तालाब में मिली लाश
(यह कहानी पूर्णतः काल्पनिक एवं साहित्यिक रचना है। इसमें वर्णित सभी पात्र, घटनाएँ, परिस्थितियाँ, संवाद एवं स्थान लेखक की रचनात्मक कल्पना पर आधारित हैं। किसी वास्तविक व्यक्ति, समुदाय, घटना अथवा स्थान से इसकी समानता मात्र संयोग मानी जाए।
कहानी में प्रस्तुत विभिन्न पात्रों के विचार और दृष्टिकोण उनके काल्पनिक चरित्रों तथा कथा-परिस्थिति को अभिव्यक्त करते हैं; इन्हें लेखक अथवा किसी वर्ग, समुदाय या संस्था के वास्तविक विचार नहीं माना जाना चाहिए।
इस रचना का उद्देश्य केवल साहित्यिक मनोरंजन के साथ मानवीय दृष्टि, पूर्वधारणा और सत्य को देखने की हमारी प्रवृत्ति पर विचार करना है। किसी व्यक्ति अथवा समूह की भावनाओं को आहत करना इसका उद्देश्य नहीं है।)
प्रातः का समय था। पूर्व दिशा में सूर्य अभी क्षितिज की देहरी पर ही ठहरा था। आकाश पर हल्की केसरिया आभा तैर रही थी और तालाब का स्थिर जल उस आभा को अपने भीतर धीरे-धीरे घोल रहा था। किनारे उगी दूब पर ओस की बूँदें मोतियों-सी चमक रही थीं। कहीं दूर मंदिर की घंटी की मद्धिम ध्वनि सुनाई दे रही थी और पीपल पर बैठे पक्षियों का कलरव वातावरण की निस्तब्धता को तोड़ रहा था।
तालाब के चारों ओर बने पथ पर प्रातः भ्रमण करने वालों की आवाजाही आरंभ हो चुकी थी।
उसी समय एक साधु, एक व्यवसायी, एक गृहिणी, एक गणिका और एक सैनिक लगभग एक ही स्थान पर आकर ठिठक गए।
जल के मध्य कोई आकृति तैर रही थी।
साधु ने अपनी लकड़ी की खड़ाऊँ उतारकर किनारे रखी और आँखों पर हथेली की ओट करते हुए जल की ओर देखा।
साधु: “वह क्या है? जल में कोई मनुष्य पड़ा जान पड़ता है।”
व्यवसायी ने अपनी घड़ी पर दृष्टि डाली, फिर कुछ कदम आगे बढ़ा।
व्यवसायी: “मनुष्य ही प्रतीत होता है। देखिए… आकृति तो स्त्री जैसी है।”
गृहिणी ने अपने आँचल को कंधे पर ठीक किया और भयभीत होकर एक कदम पीछे हट गई।
गृहिणी: “हे भगवान! इतनी सुबह… कहीं किसी स्त्री की हत्या तो नहीं हुई?”
तालाब के ऊपर उड़ती दो बगुलों की परछाइयाँ जल पर पड़ीं और फिर लहरों के साथ टूटकर बिखर गईं।
सैनिक ने ध्यान से आकृति को देखा। उसके चेहरे पर सहज सतर्कता उतर आई।
सैनिक: “घबराइए मत। पहले यह निश्चित कर लेना चाहिए कि वह शव है भी या नहीं।”
गणिका, जो अब तक चुपचाप सबकी बातें सुन रही थी, तालाब की ओर स्थिर दृष्टि से देखती रही। उसके चेहरे पर भय कम और जिज्ञासा अधिक थी।
गणिका: “मृत्यु को दूर से देखकर पहचान लेना इतना सरल नहीं होता, सैनिक महोदय। कभी-कभी जीवन भी ऐसा दिखाई देता है, जैसे वह समाप्त हो चुका हो।”
व्यवसायी ने उसकी ओर देखा।
व्यवसायी: “आपकी बात कुछ विचित्र है।”
गणिका हल्के से मुस्कराई।
गणिका: “विचित्र नहीं… अनुभव की हुई है।”
साधु ने माला के दानों को धीरे-धीरे सरकाया।
साधु: “जीवन ने हम सबको अलग-अलग पाठ पढ़ाए हैं। किसी ने धन से सीखा, किसी ने गृहस्थी से, किसी ने रणभूमि से और किसी ने समाज की दृष्टि से।”
गृहिणी ने सहमति में सिर हिलाया, फिर तालाब की ओर देखने लगी।
गृहिणी: “परंतु वह स्त्री कौन हो सकती है? क्या कोई उसे खोज नहीं रहा होगा?”
अचानक हवा का एक झोंका आया। तालाब की सतह पर महीन तरंगें दौड़ गईं। दूर तैरती आकृति हल्के से घूमी और कुछ क्षण के लिए उसका सिर जल के भीतर चला गया।
गृहिणी के मुँह से धीमी चीख निकल गई।
गृहिणी: “अरे! वह डूब रही है!”
सैनिक तुरंत आगे बढ़ा।
सैनिक: “रुकिए! बिना सोचे पानी में मत उतरिए।”
व्यवसायी ने सैनिक का हाथ पकड़ लिया।
व्यवसायी: “यदि सचमुच शव है तो पुलिस को सूचना देनी चाहिए।”
सैनिक: “निश्चित रूप से। लेकिन यदि उसमें प्राण शेष हों तो?”
उसने चारों ओर दृष्टि दौड़ाई।
किनारे पर एक सूखी टहनी पड़ी थी। सैनिक ने उसे उठाया और पानी के निकट जाकर उसकी लंबाई जाँची।
सैनिक: “आकृति किनारे की ओर आ रही है। थोड़ा धैर्य रखिए।”
साधु ने आँखें मूँद लीं।
साधु: “मृत्यु को लेकर मनुष्य जितना भयभीत होता है, उतना ही उसके विषय में अनुमान लगाने में उत्सुक भी।”
व्यवसायी ने हल्की असहजता से कहा—
व्यवसायी: “महाराज, यह समय दर्शन का नहीं, निर्णय का है।”
साधु मुस्करा दिए।
साधु: “और निर्णय भी तो दर्शन के बिना अधूरा होता है, वत्स।”
गणिका ने पास पड़ी एक छोटी-सी कंकड़ी उठाकर पानी में फेंकी। गोल-गोल लहरें फैलती चली गईं।
गणिका: “देखिए… जल सब कुछ अपने भीतर ले लेता है, पर सत्य को अधिक देर छिपाकर नहीं रख पाता।”
सैनिक ने उसकी ओर देखा।
सैनिक: “आपको लगता है कि वह शव नहीं है?”
गणिका: “मुझे लगता है कि हम सब अपनी-अपनी आँखों से देख रहे हैं, पर अभी तक किसी ने सच में देखा नहीं है।”
व्यवसायी कुछ कहने ही वाला था कि आकृति अब स्पष्ट दिखाई देने लगी।
सूर्य थोड़ा ऊपर उठ चुका था। उसकी किरणें जल पर चमक रही थीं। आकृति की भुजाएँ अब पहले से अधिक स्पष्ट थीं। लंबे बालों जैसी कोई चीज उसके सिर के पास तैर रही थी।
गृहिणी ने काँपती आवाज में कहा
गृहिणी: “निश्चित ही स्त्री है… देखिए, उसके बाल भी हैं।”
व्यवसायी ने अपनी रूमाल से माथे का पसीना पोंछा।
व्यवसायी: “यह अत्यंत गंभीर मामला है। यदि हत्या हुई है तो”
सैनिक ने उसे रोक दिया।
सैनिक: “पहले सत्य।”
वह घुटनों के बल बैठ गया और टहनी बढ़ाकर आकृति को अपनी ओर खींचने लगा।
जल में हलचल हुई।
आकृति धीरे-धीरे सरकती हुई उथले पानी तक आई।
गृहिणी ने आँखें बंद कर लीं।
साधु ने माला रोक दी।
व्यवसायी कुछ पीछे हट गया।
गणिका आगे बढ़ आई।
सैनिक ने टहनी से आकृति को पलटा।
एक क्षण के लिए सबकी साँसें थम गईं।
फिर सैनिक के चेहरे पर आश्चर्य उभरा।
सैनिक: “अरे…!”
व्यवसायी: “क्या हुआ?”
सैनिक ने दोनों हाथों से उस वस्तु को उठाया।
सैनिक: “यह शव नहीं है।”
गृहिणी ने धीरे-धीरे आँखें खोलीं।
गृहिणी: “तो फिर…?”
सैनिक ने लकड़ी की आकृति को सबके सामने कर दिया।
वह स्त्री के आकार में तराशी हुई एक पुरानी लकड़ी थी—एक ओर मोटा तना, दोनों ओर भुजाओं जैसी शाखाएँ और ऊपर सिर जैसा गोल उभार। पानी में भीग जाने के कारण दूर से वह सचमुच किसी डूबी हुई स्त्री के शरीर जैसी प्रतीत हो रही थी।
कुछ क्षण तक सभी मौन रहे।
फिर व्यवसायी ने लंबी साँस छोड़ी।
व्यवसायी: “तो हम सबने बिना सत्य जाने एक कहानी गढ़ ली।”
गृहिणी के चेहरे पर संकोच भरी मुस्कान आ गई।
गृहिणी: “मैंने तो हत्या तक सोच ली थी।”
गणिका हँस पड़ी।
गणिका: “और मैंने सोचा था कि आज तालाब हमें मनुष्य की आँखों का रहस्य समझाएगा।”
साधु ने अपनी माला पुनः चलानी शुरू की।
साधु: “समझाया तो है।”
सैनिक ने प्रश्नवाचक दृष्टि से उनकी ओर देखा।
साधु ने लकड़ी की आकृति को देखते हुए कहा—
साधु: “जो दिखाई देता है, वह सत्य हो—यह आवश्यक नहीं। और जो सत्य होता है, वह पहली दृष्टि में दिखाई दे—यह भी आवश्यक नहीं।”
तालाब के ऊपर से एक पक्षी उड़ता हुआ गया।
उसकी परछाईं कुछ क्षण पानी पर साथ चली और फिर दूर चली गई।
व्यवसायी मुस्कराया।
व्यवसायी: “आज के प्रातः भ्रमण का लाभ तो हो गया।”
गृहिणी: “क्या?”
व्यवसायी ने चारों ओर देखते हुए कहा
व्यवसायी: “हम पाँचों एक लकड़ी को स्त्री समझ बैठे। अब लौटकर कम-से-कम किसी जीवित मनुष्य को बिना जाने मृत घोषित तो नहीं करेंगे।”
गणिका ने अपनी चादर का किनारा सँभाला और धीरे से कहा
गणिका: “काश, मनुष्य एक-दूसरे के विषय में भी इतना ही धैर्य रख पाता।”
उस वाक्य पर सब फिर शांत हो गए।
सूर्य अब तालाब के जल पर पूरी तरह उतर आया था।
पानी में तैरती वह लकड़ी किनारे पर पड़ी थी निःशब्द, निष्प्राण और निर्दोष।
और पाँचों के मन में एक ही प्रश्न गूँज रहा था
हम जो देखते हैं, क्या वास्तव में वही सत्य होता है?
वे पाँचों अलग-अलग दिशाओं में चल पड़े।
तालाब वहीं था।
जल फिर शांत हो गया था।
और कुछ ही क्षणों बाद उसकी सतह पर वह लकड़ी भी दिखाई देना बंद हो गई।
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