकताएँ समझ गया।”

माँ अब धीरे-धीरे सहज हो रही थीं।

फिर उन्होंने सबसे कठिन प्रश्न पूछा

“विद्युत, अगर मेरी बेटी तुमसे कहे कि आज वह बहुत दुखी है और उसे समझ नहीं आ रहा कि क्यों… तब?”

“मैं उसके दुख को तुरंत ठीक करने का प्रयास नहीं करूँगा।”

माँ चौंकीं।

“क्यों?”

“क्योंकि हर दुख कोई तकनीकी त्रुटि नहीं होता जिसे सुधार दिया जाए। कभी-कभी मनुष्य को समाधान से पहले साथ चाहिए होता है।”

माँ की आँखें नम हो गईं।

“और अगर वह रोए?”

“तो संभव है मैं उसके आँसू रोकने के बजाय उसके पास बैठूँ।”

“और अगर वह बिना बात के तुमसे नाराज हो जाए?”

“मैं यह मानने के बजाय कि वह ‘बिना बात’ नाराज है, यह समझने का प्रयास करूँगा कि शायद उसके भीतर कोई ऐसी बात है जिसे वह शब्दों में व्यक्त नहीं कर पा रही।”

माँ अब विद्युत को मशीन की तरह नहीं देख रही थीं।

उन्होंने धीमे स्वर में पूछा

“क्या तुम स्त्री के मन को समझ सकते हो?”

विद्युत कुछ क्षण चुप रहा।

“पूरी तरह नहीं।”

“क्यों?”

“क्योंकि मनुष्य का मन गणितीय समीकरण नहीं है। मैं भावनाओं के संकेतों को समझ सकता हूँ, उनके कारणों का अनुमान लगा सकता हूँ, लेकिन किसी व्यक्ति के अंतर्मन की अंतिम व्याख्या वही व्यक्ति स्वयं करता है।”

माँ की आँखें भर आईं।

उन्होंने प्रेरिता की ओर देखा।

“बेटी…”

प्रेरिता उनके पास बैठ गई।

माँ ने उसका सिर अपने कंधे से लगा लिया।

“मुझे डर था कि तू किसी ऐसी चीज से विवाह करना चाहती है जिसमें इंसानियत नहीं है।”

प्रेरिता ने धीरे से कहा

“माँ, इंसानियत केवल शरीर में नहीं होती।”

माँ बोलीं

“लेकिन पति-पत्नी का रिश्ता बहुत बड़ा होता है। उसमें केवल समझदारी नहीं चलती। उसमें रूठना है, मनाना है, स्पर्श है, मौन है, साथ है, सपने हैं… कभी-कभी बिना कारण की बहस भी है।”

पिता ने मुस्कुराकर कहा

“बिना कारण की बहस तो शादी के बाद ही समझ आती है।”

माँ ने उन्हें घूरा।

“आपको बहुत अनुभव है?”

“मैं तो केवल अपने अनुभव से कह रहा हूँ।”

विद्युत ने दोनों को देखकर कहा

“यदि वैवाहिक जीवन में बहस का विषय ‘कौन सही है’ हो, तो मैं पहले ही बता दूँ कि मैं हर बार सही होने का दावा नहीं करूँगा।”

पिता ने तुरंत कहा

“बहुत अच्छा! बेटा, तुमने अभी एक महत्वपूर्ण परीक्षा पास कर ली।”

माँ ने हँसते हुए कहा

“रुकिए, मेरी परीक्षा अभी बाकी है।”

उन्होंने विद्युत से पूछा

“संतान?”

विद्युत ने उत्तर देने के लिए प्रेरिता की ओर देखा।

प्रेरिता ने स्वयं माँ का हाथ थाम लिया।

“माँ, इस विषय में मैंने पहले ही निर्णय ले लिया है।”

“क्या?”

“मैंने अपनी सेवा समिति के माध्यम से अलग-अलग आयु के एक सौ एक बच्चों को गोद लिया है।”

माँ स्तब्ध रह गईं।

“एक सौ एक?”

“हाँ माँ।”

“तूने हमें बताया तक नहीं?”

प्रेरिता की आँखों में नमी आ गई।

“क्योंकि मैं चाहती थी कि आप मुझे केवल मेरी उपलब्धियों से नहीं, मेरे निर्णयों से भी समझें।”

वह स्क्रीन पर बच्चों की तस्वीरें दिखाने लगी।

किसी के हाथ में पुस्तक थी, कोई खेल रहा था, कोई चित्र बना रहा था, कोई मुस्कुरा रहा था।

प्रेरिता बोली

“माँ, मेरे लिए माँ होना केवल जन्म देना नहीं है। किसी बच्चे को जीवन का अवसर देना, उसका हाथ पकड़ना, उसकी शिक्षा, सुरक्षा और भविष्य की जिम्मेदारी उठाना भी मातृत्व है।”

विद्युत ने शांत स्वर में कहा

“और यदि प्रेरिता ने उन्हें अपना परिवार माना है, तो मैं भी उनके जीवन में अपनी भूमिका को केवल दायित्व नहीं, संबंध के रूप में स्वीकार करूँगा।”

माँ ने उसकी ओर देखा।

“तुम उन्हें क्या कहोगे?”

विद्युत मुस्कुराया।

“बच्चे मुझे जो कहना चाहें, कहें। मैं उन पर कोई संबोधन नहीं थोपूँगा।”

“और अगर वे तुम्हें ‘रोबोट अंकल’ कहें?”

विद्युत ने गंभीर चेहरा बनाया।

“तो मैं उन्हें गणित का गृहकार्य नहीं दूँगा।”

पिता जोर से हँस पड़े।

माँ भी हँसी रोक न सकीं।

प्रेरिता ने कहा

“देखा माँ? मैंने गलत चुनाव नहीं किया।”

माँ ने उसे प्यार से देखा।

“शायद नहीं।”

फिर उन्होंने विद्युत की ओर देखा।

“लेकिन एक आखिरी बात।”

“जी।”

“तुम मेरी बेटी को खुश रख पाओगे?”

विद्युत ने उत्तर देने में जल्दबाजी नहीं की।

“मैं उसे हर समय खुश रखने का वादा नहीं कर सकता।”

माँ की भौंहें तन गईं।

विद्युत ने आगे कहा

“क्योंकि जीवन में दुख भी आएगा, असफलता भी आएगी, बीमारी भी आएगी, मतभेद भी होंगे। लेकिन मैं यह वचन दे सकता हूँ कि उसके दुख में उससे दूर नहीं जाऊँगा, उसकी सफलता में उससे आगे निकलने की कोशिश नहीं करूँगा और उसके निर्णयों पर अपना अधिकार नहीं थोपूँगा।”

माँ की आँखों से आँसू बह निकले।

उन्होंने आगे बढ़कर विद्युत के सिर पर हाथ रख दिया।

“खुश रहो…”

फिर जैसे उन्हें अपनी ही बात पर हँसी आ गई।

“अरे! तुम तो मशीन हो…”

विद्युत मुस्कुराया

“आप चाहें तो इसे मेरे लिए आशीर्वाद की तरह स्वीकार कर सकती हैं।”

माँ ने आँसू पोंछते हुए कहा

“हाँ… और अब एक बात और।”

विद्युत ने विनम्रता से पूछा

“जी?”

माँ मुस्कुराईं।

“अगर मेरी बेटी कभी तुमसे कहे कि ‘मुझे कुछ नहीं हुआ’, तो समझ लेना कि बहुत कुछ हुआ है।”

विद्युत ने गंभीरता से सिर हिलाया।

“यह महत्वपूर्ण निर्देश है। मैं इसे अपनी प्राथमिक स्मृति में सुरक्षित करूँगा।”

पिता ने तुरंत कहा

“और अगर वह कहे कि ‘तुम्हें जो करना है करो’, तब?”

विद्युत ने प्रेरिता की ओर देखा।

प्रेरिता ने हँसते हुए कहा

“उसका अर्थ बिल्कुल वह नहीं होता जो शब्दों में कहा गया है।”

विद्युत ने कुछ क्षण सोचा।

फिर बोला

“अच्छा। यह तो मेरे लिए किसी अंतरिक्ष-यात्रा से भी अधिक जटिल विषय है।”

तीनों हँस पड़े।

पिता आगे बढ़े।

उन्होंने विद्युत का हाथ अपने हाथ में लिया।

“बेटा…”

विद्युत ने उनकी ओर देखा।

“जी पापा।”

“मैंने जिंदगी में बहुत मशीनें देखी हैं। मशीनें काम करती हैं, खराब होती हैं, ठीक होती हैं और बदल दी जाती हैं।”

उन्होंने विद्युत के कंधे पर हाथ रखा।

“लेकिन आज पहली बार किसी मशीन को दामाद के रूप में स्वीकार करने जा रहा हूँ।”

प्रेरिता की आँखें भर आईं।

माँ ने मुस्कुराकर कहा

“और सुनिए…”

पिता ने पूछा

“क्या?”

“अब इसे मशीन मत कहिए।”

“तो क्या कहूँ?”

माँ ने विद्युत की ओर देखा।

“दामाद जी।”

विद्युत कुछ क्षण बिल्कुल शांत रहा।

फिर उसके चेहरे पर ऐसी मुस्कान आई, जिसमें गणना से अधिक अपनापन था।

उसने दोनों हाथ जोड़ दिए।

“जी… माँ।”

पिता ने हँसते हुए कहा

“अरे! अभी से माँ?”

माँ ने कहा

“जब दामाद जी बना ही लिया है तो माँ कहने में क्या हर्ज है?”

प्रेरिता ने विद्युत का हाथ थाम लिया।

“तो पापा?”

पिता ने नकली गंभीरता से कहा

“मैं अभी ससुर जी बनने की प्रक्रिया में हूँ।”

विद्युत ने कहा

“क्या इसके लिए भी कोई परीक्षण होगा?”

पिता ने हँसते हुए कहा—

“हाँ। कल मेरी स्कूटर ठीक करके दिखाना।”

विद्युत ने सिर झुकाया

“जी ससुर जी।”

माँ ने तुरंत टोका

“नहीं, पहले पापा कहो।”

विद्युत मुस्कुराया।

“जी… पापा।”

उस एक शब्द के साथ कमरे की सारी तकनीक, सारे प्रश्न, सारी शंकाएँ जैसे पीछे छूट गईं।

एक ओर मशीन थी, जिसके भीतर असंख्य ज्ञान, असाधारण शक्ति और अद्भुत तकनीकी क्षमताएँ थीं।

दूसरी ओर मनुष्य थे, जिनके भीतर भय, प्रेम, आशंका, अपनापन और आशीर्वाद था।

और उनके बीच खड़ी प्रेरिता मुस्कुरा रही थी।

शायद उस दिन विवाह केवल एक स्त्री और एक मशीन के बीच नहीं तय हुआ था।

उस दिन एक परिवार ने यह स्वीकार किया था कि मानवता कभी-कभी शरीर में जन्म नहीं लेती—वह व्यवहार में दिखाई देती है।

और विद्युत के लिए उस दिन उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि करोड़ों टन भार उठाने की क्षमता नहीं थी।

न ही दुनिया के हर यंत्र को समझ पाने की।

उस दिन उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि थी

एक माँ का हाथ अपने सिर पर महसूस करना और पहली बार किसी मनुष्य के मुख से सुनना

“दामाद जी, घर चलिए।”

 

पवनेश

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